अमरकंटक मां नर्मदा तट पर उमड़ा पितृ श्रद्धा का भाव ,
रामघाट,अरंडी संगम में विधि-विधान से हुआ श्राद्ध,पिंडदान और तर्पण
संवाददाता – श्रवण कुमार उपाध्याय

अमरकंटक – मां नर्मदा की उद्गम स्थली / पवित्र नगरी अमरकंटक में पितृपक्ष के दौरान श्रद्धा , आस्था और सनातन परंपराओं का अनुपम संगम देखने को मिल रहा है । पतित पावनी मां नर्मदा के पावन तटों पर प्रतिदिन श्रद्धालु अपने पितृजनों के निमित्त श्राद्ध , पिंडदान एवं तर्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं । इसी क्रम में शनिवार 26 सितंबर 2026 को भाद्र शुक्ल पूर्णिमा के पावन अवसर पर हरियाणा के गुड़गांव से आए विप्रजनों के एक दल ने अमरकंटक के रामघाट स्थित मां नर्मदा तट पर विधि-विधानपूर्वक श्राद्ध , पिंडदान एवं जल तर्पण कर अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण किया
श्रद्धालुओं ने वैदिक मंत्रोच्चार एवं धार्मिक विधानों के अनुसार संकल्प लेकर अपने पितरों का आह्वान किया तथा जल , काले तिल , कुश , अक्षत , जवा एवं पिंड अर्पित कर उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की । इसी तरह अनूपपुर से पधारे पंडित अद्भुत जी महाराज के सानिध्य में अशोक तिवारी अपनी पत्नी की मासिक श्राद्ध कर्म , पिंडदान , जल तर्पण और ब्राह्मण भोज हेतु अरंडी संगम स्थल नर्मदा तट पर श्रद्धा भाव के साथ तर्पण , पिंडदान आदि पितरों के निमित्त किया ।
इस तरह दूर दराज से आकर दिवंगत माता-पिता , दादा-दादी , नाना-नानी सहित समस्त पूर्वजों का भावपूर्ण स्मरण कर तर्पण कार्य पूर्ण करते है । नर्मदा तट पर संपन्न हुए इस धार्मिक अनुष्ठान ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिकता और श्रद्धा से सराबोर कर दिया ।
तर्पण केवल कर्मकांड नहीं, कृतज्ञता का संस्कार
सनातन धर्म में तर्पण का विशेष महत्व बताया गया है । ‘तर्पण’ का अर्थ है तृप्त करना अथवा संतुष्ट करना । पितृपक्ष में अपने पूर्वजों के निमित्त जल अर्पित कर उन्हें स्मरण करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तर्पण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि अपने पितरों के प्रति सम्मान , स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का पवित्र माध्यम है । तर्पण के समय पितरों का नाम एवं गोत्र स्मरण कर जल अर्पित किया जाता है जिससे उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रकट होता है ।
नर्मदा उद्गम क्षेत्र में पितृ कर्म का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमरकंटक स्थित मां नर्मदा का उद्गम क्षेत्र अत्यंत पुण्यदायी एवं मोक्षदायिनी माना गया है । यही कारण है कि देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु यहां पहुंचकर अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध , पिंडदान एवं तर्पण करते हैं । गुड़गांव से आए श्रद्धालुओं ने भी नर्मदा की पावन धारा के साक्षी में अपने पूर्वजों को स्मरण करते हुए पारंपरिक विधि से पितृ कर्म संपन्न किया और उनकी आत्मिक शांति की कामना की ।
पितृपक्ष की यह परंपरा वर्तमान पीढ़ी को अपने पूर्वजों , पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों से जोड़ने का कार्य करती है । यह संदेश देती है कि मनुष्य अपने अस्तित्व की जड़ों को कभी न भूले तथा पूर्वजों के प्रति सम्मान , श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव सदैव बनाए रखे । मां नर्मदा के पावन तट पर संपन्न हुए इस धार्मिक आयोजन ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संतोष प्रदान करने के साथ पितृ स्मरण की सनातन परंपरा को भी सजीव बनाए रखा ।


































































