उत्तम आर्जव धर्म पर माताजी ने दिया सरलता और निष्कपटता का संदेश
युवाओं से कहा—जिनशासन की ध्वजा आपके कंधों पर, एकता के साथ धर्म रक्षा करे
कोतमा। नगर में पर्यूषण पर्व (दशलक्षण धर्म) आर्यिका माँ 105 अनंतमति माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। पर्व के चतुर्थ दिवस उत्तम आर्जव धर्म के अवसर पर माताजी ने मंगल प्रवचन देते हुए सरलता, निष्कपटता और ऋजुता का महत्व समझाया। उनके प्रवचनों का जैन समाज के श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया
माताजी ने कहा कि मन, वचन और काय तीनों में एकरूपता होना ही आर्जव धर्म है। मन में कुछ और रखना, वाणी से कुछ और कहना और व्यवहार में कुछ और करना मायाचार एवं छल-कपट है। जब व्यक्ति अपनी गलतियों को छिपाने के लिए कुटिलता का सहारा नहीं लेता और जीवन में सरलता को अपनाता है, तभी उत्तम आर्जव धर्म प्रकट होता है।
मन की कुटिल नीतियों को त्यागे:
माताजी ने मन को मायाचारी का अजायबघर बताते हुए कहा कि मन में अनेक प्रकार की कुटिल नीतियां जन्म लेती रहती हैं। उन्होंने ‘राम नाम जपना, पराया माल अपना’ और ‘जैसा मौका, वैसा काम’ जैसी अनीतिपूर्ण सोच को त्यागने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि कुटिल नीतियों को छोड़कर आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य समय सागर जी महाराज की धर्मनीति से जुड़ना चाहिए। यही आत्मकल्याण का सच्चा मार्ग है।
युवाओं को अतीत की चिंता छोड़कर वर्तमान में धर्म और संस्कारों के साथ जीवन जीने का संदेश दिया।
युवाओं के कंधों पर जिनशासन की जिम्मेदारी: युवाओ को संबोधित करते हुए कहा कि जिनवाणी और जिनशासन की ध्वजा युवाओं के कंधों पर है। युवाओं को पूर्ण वात्सल्य, संगठन और एकता के साथ आगे बढ़ते हुए जैन धर्म एवं संस्कृति के गौरव को सुरक्षित रखने के लिए कार्य करे।

































































