- युवा कांग्रेस कार्यकर्ता पियूष ताम्रकार ने जताई आपत्ति, बोले– प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और स्वाभिमान का प्रतीक हैं छत्तीसगढ़ महतारी
मनेन्द्रगढ़। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर 2 नवंबर को मनेन्द्रगढ़ के स्वामी आत्मानंद स्कूल ग्राउंड में आयोजित होने वाले राज्योत्सव 2026 का निमंत्रण पत्र राजनीतिक और सांस्कृतिक चर्चा का विषय बन गया है। एमसीबी जिला प्रशासन द्वारा जारी आधिकारिक आमंत्रण पत्र में छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर शामिल नहीं किये जाने पर युवा कांग्रेस कार्यकर्ता पियूष ताम्रकार ने आपत्ति जताते हुए इसे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय बताया है।
पियूष ताम्रकार का कहना है कि छत्तीसगढ़ महतारी केवल एक प्रतीकात्मक तस्वीर नहीं बल्कि प्रदेश की संस्कृति, परंपरा, गौरव और स्वाभिमान का प्रतिनिधित्व करती हैं। ऐसे में राज्य स्थापना दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर आयोजित होने वाले समारोह के आमंत्रण पत्र में उन्हें स्थान नहीं मिलना समझ से परे है। उन्होंने कहा कि राज्योत्सव प्रदेश की पहचान और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने का अवसर होता है इसलिए इससे जुड़े हर प्रतीक को उचित सम्मान मिलना चाहिये।
उन्होंने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ी भाषा, लोकसंस्कृति और परंपराओं को बढ़ावा देने के लिये कई पहल की गई थीं। इसी क्रम में प्रदेश के पारंपरिक गीत ‘अरपा पैरी के धार’ को राजगीत का दर्जा दिया गया जिससे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ।
ताम्रकार ने भाजपा सरकार और जिला प्रशासन से सवाल किया कि जब राज्योत्सव प्रदेश की अस्मिता और गौरव का उत्सव है तो इसके आधिकारिक निमंत्रण पत्र में छत्तीसगढ़ महतारी को स्थान क्यों नहीं दिया गया? उन्होंने प्रशासन से इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग भी की।
युवा कांग्रेस कार्यकर्ता ने जिला प्रशासन से आग्रह किया कि निमंत्रण पत्र में हुई इस चूक को गंभीरता से लेते हुए आवश्यक संशोधन किया जाये और राज्योत्सव के आयोजन में छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर को सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाये। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ महतारी किसी राजनीतिक दल की पहचान नहीं बल्कि प्रदेश के प्रत्येक छत्तीसगढ़वासी की सांस्कृतिक अस्मिता और गौरव का प्रतीक हैं। उनका सम्मान किसी राजनीतिक विचारधारा से ऊपर है। राज्य स्थापना दिवस का आयोजन तभी अपनी सांस्कृतिक भावना को पूरी तरह प्रदर्शित कर सकेगा जब प्रदेश की पहचान से जुड़े प्रतीकों को भी उसमें उचित स्थान मिले।






































































