कक्का की चौपाल
सड़क पर भटकती महिला, जिसे अपनों की तलाश है
कैलाश पाण्डेय
शाम धीरे-धीरे कोतमा कालरी की सड़कों पर उतर रही थी। पुरानी नगर पालिका के सामने गुप्ता होटल रोड पर दिनभर की आवाजाही अब भी जारी थी। चौपाल पर चाय के कप से उठती भाप हवा में घुल रही थी। कक्का चुप बैठे सड़क की ओर देख रहे थे। घसीटा, चौरंगी लाल और खबरी लाल भी पास बैठे थे। तभी अचानक घसीटा की नजर सड़क पर पड़ी। उसने कुछ पल तक उधर देखा, फिर धीमे से बोला, “कक्का… वो देखिए।” सड़क के किनारे एक महिला धीरे-धीरे चली आ रही थी। बिखरे बाल, धूल से सने कपड़े, थका हुआ चेहरा और आंखें… जैसे सड़क पर नहीं, किसी बीती हुई जिंदगी में कुछ तलाश रही हों। वह कुछ कदम चलती, फिर रुक जाती
आने-जाने वालों को देखती। किसी चेहरे पर उसकी नजर कुछ देर ठहरती, फिर आगे बढ़ जाती। जैसे भीड़ में किसी एक चेहरे की तलाश हो, जिसे देखते ही वह कह सके “तुम आ गए… मैं तुम्हें ही ढूंढ रही थी।” लेकिन ऐसा कोई चेहरा उसे नहीं मिला। वह आगे बढ़ी और सड़क किनारे बैठ गई। कुछ देर तक चुपचाप सामने देखती रही। फिर उसने अपने बिखरे बालों को हाथ से समेटा, कपड़ों से धूल झाड़ी और अचानक सड़क की ओर देखने लगी। घसीटा ने पूछा, “कक्का… ये कौन है?” कक्का काफी देर तक महिला को देखते रहे। फिर बोले, “पता नहीं बेटा… लेकिन इतना जरूर पता है कि शायद किसी घर में इसके लौटने का इंतजार भी हो रहा होगा।” चौरंगी लाल ने पूछा, “लेकिन अब?” कक्का की आवाज धीमी हो गई। “अब शायद यह खुद अपने घर का रास्ता तलाश रही है
चौपाल पर अचानक सन्नाटा छा गया। महिला फिर उठी। कुछ दूर चली। सामने से एक व्यक्ति आया। महिला ने उसे गौर से देखा। वह आगे निकल गया। महिला कुछ क्षण उसके पीछे देखती रही, फिर उसकी आंखें दूसरी दिशा में चली गईं। जैसे उसे किसी और चेहरे की उम्मीद हो। घसीटा ने धीरे से पूछा, “कक्का, क्या कई दिनों से इसी तरह भटक रही है?” कक्का बोले, “ भालूमाड़ा में इसे कई दिनों से देखे जाने की बात सामने आ रही है। वार्ड क्रमांक 18 के पार्षद इन्द्रलाल केवट ने इसकी स्थिति को लेकर कलेक्टर ,sp एवं जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी को पत्र भी दिया है। मांग है कि महिला की देखभाल और उपचार की व्यवस्था हो तथा यदि उसका परिवार कहीं है तो उसकी पहचान कर उसे उसके अपनों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाए।” खबरी लाल ने पूछा, “कक्का, क्या यह अपना नाम बता सकती है?” कक्का ने कहा, “हो सकता है
हो सकता है इसे अपना गांव याद हो, किसी रिश्तेदार का नाम याद हो, किसी घर का कोई पता याद हो। लेकिन इसके लिए कोई उसके पास बैठकर पूछे तो सही। कई बार इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत दवा की नहीं, किसी ऐसे व्यक्ति की होती है जो धैर्य से उसकी बात सुन सके।” महिला ने अचानक सड़क की दूसरी ओर देखा। कुछ क्षण तक वह वहीं खड़ी रही। फिर जैसे किसी अदृश्य आवाज के पीछे चल पड़ी। घसीटा ने कहा, “कक्का, देखिए… फिर चल दी।” कक्का बोले, “हां… शायद उसे भी नहीं पता कि कहां जाना है। लेकिन आदमी जब किसी अपने को खो देता है, तो कई बार रास्ते भी उसके साथ खो जाते हैं।” चौरंगी लाल ने पूछा, “अगर इसका परिवार मिल जाए तो?” कक्का ने कहा, “तो शायद इसकी यह भटकन खत्म हो जाए। लेकिन अगर परिवार न मिले, तब भी इसकी जिंदगी सड़क पर छोड़ देने के लिए नहीं है। इसकी पहचान की कोशिश हो सकती है, स्वास्थ्य जांच हो सकती है, उपचार और सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था हो सकती है और परिवार की तलाश की जा सकती है।” कुछ पल बाद महिला फिर रुक गई
इस बार उसने पीछे मुड़कर देखा। सड़क पर वही भीड़ थी, वही वाहन थे, वही शोर था। लेकिन उसके लिए जैसे सब चेहरे अनजान थे। उसने एक पल के लिए दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। फिर हाथ नीचे किए और चुपचाप आगे बढ़ गई। कक्का की नजरें उससे हट नहीं रही थीं। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “देख रहे हो? इसे शायद भीड़ नहीं चाहिए… इसे बस एक अपना चाहिए।” घसीटा की आंखें नम हो गईं। “कक्का, अगर कोई इसे घर तक पहुंचा दे तो?” कक्का बोले, “यही तो कोशिश होनी चाहिए। और ऐसी कोशिश में समाज के साथ प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका भी जरूरी है। अगर किसी व्यक्ति की पहचान नहीं हो पा रही है, तो उसकी स्थिति को नजरअंदाज करने के बजाय उसके लिए सहायता की व्यवस्था होनी चाहिए।” फिर कक्का ने चौपाल की ओर देखते हुए कहा, “समाजसेवा केवल मंच पर भाषण देने का नाम नहीं है। समाजसेवा तब दिखाई देती है
, जब कोई सड़क किनारे बैठा हो और हम उसके पास जाकर पूछें ‘मां, आपको क्या हुआ? आपको कहां जाना है?’ यही एक सवाल शायद किसी की जिंदगी में फिर से उम्मीद जगा सकता है।” महिला अब काफी दूर जा चुकी थी। वह फिर एक बार रुकी। पीछे देखा। कुछ पल खड़ी रही। फिर आगे बढ़ गई। कक्का देर तक उसे देखते रहे। आखिर उन्होंने कहा, “पता नहीं इसे अपना घर याद है या नहीं… पता नहीं इसे अपने लोगों के चेहरे याद हैं या नहीं… लेकिन इसकी आंखों में किसी की तलाश साफ दिखाई देती है।” चौपाल पर बैठे सभी लोग चुप थे। सड़क पर वाहन गुजरते रहे। लोग अपनी-अपनी मंजिल की ओर जाते रहे। और वह महिला भी उसी सड़क पर आगे बढ़ती रही शायद घर की तलाश में, शायद किसी परिचित चेहरे की तलाश में, शायद सिर्फ उस आवाज की तलाश में जो उसे रोककर कह दे“अब और मत भटको… चलो, तुम्हें तुम्हारे अपनों तक ले चलते हैं।” कक्का ने चाय का आखिरी घूंट लिया और बहुत धीमे से कहा, “किसी की पूरी कहानी हमें मालूम न हो, तब भी उसकी तकलीफ दिखाई दे सकती है। और जब किसी महिला की आंखें भीड़ में अपनों को तलाश रही हों, तो हमारा पहला काम यह पूछना होना चाहिए तुम्हें किसकी तलाश है

































































