जर्जर स्टाफ क्वार्टरों में ‘भगवान भरोसे’ स्वास्थ्यकर्मी, छत पर तिरपाल बना सहारा
कोतमा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में बारिश का कहर, रिसती छतों और कमजोर दीवारों के बीच हादसे का मंडरा रहा खतरा
रिपोर्टर भरत मिश्रा, कोतमा
कोतमा। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए बनाए गए शासकीय स्टाफ क्वार्टर लंबे समय से बदहाली का शिकार हैं। बारिश के मौसम में इन जर्जर आवासों की स्थिति और भी गंभीर हो गई है। छतों से लगातार पानी रिसने के कारण यहां रहने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों और उनके परिवारों को अपने खर्च पर छतों के ऊपर प्लास्टिक की तिरपाल लगाकर गुजर-बसर करनी पड़ रही है। जर्जर भवनों के बीच रह रहे परिवारों पर हर समय किसी बड़े हादसे का खतरा मंडरा रहा है।
छतें रिस रहीं, दीवारों में सीलन और नमी
अस्पताल परिसर में बने कई स्टाफ क्वार्टरों की छतें और दीवारें लंबे समय से मरम्मत की बाट जोह रही हैं। बारिश होते ही छतों से पानी टपकने लगता है और कमरों में सीलन फैल जाती है। लगातार पानी के रिसाव के चलते दीवारों की हालत भी खराब होती जा रही है। कई स्थानों पर भवन की स्थिति ऐसी नजर आती है, मानो वे कभी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकते हैं।
स्वास्थ्य कर्मचारियों का कहना है कि बारिश के दौरान सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। छत से टपकते पानी के कारण घर के सामान, राशन, कपड़े और अन्य जरूरी वस्तुओं को सुरक्षित रखना मुश्किल हो जाता है। परिवार के सदस्यों को रात में भी इस बात की चिंता बनी रहती है कि कहीं कमजोर छत या उसका प्लास्टर अचानक न गिर जाए।
24 घंटे मरीजों की सेवा करने वाले कर्मचारी खुद असुरक्षित
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मी दिन-रात मरीजों की सेवा में जुटे रहते हैं। अस्पताल में अपनी जिम्मेदारी निभाने के बाद जब कर्मचारी इन्हीं सरकारी क्वार्टरों में लौटते हैं तो यहां भी उन्हें राहत नहीं मिलती। जर्जर भवनों में रहने की मजबूरी ने कर्मचारियों की चिंता बढ़ा दी है।
कर्मचारियों के मुताबिक, लगातार नमी और पानी के रिसाव से बिजली के बोर्ड एवं वायरिंग भी प्रभावित हो रही है। ऐसी स्थिति में करंट उतरने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। विशेषकर भारी बारिश के दौरान परिवारों की चिंता और बढ़ जाती है।
तिरपाल के सहारे बारिश से बचाव
क्वार्टरों की लगातार खराब होती स्थिति के बावजूद समय पर मरम्मत नहीं होने के कारण यहां रह रहे परिवारों ने अपने स्तर पर बचाव का रास्ता निकाला है। कर्मचारियों ने क्वार्टरों की छतों पर प्लास्टिक की तिरपाल लगाकर बारिश के पानी को अंदर आने से रोकने का प्रयास किया है। हालांकि तिरपाल लगाने के बाद भी दीवारों से होने वाला पानी का रिसाव पूरी तरह बंद नहीं हो पा रहा है।
स्वास्थ्य कर्मचारियों का कहना है कि सरकारी आवास में रहने के बावजूद उन्हें अपने वेतन से तिरपाल खरीदकर लगानी पड़ रही है। इससे साफ है कि क्वार्टरों की मरम्मत को लेकर जिम्मेदार विभाग की ओर से अब तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।
हादसे के बाद जागे प्रशासन, इससे पहले हो समाधान
स्टाफ क्वार्टरों की बदहाली को लेकर स्वास्थ्य कर्मचारियों के साथ स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों में भी नाराजगी बढ़ रही है। लोगों का कहना है कि अस्पताल जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में कार्यरत कर्मचारियों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। यदि समय रहते जर्जर भवनों की मरम्मत नहीं कराई गई तो किसी दिन गंभीर हादसा हो सकता है।
स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य कर्मचारियों ने जिला प्रशासन, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी तथा खंड चिकित्सा अधिकारी से मांग की है कि जर्जर स्टाफ क्वार्टरों का तत्काल तकनीकी निरीक्षण कराया जाए। भवनों की स्थिति के अनुसार आवश्यक मरम्मत एवं जीर्णोद्धार कराया जाए और यदि कोई क्वार्टर रहने योग्य नहीं है तो वहां रह रहे कर्मचारियों के लिए तत्काल सुरक्षित वैकल्पिक आवास की व्यवस्था की जाए।
सवाल यह कि कब जागेगा जिम्मेदार अमला?
अस्पताल में मरीजों की जिंदगी बचाने और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने वाले कर्मचारी यदि स्वयं असुरक्षित भवनों में रहने को मजबूर हैं तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कर्मचारियों को तिरपाल के सहारे बारिश काटने के लिए मजबूर करने के बजाय जिम्मेदार विभाग को स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाना होगा। अब देखना यह है कि प्रशासन किसी संभावित हादसे से पहले इन जर्जर क्वार्टरों की सुध लेता है या फिर किसी अनहोनी के बाद ही जिम्मेदारों की नींद टूटेगी।


































































