कक्का की चौपाल
ट्रेन रुकी, क्रेडिट एक्सप्रेस दौड़ी!
कैलाश पाण्डेय
संझा का बेरा था। गांव की चौपाल पर कक्का खटिया में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। घसीटा, चौरंगी अउ खबरी लाल चाय की चुस्की ले रहे थे। तभी दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी। घसीटा ने कान खड़े करते हुए कहा कक्का! ट्रेन चल पड़ी। कक्का ने अखबार मोड़ा, चश्मा उतारा और मुस्कुराते हुए बोले ट्रेन तो चल पड़ी ददा… अब देखना, इसके पीछे-पीछे क्रेडिट एक्सप्रेस कितनी तेज दौड़ती है!
चौरंगी ने पूछा क्रेडिट एक्सप्रेस वो कौन सी ट्रेन है कक्का? कक्का हंसते हुए बोले अरे ददा! रेलवे वाली ट्रेन तो रेलवे चलाती है, लेकिन काम होते ही एक दूसरी ट्रेन दौड़ पड़ती है श्रेय की ट्रेन। इसमें यात्री कम और श्रेय लेने वाले ज्यादा होते हैं। घसीटा बोला कक्का, चिरमिरी-रीवा ट्रेन चल तो रही है, तीन दिन ही सही। कक्का ने कहा यही तो असली सवाल है ददा! कोरोना में छूटी ट्रेन अब जाकर पटरी पर लौटी है। जनता खुश है कि सफर फिर शुरू हुआ, लेकिन सवाल वहीं है तीन दिन क्यों? नियमित कब?
कक्का ने चाय की प्याली उठाते हुए कहा भूख रोज लगती है और खाना तीन दिन मिले तो क्या इसे पूरी व्यवस्था कहेंगे? जनता को रोज सफर करना है, सप्ताह में तीन दिन की सुविधा से काम नहीं चलेगा। चुनाव के समय आश्वासन रोज मिल सकते हैं, फोटो रोज खिंच सकते हैं, हरी झंडी रोज दिखाई जा सकती है तो ट्रेन रोज क्यों नहीं चल सकती? अब जनता को घोषणा नहीं, नियमित सेवा की स्पष्ट तारीख चाहिए।
खबरी लाल ने कहा कक्का, ट्रेन रुकते ही कई लोग श्रेय लेने पहुंच गए। कक्का मुस्कुराए अरे ददा, यही तो असली तमाशा है! जनता पटरी पर खड़ी होकर मांग करती है, कोई आंदोलन करता है, कोई ज्ञापन देता है और कोई अधिकारियों के दरवाजे खटखटाता है। महीनों आवाज उठती है। फिर काम होता है तो कैमरा निकलता है, माला आती है, हरी झंडी लहराती है और क्रेडिट एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म पर आ जाती है। घसीटा ने पूछा उसमें टिकट कौन काटता है कक्का? कक्का बोले टिकट जनता काटती है ददा, सीट श्रेय लेने वाले ले जाते हैं।
चौपाल पर ठहाका गूंजा। कक्का ने गंभीर होते हुए कहा हमारी जनता सीधी है, मगर सब जानती है ।किसने मांग उठाई, किसने आवाज बुलंद की और कौन काम होने के बाद तस्वीर में नजर आया, इसका हिसाब जनता अपने पास रखती है। उसे श्रेय की राजनीति से ज्यादा अपने सफर की चिंता है।
चौरंगी ने पूछा कक्का, ट्रेन चल गई, मगर स्टेशन की सुविधाओं का क्या? कक्का बोले बस ददा, यहीं असली परीक्षा है। फुट ओवरब्रिज की जरूरत, प्लेटफॉर्म की हालत, साफसफाई रोशनी और सुरक्षा जैसे सवाल अभी बाकी हैं। जहां यात्री को सुरक्षित रास्ता चाहिए, वहां पुल चाहिए जहां सुविधा चाहिए, वहां व्यवस्था चाहिए। भाषण और पोस्टर से यात्री की परेशानी दूर नहीं होगी।
खबरी ने पूछा और ट्रेन लेट हुई तो? कक्का बोले ट्रेन लेट सिर्फ ट्रेन का मामला नहीं है ददा। मजदूर की मजदूरी प्रभावित होती है, विद्यार्थी की पढ़ाई छूटती है, मरीज के इलाज का सफर बिगड़ता है और नौकरीपेशा का पूरा दिन खराब होता है। फिर कोई कहे थोड़ा लेट-अर्ली तो चलता है! अरे चौरंगी, अगर तनख्वाह तीन महीना लेट हो जाए तो मालिक से भी कहना मालिक, लेट-अर्ली तो चलता है! कक्का की बात पर चौपाल में फिर हंसी छूट गई।
दूर जाती ट्रेन को देखते हुए कक्का बोले अब जनता का सवाल एकदम साफ है चिरमिरी-रीवा ट्रेन नियमित कब होगी? तारीख बताओ। हरी झंडी दिख गई, फोटो हो गया, भाषण हो गया, अब नियमित सेवा की बारी है। जनता को उद्घाटन से ज्यादा रोजमर्रा के सफर का भरोसा चाहिए।
कक्का ने चाय की आखिरी चुस्की ली और बोले याद रखना ददा, ट्रेन का इंजन रेलवे चलाता है, लेकिन क्रेडिट एक्सप्रेस का इंजन राजनीति चलाती है। सियासत और श्रेय की होड़ अपनी जगह है, मगर जनता की जरूरत उससे बड़ी है। उसे ट्रेन चाहिए नियमित, समय पर और सुरक्षित। बाकी श्रेय कौन लेता है, अनूपपुर की जनता सब जानती है।
चौपाल से आवाज उठी चिरमिरी-रीवा ट्रेन नियमित करो!
कक्का ने दूर जाती ट्रेन को देखते हुए कहा हरी झंडी दिखाना आसान है ददा, मगर जनता के भरोसे को पटरी पर दौड़ाना मुश्किल है।

































































