रबी फसलों की बोनी में संतुलित उर्वरक एवं गुणवत्तापूर्ण बीज का करें उपयोग – कृषि विभाग

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  • किसानों को फसलवार उर्वरक मात्रा एवं डीएपी के वैकल्पिक उर्वरकों के उपयोग की सलाह

अनूपपुर 2 नवंबर 2026/ रबी फसलों की बोनी का समय प्रारंभ हो गया है। जिले में गेहूं, चना सहित अन्य रबी फसलों की बेहतर पैदावार के लिए कृषि विभाग द्वारा किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज एवं संतुलित उर्वरकों के उपयोग की सलाह दी गई है। कृषि विभाग ने किसानों से मिट्टी की आवश्यकता एवं मृदा स्वास्थ्य कार्ड की अनुशंसा के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करने तथा फसल की आवश्यकता के अनुरूप खाद की मात्रा निर्धारित करने की अपील की है।

कृषि विभाग के अनुसार सिंचित गेहूं के लिए नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश की अनुशंसित मात्रा 120:60:40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, सिंचित पछेती गेहूं के लिए 80:40:30 तथा असिंचित गेहूं के लिए 60:30:30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। इसी प्रकार चना फसल के लिए एनपीके 20:60:20 तथा गंधक 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपयोग करने की सलाह दी गई है। किसानों को केवल डीएपी एवं यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय सिंगल सुपर फास्फेट (एसएसपी), एनपीके के विभिन्न ग्रेड एवं अमोनियम फास्फेट सल्फेट जैसे वैकल्पिक उर्वरकों का उपयोग भी मृदा स्वास्थ्य कार्ड की अनुशंसा के आधार पर करना चाहिए।

उप संचालक कृषि ने बताया कि फसलों में नत्रजन एवं फास्फोरस के साथ पोटाश का संतुलित उपयोग भी आवश्यक है। केवल डीएपी एवं यूरिया के उपयोग से खेतों में पोटाश की कमी हो सकती है, जिससे फसल की गुणवत्ता, दानों का वजन एवं उत्पादन प्रभावित होता है। एसएसपी के उपयोग से फसल को फास्फोरस एवं सल्फर की उपलब्धता होती है। इसका पाउडर एवं दानेदार स्वरूप उपलब्ध है। पाउडर का उपयोग खेत की तैयारी के समय तथा दानेदार एसएसपी का उपयोग बोनी के समय किया जा सकता है। उर्वरकों का चयन भूमि की प्रकृति एवं फसल की आवश्यकता के अनुसार करना चाहिए।

कृषि विभाग ने किसानों को नैनो यूरिया एवं नैनो डीएपी (तरल) के उपयोग के संबंध में भी जानकारी दी है। फसल की विभिन्न विकास अवस्थाओं में अनुशंसित मात्रा के अनुसार पत्तियों पर छिड़काव करने से नत्रजन की आवश्यकता की पूर्ति में सहायता मिल सकती है। किसानों को उर्वरकों के उपयोग में संतुलन बनाए रखने, स्थानीय उपलब्धता एवं लागत का आकलन करने तथा कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करने की अपील की गई है, जिससे मृदा स्वास्थ्य बनाए रखते हुए बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके।

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