एसईसीएल कोतमा कॉलरी अस्पताल में लगे कैंप पर गंभीर सवाल

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बीपी-शुगर की जांच और परामर्श तक सिमटा सुपरस्पेशलिटी शिविर, मरीजों को थमाई गई फाइलें; बिलासपुर के किम्स अस्पताल बुलाने के आरोप, कमीशनखोरी और एसईसीएल को आर्थिक नुकसान पहुंचाने की आशंका की जांच की मांग

लगभग 70 पंजीयन, लेकिन विशेषज्ञ जांच सुविधाओं और दवाओं को लेकर सवाल; सेवानिवृत्त कर्मचारियों, पान दुकानदार और बच्ची के परिजनों ने सुनाई आपबीती, सीएमओ की भूमिका भी जांच के दायरे में लाने की मांग

जमुना-कोतमा। एसईसीएल के कोतमा कॉलरी चिकित्सालय, भालूमाड़ा में 30 अक्टूबर 2026 को आयोजित निःशुल्क सुपरस्पेशलिटी चिकित्सा परामर्श शिविर अब सवालों के घेरे में आ गया है बिलासपुर के किम्स सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल के विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा आयोजित इस शिविर का उद्देश्य मरीजों को बेहतर चिकित्सा परामर्श उपलब्ध कराना बताया गया था लेकिन शिविर में पहुंचे कई लोगों के अनुभव और मौके पर सामने आई परिस्थितियां इसकी उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं

आरोप है कि बड़े-बड़े बैनर लगाकर विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं का प्रचार किया गया, जबकि मौके पर मुख्य रूप से ब्लड प्रेशर, शुगर और पैर से संबंधित एक छोटी जांच मशीन की सुविधा दिखाई दी कई मरीजों को विस्तृत जांच एवं उपचार के लिए बिलासपुर स्थित निजी अस्पताल आने की सलाह दी गई ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह शिविर वास्तव में मरीजों की सुविधा के लिए आयोजित किया गया था या निजी अस्पताल में मरीजों को भेजने का माध्यम बन रहा था?

  • तीन विशेषज्ञ चिकित्सकों के नाम पर आयोजित हुआ शिविर

शिविर के प्रचार बैनर के अनुसार किम्स सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल की ओर से तीन विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवाएं उपलब्ध कराने की घोषणा की गई थी

. डॉ. वाय रवि शेखर — जनरल एवं लेप्रोस्कोपिक सर्जरी विशेषज्ञ।
. डॉ. सुधा राम — न्यूरो एवं स्पाइन सर्जरी विशेषज्ञ
डॉ. अनिरुद्ध श्याम — पल्मोनोलॉजिस्ट एवं छाती रोग विशेषज्ञ

बैनर में पेट, पित्ताशय, हर्निया, रीढ़ की समस्याओं, ब्रेन ट्यूमर, अस्थमा, सीओपीडी और अन्य गंभीर बीमारियों के परामर्श का उल्लेख था लेकिन सवाल यह है कि इतने गंभीर रोगों के लिए आयोजित सुपरस्पेशलिटी शिविर में संबंधित जांच की कितनी सुविधाएं वास्तव में उपलब्ध थीं?

  • रूटीन इलाज कराने पहुंचे मरीजों का भी पंजीयन, लगभग 70 लोगों की बनाई गई फाइल

मिली जानकारी के अनुसार शिविर में लगभग 70 लोगों का पंजीयन किया गया आरोप है कि इनमें कई ऐसे मरीज भी शामिल थे, जो विशेष शिविर में भाग लेने नहीं, बल्कि प्रतिदिन की तरह एसईसीएल चिकित्सालय में अपना नियमित उपचार कराने आए थे

इन मरीजों की जांच कर फाइलें तैयार की गईं और कई को आगे के इलाज के लिए किम्स हॉस्पिटल बिलासपुर जाने की सलाह दी गई सवाल यह भी है कि इनमें कितने मरीज विशेष रूप से शिविर के लिए पहुंचे थे और कितने नियमित उपचार के लिए अस्पताल आए थे?

  • दवा लेने आए थे, जांच करके फाइल पकड़ा दी गई — मदन सिंह

शिविर में पहुंचे सेवानिवृत्त कॉलरी कर्मचारी मदन सिंह ने बताया कि वे रोज की तरह अस्पताल में अपनी नियमित दवा लेने आए थे उनका पहले से ब्लड प्रेशर और शुगर का इलाज चल रहा है

उनके अनुसार, शिविर में उनकी जांच करके एक फाइल थमा दी गई जब उन्होंने अपनी नियमित दवा मांगी तो दवा उपलब्ध नहीं कराई गई मदन सिंह ने अपने साथ अभद्र व्यवहार किए जाने का भी आरोप लगाया

उन्होंने सवाल उठाया कि जब वे पहले से उपचार करा रहे हैं तो बिना उनकी आवश्यकता समझे नई फाइल तैयार करने और दूसरे अस्पताल का परामर्श देने का औचित्य क्या है?

  • पान दुकान संचालक रवींद्र प्रधान को गंभीर बीमारी का भय दिखाया
  • जमुना कॉलोनी में स्टेट बैंक के सामने छोटी सी पान दुकान चलाने वाले रवींद्र प्रधान ने भी शिविर के अनुभव पर सवाल उठाए

उनके अनुसार, जांच के बाद उन्हें बताया गया कि वे गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और बेहतर उपचार के लिए बिलासपुर स्थित किम्स हॉस्पिटल जाना होगा आरोप है कि उन्हें यह भी कहा गया कि अस्पताल की सलाह के अनुसार उपचार कराने पर लगभग 15 दिनों में लाभ मिल सकता है, अन्यथा बीमारी गंभीर परिणाम दे सकती है

यदि यह कथन सही है तो सवाल उठता है कि क्या सीमित जांच के आधार पर किसी व्यक्ति को गंभीर बीमारी का भय दिखाना उचित है?

एक छोटे पान दुकानदार के लिए बिलासपुर जाकर निजी अस्पताल में 15 दिन रहना, इलाज कराना, भोजन और ठहरने का खर्च उठाना कितना कठिन होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है

  • सेवानिवृत्त कर्मचारी जहीर खान को भी बिलासपुर बुलाया गया

सेवानिवृत्त कॉलरी कर्मचारी जहीर खान ने बताया कि वे भी अपना नियमित इलाज कराने कोतमा कॉलरी अस्पताल पहुंचे थे वहां शिविर में उनकी जांच की गई और आगे की जांच एवं उपचार के लिए बिलासपुर स्थित किम्स हॉस्पिटल आने की सलाह दी गई

ऐसे मामलों ने सवाल खड़ा किया है कि नियमित मरीजों को स्थानीय चिकित्सालय में उपलब्ध उपचार से आगे किस चिकित्सकीय आधार पर निजी अस्पताल रेफर किया जा रहा था

  • पत्रकार की मासूम बच्ची को भी किम्स अस्पताल आने की सलाह

पत्रकार गुलाब रजक अपनी छोटी बच्ची अनुष्का रजक को लेकर शिविर में पहुंचे थे उनके अनुसार, जांच के बाद बच्ची के लेंस में समस्या होने और भविष्य में परेशानी बढ़ने की आशंका बताई गई। साथ ही आगे के उपचार के लिए किम्स हॉस्पिटल आने की सलाह दी गई

इस मामले में भी परिजनों ने सवाल उठाया कि बच्ची की समस्या का निर्धारण किन जांचों के आधार पर किया गया और क्या संबंधित विशेषज्ञ जांच की सुविधा शिविर में उपलब्ध थी?

  • निःशुल्क शिविर में दवा नहीं, पर्याप्त जांच नहीं, फिर मरीजों को लाभ क्या?

सबसे बड़ा सवाल शिविर की वास्तविक उपयोगिता को लेकर है जब एसईसीएल जैसी बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के चिकित्सालय में विशेषज्ञ शिविर आयोजित होता है, तो मरीजों को सामान्य परामर्श से आगे कुछ ठोस सुविधाएं मिलने की अपेक्षा रहती है

आरोप है कि शिविर में बीपी और शुगर जैसी सामान्य जांच के अतिरिक्त गंभीर बीमारियों की विस्तृत जांच के पर्याप्त उपकरण उपलब्ध नहीं थे। निःशुल्क दवाओं की व्यवस्था को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं

हालांकि विशेषज्ञ चिकित्सक कई बीमारियों में प्रारंभिक परामर्श के आधार पर आगे की जांच की सलाह दे सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट होना जरूरी है कि शिविर में उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी मरीजों को पहले से क्यों नहीं दी गई और निजी अस्पताल भेजे जाने का चिकित्सकीय आधार क्या था

  • एसईसीएल और निजी अस्पताल के बीच अनुबंध की शर्तें हों सार्वजनिक

बताया जा रहा है कि एसईसीएल और किम्स हॉस्पिटल बिलासपुर के बीच चिकित्सा सेवाओं को लेकर अनुबंध अथवा टाईअप की व्यवस्था है इसकी वास्तविक शर्तों, भुगतान प्रक्रिया और मरीजों के रेफरल संबंधी नियमों की जांच आवश्यक है

शिकायतकर्ताओं ने आशंका जताई है कि निजी अस्पतालों में रेफर होने वाले कॉलरी कर्मचारियों के उपचार पर बड़े बिल बनते हैं, जिनका भुगतान निर्धारित व्यवस्था के अंतर्गत कंपनी द्वारा किया जाता है

साथ ही कुछ अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों को कथित कमीशन दिए जाने की आशंका भी व्यक्त की गई है हालांकि कमीशनखोरी, फर्जी बिलिंग अथवा किसी अधिकारी की मिलीभगत का कोई स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण अभी सामने नहीं आया है इसलिए इन आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है

यह जांच होनी चाहिए कि रेफर किए गए मरीजों की बीमारी, उपचार, अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि और बिल की राशि चिकित्सकीय दृष्टि से उचित थी या नहीं

  • एसईसीएल चिकित्सालय के सीएमओ और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

इस पूरे आयोजन में एसईसीएल चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) और शिविर की अनुमति देने वाले संबंधित अधिकारियों की प्रशासनिक भूमिका की भी जांच की मांग उठ रही है

सवाल यह है कि निजी अस्पताल को शिविर आयोजित करने की अनुमति देते समय किन सुविधाओं की शर्त रखी गई थी? क्या जांच उपकरणों, दवाओं, चिकित्सकों की उपस्थिति और मरीजों को रेफर करने की प्रक्रिया की कोई निगरानी की गई?

यदि शिविर में पर्याप्त जांच सुविधाएं नहीं थीं तो इसे सुपरस्पेशलिटी चिकित्सा परामर्श शिविर के रूप में प्रचारित करने का उद्देश्य क्या था?

सीएमओ और संबंधित अधिकारियों से इन सवालों का जवाब सामने आना आवश्यक है केवल शिविर आयोजित कर देना उपलब्धि नहीं, बल्कि मरीजों को वास्तविक लाभ पहुंचाना भी अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी है

  • गरीब मरीजों के लिए कहीं आर्थिक बोझ न बन जाए निःशुल्क परामर्श

कॉलरी कर्मचारियों और पात्र सेवानिवृत्त कर्मियों के उपचार के लिए कंपनी की चिकित्सा सुविधाएं एवं निर्धारित भुगतान व्यवस्थाएं हो सकती हैं लेकिन ऐसे शिविरों में पहुंचने वाले सामान्य नागरिक, मजदूर, ठेला संचालक, पान दुकानदार और छोटे व्यवसायियों के सामने निजी अस्पताल में उपचार का भारी आर्थिक बोझ खड़ा हो सकता है

निःशुल्क शिविर के नाम पर मरीजों को पहले परामर्श देना और फिर महंगे उपचार के लिए निजी अस्पताल भेजना, यदि बिना पर्याप्त चिकित्सकीय आवश्यकता के किया जा रहा है, तो यह गंभीर जांच का विषय है

  • महाप्रबंधक प्रभाकर राम त्रिपाठी से उच्चस्तरीय जांच की मांग

जमुना-कोतमा क्षेत्र के महाप्रबंधक प्रभाकर राम त्रिपाठी से मांग की गई है कि आयोजित शिविर की निष्पक्ष जांच कराई जाए

शिविर में हुए लगभग 70 पंजीयनों, मरीजों को दिए गए परामर्श, तैयार की गई फाइलों और बिलासपुर रेफर किए गए मरीजों का विवरण जांचा जाए साथ ही किम्स हॉस्पिटल और एसईसीएल के बीच चिकित्सा अनुबंध, उपचार भुगतान तथा रेफरल प्रक्रिया की भी समीक्षा की जाए

मांग यह भी है कि भविष्य में भले ही कुछ महीनों के अंतराल पर शिविर आयोजित हों, लेकिन उनमें संबंधित रोगों की उपयोगी जांच सुविधाएं, आवश्यक दवाएं और वास्तविक उपचार संबंधी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए

  • सबसे बड़ा सवाल — सेवा के नाम पर शिविर या निजी अस्पताल के लिए मरीजों की तलाश?

कोल इंडिया और एसईसीएल जैसी बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के पास अपने चिकित्सालय और चिकित्सा संसाधन मौजूद हैं ऐसे में विशेषज्ञ सेवाओं के लिए निजी अस्पतालों का सहयोग लेना गलत नहीं है, लेकिन पूरी व्यवस्था पारदर्शी, चिकित्सकीय आवश्यकता पर आधारित और मरीजों के हित में होनी चाहिए

यदि निजी अस्पतालों को भेजे गए मरीजों के उपचार में अनावश्यक भर्ती, जरूरत से अधिक जांच अथवा बढ़े हुए बिलों की शिकायतें सही पाई जाती हैं, तो इससे एसईसीएल को आर्थिक नुकसान और आम नागरिकों को गंभीर परेशानी हो सकती है

अब देखना यह है कि एसईसीएल प्रबंधन इन शिकायतों की जांच कर मरीजों के हित में ठोस कदम उठाता है या फिर निःशुल्क चिकित्सा शिविरों की आड़ में कथित अनियमितताओं को लेकर उठ रहे सवाल अनुत्तरित रह जाएंगे

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