अनूपपुर में शिक्षकों के संलग्नीकरण पर शासन के आदेश बेअसर, वर्षों से छात्रावासों में जमे अधीक्षक

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अनूपपुर में शिक्षकों के संलग्नीकरण पर शासन के आदेश बेअसर, वर्षों से छात्रावासों में जमे अधीक्षक

आठ साल से छात्रावासों में पदस्थ शिक्षक, स्कूलों में अतिथि शिक्षकों के भरोसे पढ़ाई; कलेक्टर और विभागीय मंत्री के निर्देश भी नहीं करा सके व्यवस्था में बदलाव

संलग्नीकरण समाप्त करने के आदेशों की अनदेखी का आरोप, शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

जमुना कोतमा। जिले में शिक्षकों के संलग्नीकरण की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। शासन स्तर से बार-बार जारी निर्देशों के बावजूद अनूपपुर और कोतमा विकासखंड सहित जिले के विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षक वर्षों से छात्रावासों में अधीक्षक के पद पर पदस्थ हैं, जबकि कुछ शिक्षक विद्यालयों से हटकर शासकीय कार्यालयों में गैर शिक्षकीय कार्य कर रहे हैं। इससे एक ओर विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी ओर शासन के निर्देशों के पालन को लेकर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

स्थिति यह है कि कुछ शिक्षक लंबे समय से छात्रावासों में अधीक्षक का दायित्व संभाल रहे हैं। वहीं, उनके मूल पदस्थापना वाले विद्यालयों में शिक्षण कार्य प्रभावित होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। कुछ मामलों में संबंधित विद्यालयों में अतिथि शिक्षकों के माध्यम से अध्यापन कार्य संचालित किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब शासन शिक्षकों को उनके मूल पदस्थापना वाले विद्यालयों में वापस भेजने के स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका है, तो फिर जिले में संलग्नीकरण की व्यवस्था अब तक पूरी तरह समाप्त क्यों नहीं हो सकी है?

शासन के स्पष्ट निर्देश, फिर भी जारी है संलग्नीकरण

लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों में शिक्षकों को गैर शिक्षकीय कार्यों में लगाए जाने पर रोक लगाने और ऐसे कार्यों में संलग्न शिक्षकों को तत्काल कार्यमुक्त कर उनके मूल पदस्थापना वाले विद्यालयों में वापस भेजने के निर्देश दिए गए हैं।

निर्देशों में स्पष्ट किया गया था कि शिक्षकों से शिक्षण कार्य ही कराया जाए, ताकि विद्यालयों में नियमित पढ़ाई सुचारू रूप से संचालित हो सके। भविष्य में भी किसी शिक्षक को गैर शिक्षकीय कार्य में नहीं लगाए जाने की हिदायत दी गई थी। आदेशों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई थी।

नए शिक्षण सत्र में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सरकार की गंभीरता के बीच लोक शिक्षण संचालनालय ने एक बार फिर सभी जिलों के कलेक्टर, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों, संभागीय संयुक्त संचालकों और जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश जारी किए थे। इसमें पूर्व में जारी आदेशों का हवाला देते हुए गैर शिक्षकीय कार्यों में लगे शिक्षकों को तत्काल कार्यमुक्त कर मूल पदस्थापना वाले विद्यालयों में भेजने के लिए कहा गया था।

इसके बावजूद जिले में वर्षों से छात्रावासों में अधीक्षक के रूप में शिक्षकों की पदस्थापना बने रहने से शासन के आदेशों के क्रियान्वयन पर सवाल उठ रहे हैं।

आठ साल से छात्रावास में पदस्थ, मूल विद्यालय में अतिथि शिक्षक से काम

जिले में सामने आए मामलों के अनुसार, अनूपपुर और कोतमा विकासखंड के अंतर्गत कई शिक्षक लंबे समय से छात्रावासों में अधीक्षक के पद पर कार्यरत हैं। इनमें कुछ शिक्षकों को उनके मूल विद्यालय से दूर अन्य विकासखंडों में भी संलग्न किए जाने की जानकारी सामने आई है।

कोतमा विकासखंड में उत्कृष्ट अनुसूचित जनजाति कन्या सीनियर छात्रावास से संबंधित व्यवस्था के बीच शासकीय प्राथमिक शाला छपराटोला में पदस्थ शिक्षक राधा प्रजापति के अनुसूचित जाति कन्या छात्रावास कोतमा में लगभग आठ वर्षों से अधीक्षक के रूप में संलग्न रहने की जानकारी सामने आई है।

इसी प्रकार, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बहेराबांध में पदस्थ प्राथमिक शिक्षक रामखेलावन प्रजापति के लगभग तीन वर्षों से अनुसूचित जनजाति बालक आश्रम बहेराबांध में अधीक्षक के रूप में कार्यरत रहने की जानकारी दी गई है।

अनूपपुर विकासखंड में माध्यमिक शाला मुड़धोवा, देवगवां में पदस्थ शिक्षक किशोरी पुसाम को जैतहरी विकासखंड के जरियारी स्थित कन्या छात्रावास में लगभग आठ वर्षों से संलग्न किए जाने की बात सामने आई है।

बताया जा रहा है कि किशोरी पुसाम के मूल विद्यालय में शिक्षण कार्य संचालित करने के लिए अतिथि शिक्षक की व्यवस्था की गई है। यदि यह स्थिति सही है, तो एक ओर नियमित शिक्षक विद्यालय से बाहर कार्य कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उसी विद्यालय में शिक्षण कार्य के लिए अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ रही है। इससे शासन पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ने के साथ-साथ नियमित शिक्षण व्यवस्था और मानव संसाधन के उपयोग को लेकर भी सवाल उठते हैं।

हालांकि, इन मामलों में संबंधित शिक्षकों की वर्तमान पदस्थापना, संलग्नीकरण आदेशों की वैधता और विभागीय स्वीकृति की स्थिति की आधिकारिक पुष्टि होना अभी शेष है।

कलेक्टर के आदेश भी कागजों तक सीमित?

जिले में पूर्व में कलेक्टर द्वारा भी गैर शिक्षकीय कार्यों तथा छात्रावासों में अधीक्षक के पद पर संलग्न शिक्षकों को तत्काल उनके मूल विद्यालयों में वापस भेजने के निर्देश जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है।

बताया जाता है कि कलेक्टर के निर्देश के बाद सहायक आयुक्त कार्यालय द्वारा छात्रावासों में अधीक्षक के पद पर पदस्थापना के लिए आवेदन भी आमंत्रित किए गए थे। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि शिक्षकों को उनके मूल विद्यालयों में वापस भेजकर छात्रावासों में अधीक्षकों की अलग व्यवस्था की जा सके।

लेकिन संबंधित प्रक्रिया आगे बढ़ने के बजाय कागजों तक सीमित रह जाने की बात कही जा रही है। यदि ऐसा है, तो यह प्रशासनिक निर्देशों के पालन और विभागीय जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

विभागीय मंत्री के निर्देशों का भी नहीं दिखा असर

अमरकंटक में आयोजित विभागीय बैठक के दौरान संबंधित विभागीय मंत्री द्वारा अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए जाने की जानकारी भी सामने आई है। मंत्री ने गैर शिक्षकीय कार्यों तथा छात्रावासों में अधीक्षक के पद पर कार्यरत शिक्षकों को उनके मूल विद्यालयों में वापस भेजने की बात कही थी।

इसके साथ ही छात्रावासों में अधीक्षकों की व्यवस्था संविदा आधार पर शासन स्तर से किए जाने की बात भी कही गई थी, ताकि छात्रावासों में बच्चों की देखरेख और शैक्षणिक वातावरण को बेहतर बनाया जा सके।

इसके बावजूद जिले में लंबे समय से संलग्न शिक्षकों की व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव नहीं होने से विभागीय निर्देशों के पालन पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह भी है कि जब शासन और जिला प्रशासन दोनों स्तरों पर निर्देश जारी किए जा चुके हैं, तो संबंधित अधिकारियों द्वारा उनका पालन सुनिश्चित क्यों नहीं कराया जा रहा है?

आखिर किसके संरक्षण में वर्षों से बनी हुई है व्यवस्था?

जिले में वर्षों से एक ही स्थान पर छात्रावास अधीक्षक के रूप में कार्यरत शिक्षकों को लेकर विभागीय स्तर पर संरक्षण दिए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। सूत्रों के हवाले से संभाग स्तर पर शिक्षा विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी के संरक्षण की चर्चा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना बाकी है।

ऐसे में यह आवश्यक है कि विभागीय अधिकारी संलग्नीकरण से जुड़े आदेशों, पदस्थापना की अवधि, संबंधित शिक्षकों की मूल पदस्थापना और छात्रावासों में अधीक्षक के पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया की जांच कर स्थिति स्पष्ट करें।

 विद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था पर असर, जवाबदेही तय करने की मांग

शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को नियमित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे में यदि नियमित शिक्षकों को लंबे समय तक गैर शिक्षकीय कार्यों में लगाए रखा जाता है और उनके मूल विद्यालयों में अतिथि शिक्षकों के माध्यम से व्यवस्था संचालित की जाती है, तो यह व्यवस्था की समीक्षा का विषय बनता है।

जिले में संलग्नीकरण की वास्तविक स्थिति, छात्रावासों में अधीक्षकों की स्वीकृत और रिक्त पद संख्या, शिक्षकों की मूल पदस्थापना तथा अतिथि शिक्षकों पर होने वाले अतिरिक्त व्यय का विवरण सार्वजनिक किए जाने की जरूरत है।

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग शासन के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाते हैं। क्या वर्षों से छात्रावासों में जमे शिक्षकों को उनके मूल विद्यालयों में वापस भेजा जाएगा? क्या छात्रावासों में अधीक्षकों की नियुक्ति के लिए पारदर्शी व्यवस्था लागू होगी? और क्या संलग्नीकरण के मामलों में जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाएगी?

फिलहाल, जिले में संलग्नीकरण की व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब शासन के निर्देश स्पष्ट हैं, तो उनका पालन कराने की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी अब तक कार्रवाई क्यों नहीं कर सके?

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