मजदूर चौक से उठता सवाल कोयला खदान बंद, फिर भी जमीन का मामला अधूरा क्यों?

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कक्का की चौपाल
कैलाश पाण्डेय

मजदूर चौक से उठता सवाल कोयला खदान बंद, फिर भी जमीन का मामला अधूरा क्यों?

मजदूर चौक से थोड़ी दूर पर चौपाल आज भी वैसी ही थी। मजदूर चौक का वही चबूतरा, और सामने से गुजरती कोतमा के लिए सड़क। कभी इसी चौपाल पर खदान की पाली बदलने के बाद मजदूर बैठकर दिनभर की बातें किया करते थे। अब जमुना-कोतमा क्षेत्र की कई भूमिगत खदानें वर्षों पहले बंद हो चुकी हैं, लेकिन चौपाल पर जमीन का सवाल आज भी खुला पड़ा था

उस शाम कक्का चुपचाप बैठे थे। पास में घसीटा, चौरंगी लाल और खबरी लाल बैठे थे। खबरी लाल के हाथ में एक कागज था। उसने उसे कई बार पलटा, फिर बोला, “कक्का, समझ में नहीं आता खदान बंद हो गई, काम बंद हो गया, राजाओं की रियासत चली गई लेकिन कालरी की जमीन का मामला क्यों बंद नहीं होता?”
घसीटा ने तुरंत कहा, “क्योंकि जमीन कोई कोयला नहीं है खबरी लाल, कि निकाल लिया और बात खत्म!”
खबरी लाल ने उसकी ओर देखा, “मैं भी यही कह रहा हूं। खदान चलाने के लिए जमीन ली गई थी। भूमिगत खदानें वर्षों पहले बंद हो चुकी हैं। तो फिर जमीन का हिसाब भी साफ होना चाहिए या नहीं?”
चौरंगी लाल ने कागज की ओर देखते हुए पूछा, “इसमें क्या लिखा है?

खबरी लाल बोला, “कभी सर्वे के नाम पर नोटिस, कभी अनाधिकृत कब्जे का नोटिस, कभी निर्माण को लेकर सवाल। यहां रहने वाला आदमी आखिर समझे तो समझे क्या?”
घसीटा ने सवाल किया, “तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे नोटिस नहीं, पहेली आ रही हो!”
“पहेली ही तो है!” खबरी लाल ने तेज स्वर में कहा, “जिस जमीन पर आदमी वर्षों से रह रहा है, जहां उसका घर है, उसकी जिंदगी है, अचानक कागज आकर कहता है निर्माण अनाधिकृत है। अब आदमी जाए तो जाए कहां?”
कक्का अब तक चुप थे। उन्होंने धीरे से मिट्टी उठाई और हथेली पर रखते हुए बोले, “जमीन का सवाल केवल कागज का सवाल नहीं होता। उसके पीछे रहवासियों की उम्मीद होती है, मजदूर का घर होता है और गरीब परिवार का भविष्य होता है

चौरंगी लाल ने कहा, “और सबसे बड़ी परेशानी यह है कि यहां लोगों को साफ-साफ पता ही नहीं कि जमीन की स्थिति आखिर है क्या।”
“बस!” खबरी लाल ने बात पकड़ ली, “यही तो असमंजस है। कालरी प्रबंधन की अपनी प्रक्रिया है, जमीन पर रहने वाले लोगों की अपनी मजबूरी है और बीच में नोटिस आ जाता है। फिर सर्वे होता है। फिर इंतजार। साल निकल जाते हैं।”
घसीटा ने कहा, “और जब तक एक सवाल का जवाब मिले, दूसरा सवाल खड़ा हो जाता है

खबरी लाल ने कागज मोड़ते हुए कहा, “यही अनिश्चितता सबसे बड़ी परेशानी है। गरीब आदमी घर बनाना चाहता है, लेकिन जमीन का आवासीय पट्टा नहीं है। प्रधानमंत्री आवास योजना का पात्र होने के बावजूद जमीन की स्थिति रास्ता रोक देती है। फिर वही परिवार पूछता है सरकार घर देने को तैयार है, लेकिन घर बनाने के लिए जमीन का अधिकार कौन देगा?”
चौपाल पर कुछ क्षण सन्नाटा रहा

कक्का ने धीरे से कहा, “और जब किसी परिवार को बार-बार नोटिस मिलता है, तो वह सिर्फ कागज नहीं पढ़ता… वह अपने भविष्य को पढ़ने की कोशिश करता है।”
चौरंगी लाल ने पूछा, “लेकिन कक्का, यह मामला आखिर इतना उलझ क्यों रहा है?

कक्का ने सड़क की ओर देखते हुए कहा, “जब किसी जमीन का उद्देश्य समाप्त होने के बाद भी उसकी स्थिति स्पष्ट न हो, तो असमंजस पैदा होता है। फिर उस असमंजस में तरह-तरह की बातें जुड़ती जाती हैं। कोई इसे प्रबंधन की उलझन कहता है, कोई प्रशासनिक मामला, कोई राजनीति से जोड़कर देखता है। लेकिन चौपाल को धारणाओं से मतलब नहीं, सवाल से मतलब है

खबरी लाल ने पूछा, “कौन-सा सवाल?”
कक्का ने साफ स्वर में कहा, “नियम क्या कहते हैं? खदान के लिए ली गई जमीन का खनन समाप्त होने के बाद नियमानुसार क्या होना चाहिए? और वर्षों से वहां रह रहे लोगों की जमीन और आवास की स्थिति कब स्पष्ट होगी?”
घसीटा ने सिर हिलाया, “मतलब असली समस्या नोटिस नहीं, नोटिस के पीछे छिपी अनिश्चितता है।”
“हां,” कक्का बोले, “नोटिस एक कागज है। लेकिन उसके पीछे किसी परिवार की पूरी रात जाग सकती है।”
खबरी लाल कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “कक्का, खदानों की सुरंगें बंद हैं, मशीनें शांत हैं, कोयला निकलना बंद है… फिर भी जमीन की लीज का सवाल क्यों जिंदा है?”
कक्का ने मिट्टी की ओर देखते हुए कहा, “क्योंकि खदान बंद हो सकती है, लेकिन जमीन पर रहने वाले आदमी का जीवन बंद नहीं हो सकता

दूर मजदूर चौक से आती रोशनी चौपाल तक पहुंची और फिर धीरे-धीरे धुंधली पड़ गई।
खबरी लाल ने हाथ में पकड़े नोटिस को देखा और धीमे से बोला
“कक्का, शायद अब सवाल यह नहीं कि खदान कब बंद हुई… सवाल यह है कि बंद खदान की जमीन का भविष्य क्या है?”
कक्का ने कोई उत्तर नहीं दिया।
चौपाल फिर शांत हो गई।
लेकिन उस रात मजदूर चौक की ओर जाती सड़क पर जैसे एक सवाल छोड़ कर चला गया
खदान बंद हो गई, तो जमीन पर रहने वाले लोगों की अनिश्चितता कब खत्म होगी?

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