आदिवासी भूमि विवाद में नया मोड़, अपर कलेक्टर के आदेश पर उठे सवाल

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आदिवासी भूमि विवाद में नया मोड़, अपर कलेक्टर के आदेश पर उठे सवाल

7 अक्टूबर 2026 को आदेश के लिए नियत प्रकरण में 29 सितंबर को ही आदेश पारित करने का आरोप, निष्पक्ष जांच की मांग

SDO के फैसले में नक्शा सुधार और आदिवासी भूमि के नामांतरण पर उठे थे सवाल, अपीलीय कार्यवाही की पारदर्शिता पर प्रार्थी ने जताई आपत्ति

वाड्रफनगर/अंबिकापुर। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के वाड्रफनगर क्षेत्र में ग्राम रजखेता की आदिवासी भूमि से जुड़े विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। राजस्व अभिलेखों में कथित त्रुटि सुधार, भूमि के नाम में बदलाव, बाद में हुई बिक्री और न्यायालयीन कार्यवाही को लेकर उठे सवालों के बीच अब अपर कलेक्टर न्यायालय के आदेश की तारीख को लेकर भी विवाद सामने आया है। प्रार्थी पक्ष ने आरोप लगाया है कि जिस प्रकरण में 7 अक्टूबर 2026 को आदेश पारित किया जाना निर्धारित था, उसमें 29 सितंबर 2026 को ही आदेश पारित कर प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिया गया। प्रार्थी ने इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है

अधिवक्ता डॉ. डी.के. सोनी, नवापारा, अंबिकापुर के अनुसार, प्रकरण में तत्कालीन अपर कलेक्टर आर.एन. पाण्डेय की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। प्रार्थी पक्ष ने आरोप लगाया है कि उसे प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिला। साथ ही निर्णय को कथित आर्थिक लेन-देन से प्रभावित किए जाने का आरोप भी लगाया गया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित अधिकारी और आरोपों में नामित व्यक्तियों का पक्ष सामने आना बाकी है।

वर्ष 2017 के त्रुटि सुधार आदेश से शुरू हुआ विवाद

मामले की शुरुआत ग्राम रजखेता की भूमि से संबंधित राजस्व अभिलेखों में किए गए कथित त्रुटि सुधार से हुई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, तहसीलदार वाड्रफनगर के राजस्व प्रकरण क्रमांक 97/अ-6-अ/2016-17 में 17 अक्टूबर 2017 को आदेश पारित किया गया था।

आरोप है कि आदिवासी रामसुन्दर पिता बोधन गोड़ के स्वामित्व वाली खसरा नंबर 1035, रकबा 0.28 हेक्टेयर भूमि के नक्शे में सुधार की कार्यवाही के दौरान भूमि सामान्य वर्ग के रामस्वरूप पिता रामवृक्ष के नाम दर्ज हो गई। प्रार्थी पक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया में संबंधित पक्षकार को समुचित सूचना नहीं दी गई और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं मिला।

भूमि के स्वामित्व और राजस्व अभिलेखों में बदलाव से जुड़ा यह मामला बाद में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) वाड्रफनगर के न्यायालय पहुंचा, जहां वर्ष 2017 में पारित आदेश की वैधता और प्रक्रिया पर विचार किया गया।

SDO न्यायालय ने 29 सितंबर 2025 को निरस्त किया था आदेश

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) वाड्रफनगर ने 29 सितंबर 2025 को तहसीलदार के 17 अक्टूबर 2017 के त्रुटि सुधार आदेश को निरस्त कर दिया था। इसके साथ ही राजस्व अभिलेखों को पूर्व स्थिति में बहाल करने का आदेश दिया गया था।

SDO न्यायालय की कार्यवाही में नक्शा सुधार के आधार, संबंधित भूमि की स्थिति और प्रभावित पक्षकार को सुनवाई का अवसर दिए जाने जैसे बिंदुओं पर गंभीर सवाल उठाए गए थे। इसी आदेश के बाद प्रकरण उच्च राजस्व अधिकारी के समक्ष अपील के रूप में पहुंचा।

प्रार्थी पक्ष का कहना है कि जब निचली राजस्व अदालत ने त्रुटि सुधार की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आदेश निरस्त किया था, तब अपीलीय न्यायालय में उन सभी तथ्यों, दस्तावेजों और आपत्तियों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक था।

2.5 किलोमीटर दूर स्थित खसरों के नक्शा सुधार पर सवाल

इस विवाद का एक प्रमुख पहलू खसरा नंबर 1035 और खसरा नंबर 1273 के बीच की दूरी है। उपलब्ध विवरण में दोनों भूमि के बीच करीब 2.5 किलोमीटर की दूरी होने की बात कही गई है।

प्रार्थी पक्ष ने सवाल उठाया है कि यदि दोनों खसरे एक-दूसरे से लगे हुए या समीपवर्ती नहीं थे, तो नक्शा सुधार की प्रक्रिया किस आधार पर की गई? संबंधित प्रस्ताव किस राजस्व अभिलेख, स्थल निरीक्षण और तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया था?

SDO न्यायालय के आदेश में भी नक्शा सुधार प्रस्ताव और उसके आधार पर सवाल उठाए जाने का उल्लेख है। इस कारण मामले में राजस्व निरीक्षक की भूमिका, प्रस्ताव तैयार करने की प्रक्रिया और अभिलेखों में हुए बदलाव की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हालांकि, खसरों की वास्तविक स्थिति और नक्शा सुधार की वैधता के संबंध में अंतिम निष्कर्ष के लिए मूल राजस्व रिकॉर्ड, नक्शे, आदेशों और अन्य संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण आवश्यक होगा।

आदिवासी भूमि संरक्षण के प्रावधानों का भी मामला

प्रकरण में आदिवासी भूमि के संरक्षण से संबंधित कानूनी प्रावधानों का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, SDO न्यायालय ने अपने आदेश में इस आशंका का उल्लेख किया था कि भ्रामक प्रतिवेदन के आधार पर नक्शा सुधार के माध्यम से आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासी व्यक्ति के नाम दर्ज कराने की कोशिश की गई हो सकती है।

प्रभावित पक्ष को नोटिस नहीं दिए जाने और सुनवाई का अवसर नहीं मिलने संबंधी आपत्तियों पर भी विचार किया गया था। प्रार्थी पक्ष का कहना है कि ऐसे मामले में केवल राजस्व रिकॉर्ड में सुधार की प्रक्रिया देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी जांचना जरूरी है कि संबंधित भूमि के स्वामित्व, कब्जे और हस्तांतरण से जुड़े सभी कदम लागू कानूनों के अनुरूप थे या नहीं।

यह मामला आदिवासी भूमि के अधिकारों की सुरक्षा और राजस्व अभिलेखों की विश्वसनीयता के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गया है।

रिकॉर्ड में बदलाव के बाद जमीन की बिक्री का भी उल्लेख

उपलब्ध विवरण के अनुसार, SDO न्यायालय के समक्ष यह तथ्य भी आया था कि कथित त्रुटि सुधार के बाद संबंधित भूमि की बिक्री सत्यानन्द पाण्डेय पिता सूर्यमंडी पाण्डेय तथा आकेत जायसवाल पिता अनिल जायसवाल के नाम किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

प्रार्थी पक्ष ने इस घटनाक्रम की जांच की मांग की है। उसका कहना है कि राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव किस आधार पर हुआ, उसके बाद भूमि का हस्तांतरण किन परिस्थितियों में किया गया और पूरी प्रक्रिया में संबंधित अधिकारियों की क्या भूमिका रही, इन सभी बिंदुओं की जांच होनी चाहिए।

SDO न्यायालय द्वारा राजस्व निरीक्षक की भूमिका तथा कथित कूटरचना के संबंध में जांच और संभावित आपराधिक कार्रवाई की आवश्यकता का उल्लेख किए जाने की बात भी उपलब्ध विवरण में कही गई है। हालांकि, किसी व्यक्ति की आपराधिक संलिप्तता का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच एजेंसी और न्यायालय की प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है।

अपर कलेक्टर न्यायालय में पहुंची अपील

SDO के 29 सितंबर 2025 के आदेश के विरुद्ध अपर कलेक्टर, वाड्रफनगर के न्यायालय में अपील दायर की गई थी। उपलब्ध दस्तावेजी विवरण के अनुसार, प्रकरण क्रमांक 202509960100127 में धारा 52 के तहत भी आवेदन प्रस्तुत किया गया था।

बताया गया है कि 6 अक्टूबर 2025 को अपर कलेक्टर न्यायालय ने दस्तावेजों के अवलोकन के बाद प्रथम दृष्टया सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति अपीलार्थी के पक्ष में मानते हुए SDO के आदेश के क्रियान्वयन पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।

इसके बाद प्रकरण में अलग-अलग तारीखों पर पक्षकारों की उपस्थिति, दस्तावेजों और तर्कों से संबंधित कार्यवाही आगे बढ़ी। प्रार्थी पक्ष का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में उसके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों और आपत्तियों पर समुचित विचार किया जाना आवश्यक था।

16 सितंबर को लिखित तर्क, 7 अक्टूबर को आदेश की तारीख

उपलब्ध कार्यवाही विवरण के अनुसार, 19 अगस्त 2026 को दोनों पक्षों के अधिवक्ता उपस्थित हुए और तर्क प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा गया। इसके बाद 16 सितंबर 2026 को दोनों पक्षों की ओर से लिखित तर्क प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख है तथा प्रकरण आदेशार्थ रखा गया।

प्रार्थी पक्ष के अनुसार, अंतिम आदेश के लिए 7 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित थी। लेकिन आरोप है कि आदेश 29 सितंबर 2026 को ही पारित कर प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिया गया।

इसी तारीख संबंधी विसंगति को लेकर प्रार्थी ने सवाल उठाए हैं। उसका कहना है कि यदि प्रकरण वास्तव में 7 अक्टूबर को आदेश के लिए नियत था, तो 29 सितंबर को आदेश पारित करने की प्रक्रिया क्या थी और क्या दोनों पक्षों को इसकी जानकारी तथा आदेश की प्रति उपलब्ध कराई गई थी?

इस बिंदु पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए न्यायालय की प्रमाणित आदेश-पत्रिका, आदेश की प्रति, प्रकरण की अगली तारीख दर्ज करने वाले अभिलेख और संबंधित न्यायालयीन रिकॉर्ड का परीक्षण जरूरी है। केवल तारीखों में अंतर होने से अपने आप आदेश की अवैधता सिद्ध नहीं होती, लेकिन यदि निर्धारित प्रक्रिया या सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हुआ है, तो उस पर सक्षम मंच के समक्ष सवाल उठाए जा सकते हैं।

अपर कलेक्टर आर.एन. पाण्डेय पर आर्थिक लेन-देन के आरोप

प्रार्थी पक्ष ने तत्कालीन अपर कलेक्टर आर.एन. पाण्डेय पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि कथित आर्थिक लेन-देन के आधार पर निर्णय को प्रभावित किया गया और इससे सत्यानन्द पाण्डेय तथा आकेत जायसवाल को लाभ पहुंचा।

प्रार्थी ने यह भी आरोप लगाया है कि उसे प्रभावी रूप से सुने बिना आदेश पारित किया गया और उसकी आपत्तियों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। इन्हीं आरोपों के आधार पर मामले में निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है।

हालांकि, कथित रिश्वत या आर्थिक लेन-देन के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। न ही प्रस्तुत विवरण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी सक्षम जांच एजेंसी या न्यायालय ने भ्रष्टाचार अथवा मिलीभगत को प्रमाणित किया है। संबंधित अधिकारी और नामित व्यक्तियों का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले के सभी पहलुओं का संतुलित आकलन किया जा सकेगा।

अधिकारी के स्थानांतरण के बाद भी उठ रहे सवाल

प्रार्थी पक्ष के अनुसार, मामले की कार्यवाही के दौरान संबंधित अधिकारी का स्थानांतरण हो गया था। इसी संदर्भ में आदेश पारित करने की तारीख और प्रकरण को नस्तीबद्ध किए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

प्रार्थी की मांग है कि यह स्पष्ट किया जाए कि आदेश किस तारीख को तैयार और पारित हुआ, आदेश-पत्रिका में क्या दर्ज है, दोनों पक्षों को किस प्रकार सुनवाई का अवसर मिला और प्रकरण के निस्तारण के दौरान लागू प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं।

यदि दस्तावेजों से किसी प्रक्रियागत अनियमितता के संकेत मिलते हैं, तो सक्षम प्रशासनिक या न्यायिक प्राधिकारी द्वारा उनका परीक्षण किया जाना चाहिए।

मामले में उठ रहे हैं कई महत्वपूर्ण सवाल

ग्राम रजखेता की आदिवासी भूमि से जुड़ा यह विवाद अब कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर रहा है। इनमें वर्ष 2017 में किए गए कथित त्रुटि सुधार का आधार, लगभग 2.5 किलोमीटर दूर स्थित खसरों के नक्शों में बदलाव की प्रक्रिया, प्रभावित पक्षकार को नोटिस और सुनवाई दिए जाने की स्थिति, रिकॉर्ड में बदलाव के बाद भूमि की बिक्री तथा SDO न्यायालय की टिप्पणियों पर अपीलीय न्यायालय द्वारा किए गए विचार जैसे मुद्दे शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त 7 अक्टूबर 2026 के लिए निर्धारित आदेश की तारीख से पहले 29 सितंबर 2026 को आदेश पारित किए जाने के आरोप की भी अभिलेखों के आधार पर जांच किए जाने की मांग उठ रही है। प्रार्थी पक्ष का मानना है कि इस पूरे मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि भूमि विवाद का निराकरण तथ्यों और कानून के आधार पर हो सके।

निष्पक्ष जांच और न्यायिक परीक्षण की मांग

अधिवक्ता डॉ. डी.के. सोनी ने प्रकरण से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच की मांग की है। प्रार्थी पक्ष चाहता है कि राजस्व अभिलेखों में हुए बदलाव, नक्शा सुधार के आधार, भूमि के हस्तांतरण, संबंधित अधिकारियों की भूमिका और अपीलीय कार्यवाही की प्रक्रिया का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाए।

मामला केवल जमीन के स्वामित्व तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें आदिवासी भूमि संरक्षण, राजस्व रिकॉर्ड की पारदर्शिता, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और एक राजस्व अधिकारी के विरुद्ध लगाए गए कथित भ्रष्टाचार के आरोप भी शामिल हो गए हैं।

फिलहाल, आदेश की तारीख और प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का अंतिम निष्कर्ष प्रमाणित न्यायालयीन दस्तावेजों के परीक्षण से ही सामने आएगा। कथित आर्थिक लेन-देन और मिलीभगत के आरोपों की पुष्टि भी सक्षम जांच के बाद ही हो सकेगी। ऐसे में संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष और न्यायालयीन रिकॉर्ड इस पूरे विवाद की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होंगे

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