हाथियों के समूह से सुरक्षित रहना पहला उद्देश्य : रेंजर मिश्रा कोयलांचल समाचार के लिए रिपोर्टर शशिधर अग्रवाल

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अनूपपुर, 5 मई। अनूपपुर जिले के वन परिक्षेत्र जैतहरी अंतर्गत बीट चोलना के ग्राम पंचायत भवन पडरिया में सोमवार को वन एवं राजस्व विभाग के संयुक्त तत्वावधान में हाथियों द्वारा की जा रही फसल हानि, मकान क्षति एवं ग्रामीण सुरक्षा को लेकर समाधान शिविर आयोजित किया गया। शिविर का मुख्य उद्देश्य हाथी-मानव संघर्ष की घटनाओं को कम करना, ग्रामीणों को सतर्कता के उपाय बताना तथा क्षतिपूर्ति संबंधी समस्याओं का त्वरित निराकरण करना रहा।

 

शिविर में तहसीलदार जैतहरी रमाकांत तिवारी, वन परिक्षेत्राधिकारी जैतहरी विवेक मिश्रा, वन्यजीव संरक्षक शशिधर अग्रवाल, ग्राम पंचायत पडरिया के सरपंच भूपेन्द्र सिंह, परिक्षेत्र सहायक वेंकटनगर संतोष श्रीवास्तव, सचिव सुरेश शर्मा, पूर्व सचिव रमाकांत तिवारी, हल्का पटवारी रवि चढेर, वनरक्षक सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।

 

वन परिक्षेत्राधिकारी विवेक मिश्रा ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि हाथियों के समूह से सुरक्षित रहना ही पहला उद्देश्य होना चाहिए। उन्होंने ग्रामीणों को हाथियों के विचरण के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि हाथियों से कम से कम 100 मीटर की दूरी बनाए रखें, रात्रि में हाथियों की मौजूदगी के दौरान अनावश्यक रूप से घर से बाहर न निकलें और खेतों या जंगल किनारे बने कच्चे मकानों में रहने वाले परिवार अस्थायी रूप से सुरक्षित पक्के मकानों में शरण लें।

 

उन्होंने ग्रामीणों को यह भी समझाया कि हाथियों को आकर्षित करने वाली सामग्री जैसे महुआ, शराब, धान या अन्य खाद्य सामग्री खुले में न रखें। रात्रि विश्राम ऐसे कमरों में न करें, जहां खाद्य सामग्री संग्रहित हो। साथ ही “गजरक्षक” ऐप के उपयोग की जानकारी देते हुए ग्रामीणों के मोबाइल नंबर ऐप में पंजीकृत कराए गए, ताकि हाथियों के विचरण की पूर्व सूचना समय रहते उपलब्ध कराई जा सके।

 

रेंजर मिश्रा ने कहा कि कई बार देखा गया है कि कुछ ग्रामीण हाथियों के अत्यंत समीप पहुंचकर उन्हें देखने या भगाने का प्रयास करते हैं, जिससे अनहोनी की आशंका बढ़ जाती है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि हाथियों के करीब जाना, उन्हें छेड़ना या समूह के पास पहुंचना जानलेवा हो सकता है, इसलिए वन विभाग के निर्देशों का पालन करना सभी के हित में है।

 

तहसीलदार रमाकांत तिवारी ने शिविर में कहा कि हाथियों द्वारा फसल और मकानों को पहुंचाए जा रहे नुकसान की भरपाई राजस्व विभाग द्वारा नियमानुसार की जाएगी। उन्होंने ग्रामीणों को शासन द्वारा निर्धारित मुआवजा प्रक्रिया की जानकारी देते हुए आश्वस्त किया कि लंबित प्रकरणों का शीघ्र निराकरण कर पात्र हितग्राहियों को भुगतान कराया जाएगा। उन्होंने ग्रामीणों से अपील की कि नुकसान की सूचना समय पर दें, ताकि सर्वे कर शीघ्र मुआवजा प्रक्रिया पूरी की जा सके।

 

वन्यजीव संरक्षक शशिधर अग्रवाल ने कहा कि आने वाले समय में ग्रामीणों को हाथियों के साथ सहअस्तित्व की आदत विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि हाथी अब इस क्षेत्र की वास्तविकता बन चुके हैं और ऐसे में संघर्ष नहीं, बल्कि सतर्क सहजीवन ही समाधान है। उन्होंने यह भी कहा कि हाथियों द्वारा की जा रही वास्तविक क्षति के अनुरूप मुआवजा राशि बढ़ाए जाने की मांग जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन के माध्यम से शासन स्तर तक पहुंचाई जाएगी।

 

शिविर के दौरान ग्रामीणों ने हाथियों से हो रही फसल, मकान एवं घरेलू नुकसान की समस्याएं खुलकर अधिकारियों के सामने रखीं। कई ग्रामीणों ने वर्तमान मुआवजा राशि को वास्तविक नुकसान की तुलना में बेहद कम बताते हुए असंतोष व्यक्त किया। ग्रामीणों ने कहा कि हाथियों द्वारा खेत, बाड़ी और घरों में घुसकर लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जबकि मुआवजा राशि उस क्षति की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है।

 

ग्राम पंचायत पडरिया के सरपंच भूपेन्द्र सिंह ने ग्रामीणों से अपील की कि हाथियों के विचरण के दौरान वन विभाग को पूरा सहयोग दें और किसी भी आपात स्थिति की सूचना तत्काल संबंधित अमले को दें। उन्होंने कहा कि सामूहिक सतर्कता और समन्वय से ही जनहानि को रोका जा सकता है।

 

शिविर में उपस्थित 08 हितग्राहियों ने पूर्व में प्राप्त मुआवजा राशि पर असंतोष जताते हुए कहा कि उन्हें मिली राशि वास्तविक नुकसान के मुकाबले बहुत कम है। कुछ ग्रामीण महिलाओं ने आरोप लगाया कि हाथियों के गांव में घुसने के दौरान कई बार वन विभाग के गश्ती दल द्वारा हाथियों को सुरक्षित तरीके से दूर करने के बजाय ग्रामीणों और महिलाओं के साथ असंवेदनशील व्यवहार किया गया, जिससे उनमें आक्रोश है।

 

कुछ ग्रामीणों ने यह भी बताया कि उनके मकानों में पिछले कई वर्षों से हाथियों का लगातार प्रवेश हो रहा है। हाथियों द्वारा मकानों में तोड़फोड़ कर नुकसान पहुंचाया गया, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे मकानों की मरम्मत नहीं करा सके। कई परिवार आज भी पन्नी और तिरपाल के अस्थायी टेंट बनाकर रहने को मजबूर हैं।

 

शिविर में यह बात भी सामने आई कि कुछ स्थानों पर ग्रामीणों द्वारा हाथियों के अत्यधिक करीब पहुंचकर उन्हें मारने, छेड़ने या भगाने की कोशिश की जाती है, जिससे स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। वन विभाग के गश्ती दल के साथ अभद्र व्यवहार की शिकायतें भी सामने आईं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ऐसी गतिविधियां न केवल कानूनन गलत हैं, बल्कि पूरे गांव की सुरक्षा के लिए भी खतरनाक हैं।

 

समाधान शिविर में ग्रामीणों की समस्याएं सुनने के साथ-साथ विभागीय अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि हाथी-मानव संघर्ष को कम करने, जनहानि रोकने और मुआवजा प्रक्रिया को सरल व प्रभावी बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे। शिविर में बड़ी संख्या में ग्रामीणों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि हाथियों की समस्या अब केवल वन विभाग का विषय नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की साझा चिंता बन चुकी है।

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