मां नर्मदा के संरक्षण को लेकर अमरकंटक में मंथन

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  • जंगल , पहाड़ और जलस्रोतों के संरक्षण पर जोर , अमरकंटक को प्लास्टिक मुक्त बनाने का संकल्प
  • उद्गम क्षेत्र के 300 मीटर दायरे में नए निर्माण पर प्रतिबंध

संवाददाता – श्रवण कुमार उपाध्याय

अमरकंटक – मां नर्मदा के संरक्षण , संवर्धन एवं अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पवित्र नगरी अमरकंटक में महत्वपूर्ण विचार-मंथन कार्यशाला आयोजित की गई । इसमें प्रशासनिक अधिकारियों , संत-महात्माओं , पर्यावरणविदों , शिक्षाविदों , सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं नगर के प्रबुद्ध नागरिकों ने सहभागिता कर नर्मदा के प्राकृतिक स्वरूप और उद्गम क्षेत्र की पवित्रता बनाए रखने पर विचार व्यक्त किए ।

कार्यशाला में कहा गया कि मां नर्मदा केवल एक नदी नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था , संस्कृति और जीवनधारा है । इसका संरक्षण शासन-प्रशासन के साथ समाज के प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है । इस दौरान अनियंत्रित निर्माण , वनों की कटाई , पहाड़ों का क्षरण , गंदे पानी का प्रवाह और प्लास्टिक प्रदूषण जैसी समस्याओं पर गंभीर चिंता जताई गई ।

  • उद्गम क्षेत्र के 300 मीटर दायरे में निर्माण पर प्रतिबंध

एसडीएम वसीम अहमद भट्ट (IAS) ने नर्मदा संरक्षण के लिए प्रशासनिक प्रयासों की जानकारी देते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप मां नर्मदा एवं सोन नदी के उद्गम स्थलों के 300 मीटर दायरे में नए निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध की बात कही । साथ ही अन्य नालों के गंदे पानी को सीवर लाइन से जोड़कर उपचारित करने , नदी के समीप सीमेंट-कंक्रीट की सड़कों से परहेज करने तथा होटल और दुकानों के अनियंत्रित विस्तार पर रोक लगाने की आवश्यकता बताई ।
भूजल स्तर बनाए रखने के लिए वाटर हार्वेस्टिंग , जल पुनर्भरण और सीवरेज व्यवस्था को प्रभावी बनाने के साथ प्राचीन मंदिरों एवं आश्रमों के दस्तावेजीकरण पर भी जोर दिया गया ।

  • जंगल और पहाड़ सुरक्षित रहेंगे तभी बचेगी नर्मदा

नर्मदा समग्र भोपाल के सीईओ डॉ. कार्तिक सप्रे ने कहा कि अमरकंटक के जंगल , पहाड़ और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र ही मां नर्मदा के उद्गम एवं सतत प्रवाह के प्रमुख आधार हैं । उन्होंने बताया कि नर्मदा की 41 सहायक नदियां हैं और इसकी लंबाई लगभग 1312 किलोमीटर है । इसलिए पूरे नदी क्षेत्र में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना आवश्यक है ।

डॉ. संतोष शुक्ला ने कहा कि अमरकंटक में बड़े पेड़ों के साथ प्राकृतिक घास और वनस्पतियों का संरक्षण भी जरूरी है , क्योंकि ये वर्षा जल को भूमि में रोकने और मिट्टी का कटाव रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । उन्होंने पर्यावरण पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा पर जोर दिया ।

महेश सोनी ने जनभागीदारी से नदी संरक्षण और स्वच्छता अभियान चलाने की बात कही । नर्मदा मंदिर पुजारी पंडित उमेश द्विवेदी ने वनों और हरियाली को नर्मदा की जीवनरेखा बताया , जबकि स्वामी जगदीशानंद जी महाराज ने आध्यात्मिक एवं भौतिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया ।

श्रीमहंत रामभूषण दास जी महाराज ने मां नर्मदा के निर्मल एवं अविरल प्रवाह की कामना करते हुए कहा कि नदी की पवित्रता बनाए रखना प्रत्येक श्रद्धालु और नागरिक का नैतिक दायित्व है ।

IGNTU के डॉ. अखिलेश एवं डॉ. तरुण ने पृथ्वी के संसाधनों का सीमित एवं विवेकपूर्ण उपयोग करने तथा नर्मदा संरक्षण से संबंधित योजनाओं का प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई ।

  • अमरकंटक को प्लास्टिक मुक्त बनाने का संकल्प

कार्यशाला के समापन पर अमरकंटक विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष राजेंद्र भारती ने अमरकंटक को पूर्णतः प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया । उन्होंने कहा कि अमरकंटक करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र और प्रकृति की अनमोल धरोहर है । इसकी स्वच्छता एवं प्राकृतिक सुंदरता बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है । उन्होंने प्रेरक संदेश देते हुए कहा कि “हम बदलेंगे, तो युग बदलेगा।”

  • कार्यशाला में ये रहे उपस्थित –

कार्यशाला में अमरकंटक विकास प्राधिकरण अध्यक्ष राजेंद्र भारती , एसडीएम वसीम अहमद भट्ट , महेश सोनी (प्रदेश प्रभारी नर्मदा समग्र भोपाल) , डॉ. कार्तिक सप्रे , पंडित योगेश दुबे , अंबिका तिवारी , रोशन पनारिया मंडल अध्यक्ष , पार्षद पवन तिवारी , उमेश पांडेय , ओम प्रकाश अग्रवाल , रंजीत सिंह , राधेश्याम उपाध्याय , राम सरोवर द्विवेदी , श्यामलाल सेन , अंजना कटारे , बबिता सिंह , दिनेश साहू , मुख्य नगर पालिका अधिकारी चैन सिंह परस्ते , नायब तहसीलदार विनोद सिंह , पटवारी अश्वनी तिवारी , सुमित चौकसे , सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं शासकीय कर्मचारी उपस्थित रहे ।

पत्रकारिता जगत से वरिष्ठ पत्रकार धनंजय तिवारी , उमाशंकर पाण्डेय मुन्नू , श्रवण कुमार उपाध्याय एवं संजय श्रीवास ने भी सहभागिता की । कार्यक्रम का संचालन उमेश पांडेय ने किया ।

कार्यशाला में एक स्वर से यह संदेश दिया गया कि मां नर्मदा की निर्मलता और अविरलता बनाए रखने के लिए जंगल , पहाड़ , जलस्रोत और प्राकृतिक संपदा का संरक्षण जरूरी है । प्रशासन और समाज के समन्वित प्रयासों से ही अमरकंटक की आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखा जा सकता है ।

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