चार दशक से बापू चौक पर विराज रहीं मां दुर्गा, आस्था और भव्य झांकियों का ऐतिहासिक संगम बना अमलाई
1986 में करीमुल्ला खान ने रखी थी स्थापना की नींव, 40वें वर्ष में इंदौर के कलाकारों की चार चल झांकियां बनीं आकर्षण का केंद्र

प्रमुख बिंदु
– युवा जागृति मंच की दुर्गा स्थापना के 40 वर्ष पूरे
– शहडोल-अनूपपुर जिले की सीमा पर रेलवे स्टेशन के समीप भव्य आयोजन
– पश्चिम बंगाल के कलाकारों के वस्त्र निर्मित मंदिरों से शुरू हुई ऐतिहासिक परंपरा
– शिव, कृष्ण लीला, यशोदा मैया और पुष्पक विमान की चार चल झांकियां
– आकर्षक विद्युत सज्जा से जगमगा रहा बापू चौक
– बुढ़ार, धनपुरी, शहडोल, अनूपपुर, कोतमा सहित आसपास के क्षेत्रों से पहुंच रहे श्रद्धालु
अमलाई। आस्था, परंपरा और भक्ति के चार दशकों की गौरवशाली यात्रा का साक्षी बना बापू चौक बरगवां रोड, अमलाई इस नवरात्र में एक बार फिर मां दुर्गा की आराधना से भक्तिमय हो उठा है। नगर परिषद बरगवां-अमलाई क्षेत्र में युवा जागृति मंच द्वारा वर्ष 1986 में शुरू की गई दुर्गा स्थापना की परंपरा ने 40 वर्ष पूरे कर लिए हैं। शहडोल और अनूपपुर जिले की सीमा पर रेलवे स्टेशन के समीप आयोजित यह उत्सव आज क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में शामिल है। चतुर्थी से उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़, भव्य चल झांकियां और आकर्षक विद्युत सज्जा यहां के उत्सव को विशेष पहचान दे रही हैं।
1986 में रखी गई थी ऐतिहासिक आयोजन की नींव
बापू चौक पर दुर्गा स्थापना की शुरुआत लगभग चार दशक पहले करीमुल्ला खान के नेतृत्व में हुई थी। वे युवा जागृति मंच के प्रथम अध्यक्ष थे। वर्ष 1986 में रखी गई इस धार्मिक आयोजन की नींव आज एक विशाल जनआस्था के केंद्र के रूप में विकसित हो चुकी है। समय के साथ समिति का विस्तार हुआ, युवाओं की भागीदारी बढ़ी और हर वर्ष कुछ नया करने की परंपरा मजबूत होती गई। आज यह आयोजन धार्मिक श्रद्धा के साथ सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बन गया है।
शुरुआती दौर में पश्चिम बंगाल के कलाकारों द्वारा कपड़े से विशाल मंदिरों की आकर्षक संरचनाएं तैयार की गई थीं। उस समय ऐसे भव्य मंदिर स्थानीय लोगों के लिए कौतूहल और आकर्षण का विषय हुआ करते थे। बाद के वर्षों में माता वैष्णो देवी की गुफा, शिरडी के साईं बाबा की झांकी और विभिन्न धार्मिक प्रसंगों पर आधारित सजावट ने आयोजन को नई पहचान दी।
हर वर्ष नई कल्पना, हर बार नया आकर्षण
चार दशकों के इतिहास पर नजर डालें तो यहां की झांकियों में समय के साथ लगातार बदलाव देखने को मिला है। कभी विशाल मंदिरों की प्रतिकृतियां आकर्षण का केंद्र बनीं, तो कभी धार्मिक स्थलों की गुफाओं और मंदिरों के दर्शन ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध किया। रामायण, कृष्ण लीला, भगवान शिव, माता वैष्णो देवी और साईं बाबा जैसे प्रसंगों पर आधारित सजावट ने आयोजन को विविधता प्रदान की।
लगभग दो दशक पहले चल झांकियों की शुरुआत होने के बाद उत्सव का स्वरूप और भव्य हुआ। अलग-अलग वर्षों में धार्मिक कथाओं और पौराणिक प्रसंगों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास किए गए। एक समय भगवान गणेश की ऐसी कलाकृति भी आकर्षण का केंद्र बनी थी, जिसमें उनके हाथ में एक रुपये का सिक्का लेकर लड्डू देने का दृश्य प्रस्तुत किया गया था।
इन चार दशकों की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि समिति ने हर वर्ष नई कल्पना और नए आकर्षण के माध्यम से श्रद्धालुओं को कुछ अलग दिखाने का प्रयास किया। इसी परंपरा ने बापू चौक के दुर्गोत्सव को क्षेत्र में विशिष्ट पहचान दिलाई है।
40वें वर्ष में चार चल झांकियों का अनूठा संसार
इस वर्ष आयोजन के 40वें वर्ष को विशेष बनाने के लिए इंदौर के कलाकारों द्वारा चार आकर्षक चल झांकियां तैयार की गई हैं। इन झांकियों में धार्मिक प्रसंगों को कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पहाड़नुमा संरचना के भीतर प्रवेश करते ही सबसे पहले भगवान भोलेनाथ के दर्शन होते हैं। नरमुंडों की माला धारण किए शिव का स्वरूप और समीप स्थापित शिवलिंग श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति कराते हैं।
आगे बढ़ने पर यशोदा मैया की चल झांकी दिखाई देती है। इसमें यशोदा मैया बालकृष्ण को गोद में लेकर वात्सल्य भाव में झूमती और उन्हें झूला झुलाती नजर आती हैं। मां और बालक के प्रेम का यह दृश्य भक्तों को कृष्ण जन्म और बाल लीलाओं की याद दिलाता है।
तीसरी झांकी में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को जीवंत किया गया है। बांसुरी, राधा-कृष्ण के प्रसंग और माखन से भरी मटकी के माध्यम से कृष्ण की बाल लीलाओं का चित्रण किया गया है। घूमती हुई कलात्मक संरचनाएं और मटकी से जुड़े दृश्य बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
चौथी झांकी में रामायण के प्रसंग को प्रस्तुत करते हुए पुष्पक विमान का दृश्य दिखाया गया है। भगवान श्रीराम और उनसे जुड़े धार्मिक प्रसंगों को विमान की कलात्मक संरचना के माध्यम से दर्शाया गया है। इन चारों झांकियों के बाद विशाल पंडाल में मां दुर्गा की प्रतिमा विराजमान है, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना की जा रही है।
रोशनी से जगमगा रहा पूरा पंडाल
आयोजन स्थल पर बड़े पैमाने पर विद्युत सजावट की गई है। रंग-बिरंगी रोशनी, जगमगाते प्रवेश द्वार, सुसज्जित पंडाल और झांकियों पर केंद्रित प्रकाश व्यवस्था पूरे परिसर को आकर्षक रूप दे रही है। शाम ढलते ही बापू चौक का दृश्य उत्सवमय हो उठता है। रोशनी और कलात्मक सजावट के बीच श्रद्धालु झांकियों का अवलोकन करते हुए मां दुर्गा के दर्शन कर रहे हैं।
कई नगरों और गांवों से पहुंच रहे श्रद्धालु
बापू चौक की भौगोलिक स्थिति भी इस आयोजन को विशेष बनाती है। शहडोल और अनूपपुर जिले की सीमा के समीप तथा रेलवे स्टेशन के निकट होने के कारण यहां दोनों जिलों के श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है। बुढ़ार, धनपुरी, शहडोल, अनूपपुर, कोतमा, भालूमाड़ा, राजेंद्रग्राम सहित आसपास के कस्बों और गांवों से बड़ी संख्या में लोग दर्शन करने पहुंचते हैं। उमरिया और चंदिया जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से भी श्रद्धालुओं के आने का उल्लेख आयोजन की व्यापक लोकप्रियता को दर्शाता है।
चतुर्थी से शुरू होने वाली भीड़ दिन गुजरने के साथ बढ़ती जाती है। दर्शन के लिए कतारें लगती हैं और आसपास मेले जैसा माहौल बन जाता है। परिवारों के साथ आने वाले लोग मां दुर्गा के दर्शन करने के अलावा चल झांकियों और आकर्षक सजावट का आनंद भी लेते हैं।
150 युवाओं की टोली संभाल रही आयोजन की जिम्मेदारी
युवा जागृति मंच के वर्तमान अध्यक्ष राज शिवकुमार कहार के नेतृत्व में आयोजन की व्यवस्थाएं संचालित की जा रही हैं। मनोज गर्ग, राजकुमार कर, अशोक सिसोदिया, नीरज गुप्ता, नीरज केसरवानी सहित लगभग 150 युवाओं की टोली आयोजन को सफल बनाने में जुटी है। धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर पंडाल की व्यवस्था, सजावट और श्रद्धालुओं की आवाजाही तक में युवाओं की भागीदारी दिखाई दे रही है।
चार दशक पहले शुरू हुई यह परंपरा आज केवल दुर्गा प्रतिमा की स्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। बदलते समय के साथ भव्यता बढ़ी है, झांकियों के स्वरूप में नवीनता आई है और श्रद्धालुओं की भागीदारी भी लगातार व्यापक हुई है।
मां दुर्गा के प्रति अटूट आस्था, समिति के सदस्यों का समर्पण और स्थानीय लोगों की सहभागिता ही इस आयोजन की सबसे बड़ी ताकत है। 40वें वर्ष में सजी भव्य चल झांकियां एक बार फिर यह संदेश दे रही हैं कि परंपराएं तभी जीवंत रहती हैं, जब नई पीढ़ी उन्हें श्रद्धा और रचनात्मकता के साथ आगे बढ़ाती है।






































































