13 साल बाद रत्नेश कुमार सिंह को मिली पुलिस में नियुक्ति, हाईकोर्ट के आदेश का हुआ पालन

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13 साल बाद रत्नेश कुमार सिंह को मिली पुलिस में नियुक्ति, हाईकोर्ट के आदेश का हुआ पालन

2013 की पुलिस आरक्षक भर्ती का मामला, नियुक्ति निरस्तीकरण के बाद शुरू हुई थी कानूनी लड़ाई; अवमानना प्रकरण में हाईकोर्ट की सख्ती के बाद 30 सितंबर को मिली नियुक्ति

अनूपपुर। पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा वर्ष 2013 से जुड़े जिला अनूपपुर के जमुना कॉलरी निवासी रत्नेश कुमार सिंह को करीब 13 वर्ष बाद पुलिस विभाग में नियुक्ति मिल गई। नियुक्ति निरस्त किए जाने के बाद शुरू हुई लंबी कानूनी लड़ाई में हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन को लेकर अवमानना की कार्यवाही भी चली। न्यायालय की सख्ती और लगातार सुनवाई के बाद अंततः 30 सितंबर 2026 को रत्नेश कुमार सिंह को पुलिस विभाग में नियुक्ति प्रदान कर दी गई।

प्रकरण के अनुसार, वर्ष 2013 में आयोजित पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा के बाद रत्नेश कुमार सिंह की नियुक्ति आपराधिक प्रकरण के आधार पर निरस्त कर दी गई थी। नियुक्ति निरस्तीकरण से प्रभावित होकर रत्नेश कुमार सिंह ने अपने अधिकारों के लिए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर की शरण ली।

मामले की सुनवाई के बाद 10 जनवरी 2025 को हाईकोर्ट द्वारा रत्नेश कुमार सिंह को पुलिस विभाग में समस्त लाभों के साथ पदस्थ किए जाने का आदेश पारित किया गया था। हालांकि, उक्त आदेश के अपेक्षित रूप से अनुपालन नहीं होने पर मामले में अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ हुई।

अवमानना प्रकरण में अधिवक्ता अभिषेक पांडे ने रखा पक्ष

अवमानना प्रकरण CONC No. 4146/2025, रत्नेश कुमार सिंह बनाम कैलाश मकवाना एवं अन्य में 8 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ के समक्ष सुनवाई हुई।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभिषेक पांडे ने न्यायालय के समक्ष पक्ष रखते हुए बताया कि संबंधित मूल आदेश के विरुद्ध रिट अपील दायर की गई है, लेकिन रिट अपील में मूल आदेश पर किसी प्रकार का स्थगन आदेश प्रदान नहीं किया गया है।

अधिवक्ता अभिषेक पांडे की ओर से न्यायालय के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि जब मूल आदेश पर कोई स्थगन नहीं है, तब केवल रिट अपील लंबित होने के आधार पर आदेश के अनुपालन को रोका नहीं जा सकता।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारी की व्यक्तिगत उपस्थिति के निर्देश दिए और आदेश के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट करने को कहा।

21 सितंबर की सुनवाई में भी अनुपालन को लेकर सख्ती

मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर 2026 को हुई। इस दौरान प्रतिवादी क्रमांक-2, पुलिस अधीक्षक शहडोल की ओर से व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया। आवेदन में मुख्य आधार यह बताया गया कि मूल आदेश के विरुद्ध रिट अपील डिवीजन बेंच के समक्ष लंबित है।

न्यायालय ने आवेदन पर विचार करते हुए अपने पूर्व आदेश का उल्लेख किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 8 सितंबर 2026 को ही यह देखा जा चुका है कि रिट अपील में मूल आदेश पर कोई स्थगन आदेश नहीं है तथा संबंधित आदेश का अनुपालन किया जाना है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि संबंधित पक्ष ने न्यायालय के आदेश को उसके सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझा है, तो यह एक ऐसा विषय है जिस पर विचार किया जाना आवश्यक है।

हालांकि, न्यायालय ने अंतिम अवसर के रूप में आदेश के अनुपालन के लिए एक सप्ताह का समय प्रदान किया। साथ ही निर्देश दिया गया कि यदि आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है तो प्रतिवादी क्रमांक-2 को पूर्व में दिए गए निर्देश के अनुसार अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना होगा।

मामले को अगली सुनवाई के लिए 1 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया था।

30 सितंबर को हुई नियुक्ति

हाईकोर्ट में लगातार हुई सुनवाई और आदेश के अनुपालन को लेकर न्यायालय द्वारा दिखाई गई सख्ती के बाद पुलिस विभाग की ओर से कार्रवाई की गई। अंततः 30 सितंबर 2026 को रत्नेश कुमार सिंह को पुलिस विभाग में नियुक्ति प्रदान कर दी गई।

इस प्रकार वर्ष 2013 की पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा से शुरू हुआ नियुक्ति विवाद करीब 13 वर्षों की न्यायिक प्रक्रिया के बाद नियुक्ति मिलने के साथ महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचा।

रत्नेश कुमार सिंह की ओर से मामले में अधिवक्ता अभिषेक पांडे, जबलपुर हाईकोर्ट ने पैरवी की। अवमानना कार्यवाही के दौरान उन्होंने न्यायालय के समक्ष लगातार यह तथ्य रखा कि मूल आदेश पर कोई स्थगन आदेश नहीं होने के बावजूद उसके अनुपालन को लंबित रखा जा रहा है।

हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन के बाद 30 सितंबर 2026 को मिली नियुक्ति को रत्नेश कुमार सिंह के लिए करीब 13 वर्षों से चले आ रहे विवाद के अंत के रूप में देखा जा रहा है।

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