अतिक्रमण को सरकारी संरक्षण?” RTI एक्टिविस्ट का निगम आयुक्त पर व्यंग्य, आवेदन के जरिए उठाए शहर की बदहाल यातायात व्यवस्था पर सवाल
सड़कों पर ठेलों और अतिक्रमण को लेकर अनोखा विरोध; कहा– जब कार्रवाई नहीं हो रही तो चौक-चौराहों को ही बाजार घोषित कर दीजिए

अंबिकापुर। शहर में लगातार बढ़ते अतिक्रमण, सड़क किनारे बेतरतीब ठेलों और बिगड़ती यातायात व्यवस्था को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता डॉ. डी.के. सोनी ने नगर पालिक निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखा व्यंग्य किया है। उन्होंने निगम आयुक्त को एक व्यंग्यात्मक आवेदन सौंपते हुए ऐसी मांगें रखीं, जो पहली नजर में हास्य प्रतीत होती हैं, लेकिन उनके पीछे शहर की अव्यवस्थित व्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता पर गंभीर सवाल छिपे हुए हैं।
डॉ. सोनी ने आवेदन में कहा कि यदि नगर निगम अतिक्रमण हटाने और सड़कों को व्यवस्थित रखने में असमर्थ है तो शहर के प्रमुख चौक-चौराहों को ही सब्जी, फल और ठेला बाजार घोषित कर दिया जाए। उनका कहना है कि जब अवैध कब्जों और सड़कों पर फैलते कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही है, तब अव्यवस्था को ही व्यवस्था का दर्जा दे देना अधिक उचित होगा।
उन्होंने अपने आवेदन में रेडियो स्टेशन चौक, बिलासपुर चौक, थाना चौक, घड़ी चौक, गुदरी चौक, मरीन ड्राइव, महामाया मंदिर मार्ग, संगम चौक, पुराना बस स्टैंड, हॉस्पिटल रोड और जयस्तंभ चौक सहित शहर के कई प्रमुख और व्यस्त स्थानों का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां फल एवं सब्जी विक्रेताओं तथा ठेला व्यवसायियों को खुली छूट प्रदान कर दी जाए। उनका व्यंग्य था कि यदि सड़कें पूरी तरह बाजार में बदल जाएंगी तो ट्रैफिक जाम को भी शहर की नई पहचान माना जा सकेगा।
आवेदन में निगम आयुक्त की कार्यशैली पर कटाक्ष करते हुए डॉ. सोनी ने लिखा कि शहरवासियों को समय पर गंतव्य तक पहुंचने के बजाय एक-दो घंटे पहले घर से निकलने की “सुविधा” उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने कहा कि ट्रैफिक जाम अब शहर की सामान्य दिनचर्या बन चुका है और आम नागरिक रोजाना इसकी कीमत अपने समय और सुरक्षा से चुका रहे हैं।
थाना चौक का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सुबह के समय मजदूरों, ठेलों, दुकानों और वाहनों की भीड़ के कारण यहां हालात बेहद गंभीर हो जाते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और आम नागरिकों को सड़क पार करने में भारी जोखिम उठाना पड़ता है। दुर्घटना की आशंका हमेशा बनी रहती है, लेकिन संबंधित विभाग इसे सामान्य स्थिति मानकर अनदेखा करता दिखाई देता है।
डॉ. सोनी ने अपने आवेदन में एक और व्यंग्यात्मक सुझाव देते हुए कहा कि नगर निगम सड़क किनारे लोहे की रेलिंग और रॉड लगवा दे, ताकि व्यापारी आधी सड़क तक अपना सामान आसानी से फैला सकें। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि जब ग्राहक दुकानों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं तो दुकानों को ही सड़क पर ले आना बेहतर होगा। इससे ट्रैफिक जाम को भी विकास का प्रतीक घोषित किया जा सकेगा।
उन्होंने आवेदन के अंत में व्यंग्यपूर्ण अंदाज में इन सभी “सुझावों” को तत्काल लागू करने की मांग भी की। उनका कहना था कि यदि यही व्यवस्था जारी रहनी है तो पैदल चलना, सुरक्षित वाहन चलाना और समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचना केवल पुरानी यादें बनकर रह जाएंगी।
हालांकि डॉ. डी.के. सोनी का यह आवेदन केवल हास्य या कटाक्ष तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से उन्होंने शहर में बढ़ते अतिक्रमण, यातायात अव्यवस्था, पैदल यात्रियों की सुरक्षा, सड़कों पर कब्जे और प्रशासनिक निष्क्रियता जैसे गंभीर मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है। अब यह देखना होगा कि नगर निगम प्रशासन इस व्यंग्य को केवल एक मजाक मानता है या इसे आम नागरिकों की वास्तविक पीड़ा समझकर शहर की यातायात व्यवस्था और अतिक्रमण नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम उठाता है।
















