स्थानीय निवासियों का कहना है कि दीवाली के त्योहार पर जहाँ लोग अपने घरों को साफ-सुथरा कर रंग-बिरंगी लाइटों और दीयों से सजाते हैं, वहीं अमलाई साइडिंग की भारी धूल महज़ कुछ ही घंटों में घरों, छतों और आँगन पर काली परत जमा देती है।
एक स्थानीय बुजुर्ग ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा, “हम त्योहार की खुशियाँ मनाएं या चौबीसों घंटे उड़ रही इस धूल से अपने बच्चों और बुजुर्गों को बचाएं? दीवाली के दीये जलाने से पहले ही उन पर कोयले की कालिख जम जाती है। सांस लेना दूभर हो गया है।”
- फेफड़ों में घुल रहा है त्योहार का उल्लास
रेलवे साइडिंग पर चौबीसों घंटे होने वाली लोडिंग-अनलोडिंग और बिना ढके चलने वाले भारी वाहनों के कारण हवा में पीएम 10 और पीएम 2.5 का स्तर सामान्य से कई गुना अधिक रहता है। दीवाली के समय जब हवा में ठंडक और नमी बढ़ती है, तो यह प्रदूषण ‘स्मॉग’ (Smog) का रूप ले लेता है, जिससे दमा, खांसी और आँखों में जलन जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इस बार लोगों की मांग है कि सिर्फ पटाखों पर ही नहीं, बल्कि सबसे बड़े प्रदूषणकारी स्रोत यानी रेलवे साइडिंग की उड़ती धूल पर भी सख्त कदम उठाए जाएं।





























