परम्परागत जनमाध्यम भारतीय संस्कृति और लोकसंवाद की अमूल्य धरोहर : प्रो. अवधेश शुक्ल

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परम्परागत जनमाध्यम भारतीय संस्कृति और लोकसंवाद की अमूल्य धरोहर : प्रो. अवधेश शुक्ल

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय में ‘परम्परागत जनमाध्यम- उत्पत्ति, उत्कर्ष एवं उपादेयता’ पुस्तक का भव्य लोकार्पण

लोकमाध्यमों की ऐतिहासिक भूमिका, सांस्कृतिक संरक्षण और आधुनिक समय में उपयोगिता पर हुई विस्तृत चर्चा

अमरकंटक। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय प्रमुख एवं विभागाध्यक्ष प्रो. राघवेंद्र मिश्रा द्वारा लिखित पुस्तक ‘परम्परागत जनमाध्यम- उत्पत्ति, उत्कर्ष एवं उपादेयता’ का भव्य लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति प्रो. अवधेश कुमार शुक्ल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा कि परम्परागत जनमाध्यमों को समझना भारत के इतिहास, संस्कृति और प्राचीन संप्रेषण परंपरा को समझने का सबसे सुगम माध्यम है। उन्होंने कहा कि सदियों से लोकमाध्यमों ने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संचार को जीवंत बनाए रखा है तथा हमारी श्रुति और स्मृति परंपरा ने इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रो. अवधेश शुक्ल ने कहा कि प्रो. राघवेंद्र मिश्रा की यह पुस्तक परम्परागत जनमाध्यमों के विविध स्वरूपों के इतिहास, विकास और उनके योगदान पर गंभीरता से प्रकाश डालती है। पुस्तक में वर्तमान समय में इन माध्यमों की उपयोगिता, सामाजिक प्रासंगिकता और सांस्कृतिक महत्व को भी विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने इसे विद्यार्थियों, शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए अत्यंत उपयोगी कृति बताया।

कार्यक्रम में सारस्वत उद्बोधन देते हुए प्राचीन इतिहास के प्रख्यात विद्वान प्रो. आलोक श्रोत्रिय ने कहा कि लोक संवाद भारतीय सभ्यता के केंद्र में सदैव विद्यमान रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने चित्रों, ध्वनियों, भाषा और प्रतीकों के माध्यम से संप्रेषण की अत्यंत समृद्ध परंपरा विकसित की, जिसने न केवल संस्कृति को समृद्ध किया बल्कि पारंपरिक ज्ञान को भी संरक्षित रखा। उन्होंने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि इसमें लोककथा, लोकगाथा, लोकोक्ति, मुहावरे, चित्रकारी, मोटिफ एवं अन्य लोकमाध्यमों का अत्यंत व्यवस्थित एवं शोधपरक वर्णन किया गया है।

पुस्तक की लेखन यात्रा पर प्रकाश डालते हुए लेखक प्रो. राघवेंद्र मिश्रा ने बताया कि लगभग 400 पृष्ठों में तैयार इस पुस्तक में परम्परागत जनमाध्यमों के लगभग सभी पक्षों को समाहित करने का प्रयास किया गया है। पुस्तक में भारतीय परिप्रेक्ष्य के साथ-साथ विश्व के विभिन्न महाद्वीपों एवं सभ्यताओं में प्रचलित जनमाध्यमों की जानकारी भी दी गई है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक लोकमाध्यमों की सांस्कृतिक संरक्षण एवं सामाजिक विकास में भूमिका का गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करती है। पुस्तक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध कराई गई है।

कार्यक्रम में वक्ता के रूप में उपस्थित डॉ. संजय यादव ने कहा कि पुस्तक सरल, रोचक और शोधपरक भाषा में लिखी गई है। इसमें सैद्धांतिक पक्षों को सहज तरीके से समझाने के साथ-साथ अनेक महत्वपूर्ण सूचनाएं, चित्र और तालिकाएं भी सम्मिलित की गई हैं, जो इसे और अधिक उपयोगी बनाती हैं।

लोकार्पण कार्यक्रम पत्रकारिता एवं जनसंचार सभागार में संपन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में अध्यापक, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं मां सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर किया गया। अतिथियों का स्वागत प्रो. राघवेंद्र मिश्रा एवं प्रो. मनीषा शर्मा द्वारा किया गया। स्वागत भाषण आकांक्षा चितवन ने प्रस्तुत किया, जबकि कार्यक्रम का संचालन शुभी विश्वकर्मा ने किया। समारोह के दौरान पुस्तक को लेकर विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों में विशेष उत्साह देखने को मिला।

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