संतान की दीर्घायु के लिए आज माताएं रखेंगी कमरछठ का कठिन व्रत
कोतमा में हलषष्ठी की तैयारियां पूरी, पसहर चावल और पारंपरिक पूजन सामग्री की बढ़ी मांग
रिपोर्टर भरत मिश्रा, कोतमा
कोतमा। संतान की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना को लेकर मनाया जाने वाला हलषष्ठी पर्व (कमरछठ) आज पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। पर्व को लेकर महिलाओं ने एक दिन पहले मंगलवार से ही तैयारियां शुरू कर दी थीं। नगर के चौक-चौराहों और बाजारों में पूजन सामग्री तथा विशेष रूप से पसहर चावल की बिक्री को लेकर काफी रौनक रही।
हिंदू परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम को समर्पित हलषष्ठी को कई स्थानों पर ललही छठ और हरछठ के नाम से भी जाना जाता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और सुखी जीवन की कामना के लिए कठिन व्रत रखती हैं।
पसहर चावल की मांग बढ़ी, कीमतों में भी इजाफा
हलषष्ठी पर्व को लेकर कोतमा के बाजार में पसहर यानी फसही चावल की मांग काफी बढ़ गई है। नगर के अलग-अलग स्थानों और दुकानों पर यह विशेष चावल बिक्री के लिए उपलब्ध है। बताया जा रहा है कि पिछले वर्ष की तुलना में पसहर चावल के दाम में करीब 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। इसके बावजूद महिलाएं श्रद्धा के साथ इसकी खरीदारी कर रही हैं।
पसहर चावल की विशेषता यह मानी जाती है कि इसे बिना हल चलाए खेतों में प्राकृतिक रूप से उत्पादित होने वाला अन्न माना जाता है। हलषष्ठी के व्रत में इसका विशेष धार्मिक महत्व है और व्रत के बाद महिलाएं इसी चावल का सेवन कर उपवास पूर्ण करती हैं।
बाजार में सजीं पारंपरिक पूजन सामग्री की दुकानें
हलषष्ठी पर्व को लेकर कोतमा के गांधी चौक सहित नगर के प्रमुख बाजारों में बांस से बनी टोकरी, सतंजा, महुआ, मिट्टी की चुकड़ी सहित अन्य पूजन सामग्री की दुकानें सज गई हैं। महिलाओं ने बाजार पहुंचकर आवश्यक सामग्री की खरीदारी की।
बांस से बनी टोकरी की कीमत बाजार में लगभग 150 से 300 रुपये तक बताई जा रही है। पारंपरिक पूजन सामग्री की मांग बढ़ने से बाजार में भी अच्छी चहल-पहल देखने को मिल रही है।
सगरी बनाकर होगा विधि-विधान से पूजन
हलषष्ठी पर्व पर माताएं पूजन स्थल पर सगरी खोदकर भगवान शंकर, माता गौरी और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करेंगी। पूजन में पसहर चावल, भैंस का दूध, दही, घी, बेलपत्र, कांशी, खमार, बांटी, भौरा सहित विभिन्न पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग किया जाएगा।
धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन माताएं कठोर व्रत रखती हैं। कई स्थानों पर व्रत के दौरान फल अथवा दूध का सेवन भी नहीं किया जाता। हलषष्ठी के दिन गाय के दूध के स्थान पर भैंस के दूध के उपयोग की परंपरा है।
छह प्रकार की भाजी और पसहर चावल का बनेगा प्रसाद
पूजन के बाद माताएं घर पर बिना हल के उत्पादित पसहर चावल और छह प्रकार की भाजियां पकाकर प्रसाद तैयार करेंगी। इसी प्रसाद का सेवन कर व्रत का पारण किया जाएगा। पर्व की तैयारियों में जुटी महिलाओं में इसे लेकर खासा उत्साह दिखाई दे रहा है।
सुबह से शुरू होगी षष्ठी तिथि, शुभ मुहूर्त में होगा पूजन
बताया गया है कि षष्ठी तिथि आज सुबह 6 बजकर 12 मिनट से शुरू होकर 3 सितंबर की सुबह 4 बजकर 25 मिनट तक रहेगी। पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 39 मिनट से 8 बजकर 10 मिनट तक बताया गया है।
हलषष्ठी के अवसर पर कोतमा सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी महिलाएं पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार व्रत एवं पूजन करेंगी। संतान की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा यह पर्व लोक आस्था, मातृत्व और पारंपरिक कृषि संस्कृति का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।

































































