भीषण ग्रीष्म तपन में आस्था की अखंड साधना : महंत योगी नृसिंहनाथ 10 शिष्यों एवं एक भक्त कुत्ते के साथ कर रहे माँ नर्मदा परिक्रमा

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तट परिवर्तन माई की बगिया से दक्षिण तट की ओर बढ़ी तप , श्रद्धा और संकल्प की पदयात्रा

 

संवाददाता – श्रवण कुमार उपाध्याय

अमरकंटक – मां नर्मदा जी की उद्गम स्थली पवित्र नगरी अमरकंटक में पहुंचे परिक्रमावासी मई-जून जैसी भीषण गर्मी , प्रचंड धूप और तेज लू के बीच जब सामान्य जनजीवन प्रभावित हो रहा है ऐसे कठिन समय में भी कुछ साधक अपनी अटूट श्रद्धा , अदम्य साहस और आध्यात्मिक संकल्प के साथ तपस्या पथ पर निरंतर अग्रसर हैं । ऐसी ही अद्भुत साधना का जीवंत उदाहरण इन दिनों पवित्र नगरी अमरकंटक में देखने को मिल रहा है जहाँ त्रिपुंडाचार्य मठ संस्थान राजुर जिला लातूर (महाराष्ट्र) के परम तपस्वी संत महंत योगी नृसिंहनाथ महाराज गुरु निरंजन नाथ अंधा दत्त पीठ राजुर अपने 10 नर्मदा भक्त शिष्यों के साथ पुण्य सलिला पतित पावनी माँ नर्मदा की कठिन पदयात्रा परिक्रमा कर रहे हैं ।

मंगलवार 28 अप्रैल 2026 को महंत योगी नृसिंहनाथ महाराज ने नर्मदा उत्तर तट से दक्षिण तट की ओर पावन माई की बगिया में तट परिवर्तन एवं जल परिवर्तन की विधि पूर्ण कर अपनी आगे की नर्मदा परिक्रमा यात्रा प्रारंभ की । यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत प्रेरणादायक एवं भावविभोर कर देने वाला रहा ।

उल्लेखनीय है कि महंत योगी नृसिंहनाथ महाराज ने दिसंबर माह में ओंकारेश्वर से नर्मदा परिक्रमा की पदयात्रा प्रारंभ की थी । अब तक वे लगभग 2500 किलोमीटर की कठिन परिक्रमा पूर्ण कर चुके हैं तथा लगभग 700 किलोमीटर की यात्रा शेष है जो शीघ्र ही पूर्ण होने की ओर अग्रसर है ।

इस परिक्रमा यात्रा की एक विशेष और हृदयस्पर्शी बात यह भी है कि उनके 10 परम भक्त शिष्यों के साथ “राजेश्वर नाथ राजू” नामक एक कुत्ता भी नर्मदा परिक्रमा कर रहा है । महंत श्री ने बताया कि यह परम भक्त कुत्ता नेमावर से उनके साथ जुड़ा । पूर्व में वह एक चिकित्सक के यहाँ रहता था किंतु अब उसमें भी भक्ति और शक्ति का अद्भुत जागरण हुआ और वह स्वयं ही नर्मदा परिक्रमा यात्रा में सम्मिलित हो गया । भीषण गर्मी , कठिन पथ और लंबी दूरी के बावजूद वह आगे-पीछे रहकर निरंतर यात्रा कर रहा है ।

महंत योगी नृसिंहनाथ महाराज ने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि किसी न किसी जन्म के पुण्य और सत्कर्मों का ही परिणाम है कि यह जीव भी माँ नर्मदा की परिक्रमा कर रहा है । नर्मदा परिक्रमा केवल यात्रा नहीं यह आत्मशुद्धि, तप , त्याग और ईश्वरीय परीक्षा का मार्ग है । माँ नर्मदा स्वयं साधकों की परीक्षा लेती हैं किंतु जो साधक अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है वही कृपा का पात्र बनता है ।

उन्होंने समाज को संदेश देते हुए कहा कि माँ नर्मदा को बचाना हम सबका कर्तव्य है । माँ नर्मदा का जल कल-कल निनाद करता हुआ निर्मल रूप में प्रवाहित होता रहे । इसके लिए गंदगी , प्लास्टिक और पॉलिथीन को नदी में जाने से रोकना होगा । उन्होंने कहा कि पवित्र नगरी अमरकंटक में नर्मदा जी अत्यंत स्वच्छ और दिव्य स्वरूप में हैं किंतु जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं प्रदूषण और गंदगी बढ़ती दिखाई देती है जो अत्यंत चिंताजनक है ।

महंत श्री ने पर्यावरण संरक्षण पर भी विशेष बल देते हुए कहा कि अमरकंटक का सौंदर्य , शीतलता और आध्यात्मिक ऊर्जा यहाँ की हरियाली , वृक्षों और प्राकृतिक संतुलन से ही बनी हुई है । वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से नीचे के क्षेत्रों में भीषण गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है । यदि अमरकंटक की पवित्रता , पर्यावरण और सौंदर्य को बनाए रखना है तो वृक्षों की रक्षा और प्रकृति का संरक्षण अनिवार्य है ।

भीषण तपन के बीच यह नर्मदा परिक्रमा केवल पदयात्रा नहीं बल्कि आस्था , तपस्या , पर्यावरण चेतना और माँ नर्मदा के प्रति समर्पण का अद्वितीय संदेश बनकर समाज को प्रेरित कर रही है ।

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