नौ साल बाद कॉलेजों में फिर बजेगा लोकतंत्र का बिगुल, छात्रसंघ चुनाव की राह साफ

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नौ साल बाद कॉलेजों में फिर बजेगा लोकतंत्र का बिगुल, छात्रसंघ चुनाव की राह साफ

सितंबर में चुनाव कराने के न्यायालय के निर्देश के बाद विद्यार्थियों में उत्साह, कॉलेज परिसरों में बढ़ी राजनीतिक हलचल

कोतमा। करीब नौ वर्षों से छात्रसंघ चुनाव का इंतजार कर रहे कॉलेज विद्यार्थियों के लिए बड़ी खबर सामने आई है। न्यायालय के निर्देश के बाद कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव कराने का रास्ता साफ हो गया है। वर्ष 2017 से लंबित चुनाव अब सितंबर माह में कराए जाने की बात सामने आई है। चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से कराने तथा आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस की मदद लेने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायालय के इस निर्णय के बाद एक बार फिर कॉलेज परिसरों में छात्र राजनीति और चुनावी गतिविधियों को लेकर हलचल तेज होने लगी है।

छात्र-छात्राओं में उत्साह, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मिलेगा भागीदारी का अवसर

छात्रसंघ चुनाव लंबे समय से नहीं होने के कारण विद्यार्थियों को कॉलेज स्तर पर अपनी समस्याओं और मांगों को प्रतिनिधियों के माध्यम से उठाने का अवसर नहीं मिल पा रहा था। अब चुनाव की संभावना बनने से छात्र-छात्राओं में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।

विद्यार्थियों का कहना है कि छात्रसंघ केवल चुनाव या पदाधिकारियों के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि कॉलेज की रोजमर्रा की समस्याओं को प्रबंधन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। फीस में बढ़ोतरी, लाइब्रेरी में पर्याप्त किताबें, कक्षाओं की सुविधाएं, बस एवं परिवहन, छात्रावास, कैंटीन की गुणवत्ता सहित कई मुद्दे छात्रसंघ के माध्यम से प्रबंधन के समक्ष उठाए जाते हैं।

छात्र राजनीति सिखाती है नेतृत्व और जिम्मेदारी

जानकारों के अनुसार कॉलेज छात्रसंघ चुनाव विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी समझ देने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। चुनाव के दौरान विद्यार्थी पहली बार मतदान, उम्मीदवारों के विचार, घोषणापत्र, प्रचार और बहस जैसी प्रक्रियाओं से परिचित होते हैं। इससे उनमें सवाल पूछने, जवाब मांगने और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने की क्षमता विकसित होती है।

छात्र राजनीति को नेतृत्व विकास की प्रयोगशाला भी माना जाता है। बजट प्रबंधन, कार्यक्रम आयोजन, टीम संचालन, संवाद और बातचीत जैसे कौशल विद्यार्थियों को भविष्य में सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने में मदद करते हैं। देश की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां नेताओं ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की।

छात्रसंघ शुल्क लिया गया, चुनाव नहीं होने पर उठे सवाल

विद्यार्थियों का कहना है कि पिछले वर्षों में उनसे छात्रसंघ शुल्क लिया जाता रहा, लेकिन चुनाव नहीं कराए गए। ऐसे में अब चुनाव कराने की प्रक्रिया शुरू होने से विद्यार्थियों में उम्मीद जगी है कि उन्हें अपनी पसंद के प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलेगा।

रानी दुर्गावती कॉलेज मंडला के प्राचार्य टीपी मिश्रा के अनुसार कॉलेजों में अलग-अलग मदों में शुल्क लिया जाता है। फीस स्ट्रक्चर में छात्रसंघ शुल्क भी शामिल रहता है। इसमें निर्धारित राशि का कुछ हिस्सा विश्वविद्यालय को दिया जाता है, जबकि कुछ राशि का उपयोग कॉलेज में होने वाली विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों सहित अन्य निर्धारित कार्यों में किया जाता है।

‘लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को मिलेगी नई दिशा’

एबीवीपी प्रांत कार्यकारिणी सदस्य एवं नगर मंत्री कोतमा प्रांजल तिवारी ने न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि छात्रसंघ चुनाव केवल प्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि विद्यार्थियों में लोकतांत्रिक मूल्यों, नेतृत्व क्षमता, उत्तरदायित्व और सामाजिक सरोकारों के विकास का सशक्त माध्यम हैं।

उन्होंने कहा कि लंबे समय से छात्रसंघ चुनाव नहीं होने के कारण विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी का अवसर नहीं मिल पा रहा था। ऐसे समय में न्यायालय का निर्णय विद्यार्थियों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को नई दिशा प्रदान करेगा।

चुनाव को लेकर कॉलेजों में बढ़ेगी गतिविधियां

चुनाव की राह साफ होने के बाद अब कॉलेज परिसरों में छात्र संगठनों की सक्रियता बढ़ने की संभावना है। संभावित प्रत्याशियों और छात्र संगठनों के बीच बैठकों, संवाद और विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर गतिविधियां तेज हो सकती हैं। लंबे अंतराल के बाद होने वाले चुनावों में विद्यार्थियों की भागीदारी और चुनावी माहौल पर सभी की नजर रहेगी।

करीब नौ वर्षों बाद छात्रसंघ चुनाव की वापसी विद्यार्थियों के लिए केवल प्रतिनिधि चुनने का अवसर नहीं, बल्कि लोकतंत्र को कॉलेज परिसर से मजबूत करने और नई पीढ़ी में नेतृत्व की नींव तैयार करने का अवसर भी मानी जा रही है।

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