भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी 5.71 लाख की पुलिया: ‘कंक्रीट कैंसर’ का शिकार हो रहा निर्माण, बड़े हादसे को न्योता

जमुना कोतमा ग्राम पंचायतों में विकास के नाम पर सरकारी खजाने की किस कदर खुली लूट मची है, इसकी सबसे ताज़ा और खौफनाक बानगी अनूपपुर जिले की ग्राम पंचायत पायरी क्रमांक 1 में देखी जा सकती है। यहाँ जोगी कुंड चौरा धाम के पास 5.71 लाख रुपये की लागत से बन रही पुलिया महज एक निर्माण नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की जीती-जागती मिसाल बन गई है। मौके की तस्वीरें चीख-चीख कर गवाही दे रही हैं कि गुणवत्ता को ताक पर रखकर किस तरह निर्माण सामग्री के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। लाखों रुपये खर्च करके बनाई जा रही यह पुलिया ग्रामीण विकास के कम आएगी और किसी बड़े हादसे को न्योता ज्यादा देगी। इस पूरे खेल में निर्माण कार्य की निगरानी करने वाली सब-इंजीनियर नेहा सिंह और एसडीओ (SDO) की रहस्यमयी चुप्पी व कार्यप्रणाली गंभीर सवालों के घेरे में है
तकनीकी खामियां और ‘कंक्रीट कैंसर’ का शिकार ढांचा
पुलिया निर्माण में लापरवाही और सामग्री बचाने का खेल बेहद सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। सिविल इंजीनियरिंग के बुनियादी नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे इस निर्माण में ढलाई के दौरान गैप वाली अमानक शटरिंग का उपयोग किया गया और वाइब्रेटर का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं हुआ। नतीजतन, सीमेंट का घोल बह गया और दीवार में सिर्फ सूखी गिट्टी बची रह गई है, जहाँ ढलाई का काम चल रहा है, वहाँ कंक्रीट को अच्छे से सेट करने के लिए किसी ‘कंक्रीट वाइब्रेटर’ (vibrator) मशीन का इस्तेमाल होता नहीं दिख रहा है। बिना वाइब्रेटर के, कंक्रीट के अंदर हवा के बुलबुले (voids) रह जाते हैं, जिससे कंक्रीट में ‘हनीकॉम्बिंग’ (छत्ते जैसी दरारें) आ जाती है और मजबूती घट जाती है। बारिश में जब पानी का तेज बहाव इससे टकराएगा, तो यह दीवार पानी के मामूली दबाव से ही भरभरा कर ढह सकती है इसके अलावा, निर्माण की लागत बचाने के चक्कर में कंक्रीट का मिश्रण जानबूझकर बेहद कमजोर और अमानक तैयार किया गया है। किसी भी पुलिया की मजबूती सरियों के सही जाल पर निर्भर करती है, लेकिन यहाँ सरिया बचाने की पूरी कोशिश की गई है। सरिया इतना बेतरतीब बंधा है कि ट्रैक्टर या कोई भारी मालवाहक वाहन गुजरने पर पुलिया वजन का संतुलन नहीं सह पाएगी और बीच से टूट सकती है। हद तो यह है कि ठेकेदार और निर्माण एजेंसी द्वारा कंक्रीट की ढलाई अक्सर उस वक्त की जाती है, जब मौके पर कोई तकनीकी अधिकारी मौजूद ही नहीं होता।
एसी कमरों से मॉनिटरिंग और अधिकारियों का संरक्षण
इन गंभीर तकनीकी खामियों को देखकर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि सब-इंजीनियर नेहा सिंह आखिर कर क्या रही हैं? नियमों के तहत कंक्रीट की ढलाई हमेशा इंजीनियर की मौजूदगी में होनी चाहिए। ऐसे में यह संदेह पैदा होता है कि क्या उनका काम सिर्फ जनपद कार्यालय के एसी कमरों में बैठकर एस्टीमेट बनाना और बिना मौके पर गए, ठेकेदार की सहूलियत के लिए आंख मूंदकर मूल्यांकन पुस्तिका (MB) भर देना रह गया है? वहीं ब्लॉक स्तर पर बैठे एसडीओ के निरीक्षण और दावों की भी यह जर्जर पुलिया हवा निकाल रही है। पायरी क्रमांक 1 का नाम भ्रष्टाचार के मामलों में आना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी यहाँ गड़बड़ियों के कई मामले सामने आ चुके हैं, लेकिन जिला स्तर पर बैठे उच्च अधिकारियों ने मानो आंखों पर पट्टी बांध रखी है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिले के आला पदाधिकारी भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के बजाय उसे संरक्षण दे रहे हैं, यही वजह है कि बार-बार नाम आने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है
कलेक्टर से तकनीकी ऑडिट और भुगतान रोकने की मांग
पायरी क्रमांक 1 में निर्माण एजेंसी और तकनीकी अधिकारियों के इस गठजोड़ से हो रही दिनदहाड़े लूट के खिलाफ ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। क्षेत्र के जागरूक नागरिकों ने जिला कलेक्टर मामले में तत्काल संज्ञान लेने की मांग की है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि मौके का सख्त ‘तकनीकी ऑडिट’ और गुणवत्ता की लैब टेस्टिंग कराई जाए। इसके साथ ही, गड़बड़ी सिद्ध होने तक इस पुलिया से जुड़े हर तरह के भुगतान पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए और जनता के पैसे की बर्बादी करने वाले इंजीनियरों व निर्माण एजेंसी के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई हो। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में जांच का चाबुक चलाता है या फिर भ्रष्टाचार की यह खोखली पुलिया सिस्टम की लापरवाही के नीचे दबकर किसी बड़े हादसे का इंतजार करेगी।
मामले में पक्ष जानने के लिए जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्रीमती अर्चना कुमारी के मोबाइल नंबर 9131074485 पर संपर्क किया गया, लेकिन फोन की घंटी लगातार बजती रही और कॉल रिसीव नहीं की गई। इसी प्रकार जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी रवि ग्वाल के मोबाइल नंबर 9630192439 पर भी संपर्क करने का प्रयास किया गया, किंतु उन्होंने भी फोन नहीं उठाया। दोनों जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा जवाब देने से परहेज किए जाने से पूरे मामले को लेकर संदेह और गहरा गया है। आमजन के बीच यह चर्चा है कि यदि आरोप निराधार हैं तो अधिकारी अपना पक्ष सामने क्यों नहीं रख रहे हैं। अधिकारियों की चुप्पी से यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं वे इस कथित भ्रष्टाचार के संबंध में जानकारी रखने वाले या इसके हिस्सेदार तो नहीं हैं। हालांकि इस संबंध में अधिकारियों का पक्ष प्राप्त नहीं हो सका।






































