ध्रुव कुमार दीक्षित और डॉ. तरन्नुम सरवत ने शिक्षक दिवस पर शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा चुनौतियों पर रखे विचार
शिक्षक दिवस सम्मान का नहीं, शिक्षा और गुरु-शिष्य संबंधों पर पुनर्विचार का पर्व : ध्रुव कुमार दीक्षित
परीक्षा, अंक और रोजगार तक सिमटती शिक्षा पर जताई चिंता, कहा—शिक्षा का लक्ष्य स्वतंत्र चिंतन और व्यक्तित्व निर्माण होना चाहिए

जबलपुर/अनूपपुर। शिक्षक दिवस के अवसर पर ध्रुव कुमार दीक्षित, केसरवानी कॉलेज जबलपुर एवं डॉ. तरन्नुम सरवत, शासकीय तुलसी महाविद्यालय अनूपपुर ने ‘शिक्षक दिवस : एक समीक्षा’ विषय पर शिक्षा व्यवस्था, शिक्षक की भूमिका और गुरु-शिष्य संबंधों को लेकर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि 5 सितंबर को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के रूप में शिक्षक दिवस मनाया जाता है, लेकिन यह केवल शिक्षकों के सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी के संबंधों पर पुनर्विचार करने का पर्व होना चाहिए।
विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षक को केवल ज्ञान प्रदान करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक चेतना के विकास का माध्यम माना गया है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना, डिग्री प्राप्त करना और रोजगार हासिल करना नहीं होना चाहिए। इसके माध्यम से विद्यार्थी में जिज्ञासा, स्वतंत्र चिंतन, सृजनशीलता और आत्म-जागरूकता विकसित होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में इस बात पर अधिक जोर दिखाई देता है कि विद्यार्थी ने कितना याद किया और कितने अंक प्राप्त किए, जबकि वास्तविक सवाल यह होना चाहिए कि उसने कितना समझा, कितने प्रश्न किए और अपने जीवन को कितना बेहतर ढंग से समझ पाया। ‘याद करो, परीक्षा दो और पास होने के बाद शिक्षा को भूल जाओ’ जैसी प्रवृत्ति शिक्षा के मूल उद्देश्य को कमजोर करती है।
शिक्षक वह, जो विद्यार्थी को सोचने के लिए प्रेरित करे
ओशो के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी पर अपने विचार थोपने के बजाय उसे स्वयं विकसित होने का अवसर देता है। शिक्षक को विद्यार्थियों की जिज्ञासा जीवित रखनी चाहिए और उन्हें प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। भय के स्थान पर विश्वास का वातावरण तैयार करना शिक्षा की पहली आवश्यकता है।
उन्होंने शिक्षक और गुरु के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि शिक्षक बाहरी ज्ञान प्रदान कर सकता है, जबकि गुरु व्यक्ति को स्वयं के भीतर देखने की दिशा दिखाता है। गुरु-शिष्य संबंध केवल सूचना के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक परिवर्तन से जुड़ा संबंध है।
शिक्षा के तीन प्रमुख सामाजिक दायित्व
समाजशास्त्र के संदर्भ में उन्होंने शिक्षा को सामाजिकरण की महत्वपूर्ण संस्था बताते हुए इसके तीन प्रमुख दायित्व गिनाए। पहला, व्यक्ति को सामाजिक जीवन के लिए तैयार करना; दूसरा, एक पीढ़ी के ज्ञान, मूल्यों और संस्कृति को दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाना तथा तीसरा, नई पीढ़ी में आलोचनात्मक चेतना विकसित कर सामाजिक परिवर्तन की संभावनाएं पैदा करना।
गूगल और एआई के दौर में बदली शिक्षक की भूमिका
उन्होंने कहा कि आज शिक्षक अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है। लगभग चार दशक के शिक्षण अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षा तेजी से परीक्षा, अंक, प्रतियोगिता और रोजगार से जुड़ गई है। इससे शिक्षक की भूमिका भी पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित होती जा रही है। वहीं गूगल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में सूचनाएं प्राप्त करना पहले से कहीं आसान हो गया है। ऐसे समय में शिक्षक की वास्तविक भूमिका विद्यार्थियों को सूचना देने से अधिक सही प्रश्न पूछना, तर्क करना और उपलब्ध जानकारी का विवेकपूर्ण विश्लेषण करना सिखाने की होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि विद्यार्थी केवल अंक प्राप्त करने की इकाई नहीं है। प्रत्येक विद्यार्थी का अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व, रुचि, प्रतिभा, संवेदना और कल्पना होती है। शिक्षा को इन क्षमताओं के विकास का माध्यम बनना चाहिए।
पुष्प और उपहार नहीं, विद्यार्थियों की सोच ही शिक्षक का वास्तविक सम्मान
उन्होंने कहा कि शिक्षक दिवस आज कई स्थानों पर औपचारिकता तक सीमित होता जा रहा है। पुष्पमाला, गुलदस्ता और उपहार शिक्षक के सम्मान का प्रतीक हो सकते हैं, लेकिन शिक्षक का वास्तविक सम्मान तब होगा जब उसके विद्यार्थी स्वतंत्र रूप से सोचें, सत्य की खोज करें, प्रश्न पूछें, मानवीय मूल्यों का पालन करें और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल अच्छे अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी तैयार करना नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करना होना चाहिए। यही शिक्षक दिवस की वास्तविक सार्थकता होगी।

































































