जब कलम को मिला सम्मान, शब्दों ने रचा इतिहास

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जब कलम को मिला सम्मान, शब्दों ने रचा इतिहास

मनेन्द्रगढ़ में पहली बार ‘साहित्य शिरोमणि’ पहल की शुरुआत, तीन वरिष्ठ साहित्यकारों को मिला सम्मान

मनेन्द्रगढ़। किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों, बाजारों और विकास कार्यों से नहीं होती बल्कि वहां जन्म लेने वाले विचारों और उन्हें शब्द देने वाली कलम से भी होती है। मनेन्द्रगढ़ में इसी सोच को नई दिशा देते हुए पहली बार ‘साहित्य शिरोमणि’ जैसी साहित्यिक पहल का आगाज किया गया।
शिक्षक दिवस के अवसर पर यूनिवर्सल पब्लिक स्कूल में आयोजित इस आयोजन में साहित्यकारों, रचनाकारों और साहित्यप्रेमियों ने एक मंच पर जुटकर शब्द साधना और साहित्यिक विरासत को नमन किया।
कार्यक्रम का वातावरण शुरुआत से ही राष्ट्रभक्ति और साहित्यिक चेतना से ओतप्रोत रहा। आयोजन में यह संदेश प्रमुखता से उभरा कि साहित्य केवल मनोरंजन या अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं बल्कि समाज की सोच को दिशा देने और समय की सच्चाई को दर्ज करने वाली शक्ति भी है।

जिन्होंने साहित्य को लिखा नहीं, जिया है

‘साहित्य शिरोमणि’ पहल के पीछे उन साहित्य साधकों को सम्मान देने की भावना है जिन्होंने अपनी पूरी रचनात्मक यात्रा में समाज, संस्कृति, मानवीय संवेदनाओं और सरगुजा की माटी को अपनी लेखनी में स्थान दिया।
आयोजकों के अनुसार इन साहित्यकारों की रचनाएं केवल कागज पर दर्ज शब्द नहीं हैं बल्कि उस दौर के समाज, संघर्ष, संवेदनाओं और चेतना का दस्तावेज हैं। उनकी कलम ने सामाजिक पीड़ा को आवाज दी, अज्ञानता के विरुद्ध चेतना जगाई और आने वाली पीढ़ियों को साहित्य से जोड़ने का काम किया।

तीन कलमकारों को ‘साहित्य शिरोमणि’ सम्मान

इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार और कहानीकार गंगा प्रसाद मिश्र, सामलिया प्रसाद सराफ और राजेंद्र प्रसाद गुप्ता ‘दादू भाई’ को ‘साहित्य शिरोमणि’ सम्मान प्रदान किया गया।
इन साहित्यकारों ने सरगुजा अंचल की साहित्यिक जमीन को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी रचनात्मक यात्रा ने ना केवल स्थानीय साहित्य को पहचान दी बल्कि अनेक नवोदित रचनाकारों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
वरिष्ठ साहित्यकार गंगा प्रसाद मिश्र ने साहित्य को समाज की आत्मा बताते हुए कहा कि किसी समाज की वास्तविक पहचान उसकी भाषा, संस्कृति, साहित्य और अपनी जड़ों से जुड़े रचनाकारों के सम्मान से होती है। उन्होंने कहा कि आज का सम्मान किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है बल्कि यह लेखनी, विचार और साहित्य साधना का सम्मान है।

‘रुकी कलम’ की रचनाएं आज भी दे रहीं रोशनी

कार्यक्रम के अध्यक्ष और देश के विशिष्ट साहित्यकार श्रवण उर्मलिया ने ‘साहित्य शिरोमणि’ पहल को अनुकरणीय बताया। उन्होंने कहा कि समय और परिस्थितियों ने भले ही कई बार साहित्यकारों की कलम को विराम दिया हो लेकिन उनकी रचनाओं में संजोये विचार आज भी समाज और साहित्य जगत को दिशा दे रहे हैं। उन्होंने वरिष्ठ साहित्यकारों के सम्मान को नई पीढ़ी के लिये प्रेरणादायी कदम बताया।

मंच पर बिखरे साहित्य के अलग अलग रंग

आयोजन सिर्फ सम्मान समारोह तक सीमित नहीं रहा। मंच पर कविता, व्यंग्य, प्रकृति, संवेदना, सामाजिक सरोकार और जीवन दर्शन के अलग अलग रंग देखने को मिले।
कोरिया से पहुंचे गीता प्रसाद नेमा और अनीता सिंह ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को भाव विभोर किया। संध्या रामावत और बिनोद तिवारी की रचनाओं ने साहित्यिक माहौल को और गहराई दी। प्रकृति प्रेमी सतीश द्विवेदी ने अपनी रचनाओं में प्रकृति और जीवन के रिश्ते को शब्द दिये वहीं जगदीश पाठक के व्यंग्य ने गंभीर साहित्यिक वातावरण में हास्य की फुहार बिखेरी। अनामिका चक्रवर्ती की ‘बारिश’ और ‘मां की साड़ी’ जैसी संवेदनशील रचनाओं ने श्रोताओं के मन को छुआ। अनिल जैन की ‘शिखर वार्ता’ और नारायण तिवारी की कविताओं ने मंच को संवाद का रूप दिया।
सतीश उपाध्याय की प्रस्तुतियों पर श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं जबकि वीरेंद्र श्रीवास्तव की ‘आंगन में सुकून’ जैसी रचना ने कार्यक्रम में आत्मीयता का रंग घोल दिया।

शब्दों से समाज तक पहुंचा संदेश

साहित्यकार नीलू सिंह और मृत्युंजय सोनी ने साहित्य और समाज के संबंध तथा कलम की सामाजिक जिम्मेदारी पर अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से विचार रखे। उन्होंने रेखांकित किया कि साहित्य समय का आईना होने के साथ साथ समाज को सवाल पूछने, सोचने और बदलाव की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है।
इस तरह कार्यक्रम में साहित्य की लगभग हर प्रमुख संवेदना दिखाई दी। कहीं कविता थी, कहीं व्यंग्य, कहीं प्रकृति, कहीं मां का वात्सल्य तो कहीं समाज और जीवन की सच्चाइयां।

संस्था को मिला नया नेतृत्व

‘साहित्य शिरोमणि’ पहल के साथ संस्था के विस्तार और प्रबंधन को भी नई दिशा दी गई। वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश पाठक और मृत्युंजय सोनी को संरक्षक सदस्य मनोनीत किया गया वहीं नगर के प्रतिष्ठित व्यापारी और समाजसेवी शैलेश जैन को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। नेहा चक्रवर्ती को संस्था का सदस्य नियुक्त किया गया।
कार्यक्रम में साहित्यकार नरेंद्र सिंह अरोड़ा, यूनिवर्सल पब्लिक स्कूल के संस्थापक राजकुमार पाण्डेय, शैलेश जैन, संतोष जैन, मधु जैन सहित मंच संचालक राजेश जैन ‘बुंदेली’ और बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
‘साहित्य शिरोमणि’ का यह पहला कदम केवल एक सम्मान समारोह नहीं बल्कि मनेन्द्रगढ़ की साहित्यिक परंपरा को पहचान देने और वरिष्ठ कलमकारों की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की शुरुआत के रूप में सामने आया।

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