कृष्ण जन्म से अंत तक वह यात्रा, जिसमें हर मोड़ पर कुछ छूटता गया

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कृष्ण जन्म से अंत तक वह यात्रा, जिसमें हर मोड़ पर कुछ छूटता गया

कैलाश पाण्डेय

राज की बात यह है कि भगवान श्रीकृष्ण की कथा को यदि केवल चमत्कारों और लीलाओं से देखा जाए, तो शायद हम कृष्ण के सबसे मानवीय और सबसे करुण पक्ष को देख ही नहीं पाएंगे। जिस कृष्ण को संसार ने भगवान कहा, उनके जीवन की पहली सांस ही वियोग के बीच चली। उन्होंने दूसरों को संभाला, लेकिन स्वयं अपने जीवन में बार-बार बिछोह सहा। उन्होंने धर्म की स्थापना की, उसकी रक्षा की, लोगों को आश्रय दिया और प्रेम का अर्थ समझाया, लेकिन इसके लिए उन्हें अपने हिस्से का सुख लगातार छोड़ना पड़ा

मथुरा की उस अंधेरी कारागार में देवकी ने कृष्ण को जन्म दिया। बाहर कंस का आतंक था और भीतर एक मां की गोद में वह बालक था, जिसे संसार का पालनहार कहा जाना था। लेकिन जन्म लेते ही उस मां का अधिकार उससे छिन गया। वसुदेव कृष्ण को लेकर अंधेरी रात में यमुना पार गोकुल चले गए। कल्पना कीजिए उस क्षण की, जब एक मां अपने नवजात को आखिरी बार देख रही हो और जानती हो कि वह उसे अपने पास रख भी नहीं सकती। देवकी ने कृष्ण को जन्म दिया, यशोदा ने उन्हें पाला, लेकिन कृष्ण का बचपन दो माताओं के प्रेम के बीच बंटा रहा। शायद नियति ने उनके जीवन के आरंभ में ही लिख दिया था कि उन्हें प्रेम तो बहुत मिलेगा, लेकिन उसे अपने पास रखने का अधिकार हमेशा नहीं मिलेगा

गोकुल और वृंदावन ने कृष्ण को वह बचपन दिया, जिसे संसार आज भी सबसे सुंदर बाललीला के रूप में याद करता है। यशोदा की डांट में ममता थी, नंद के आंगन में अपनापन था, ग्वाल-बालों में मित्रता थी और राधा के प्रेम में वह भाव था, जिसे शब्दों में बांधना कठिन है। यमुना किनारे बजती बांसुरी और ब्रज की गलियों में दौड़ता बालक कृष्ण मानो उनके जीवन का सबसे उजला अध्याय था। लेकिन कृष्ण के जीवन में सुख कभी अकेला नहीं आया, उसके पीछे संकट भी खड़ा रहा। पूतना, तृणावर्त और कालिया जैसे संकटों से ब्रज को बचाते हुए कृष्ण ने धीरे धीरे यह दिखाया कि उनकी शक्ति केवल अपने लिए नहीं, दूसरों की रक्षा के लिए है। गोवर्धन धारण इसी भावना का विस्तार था अपने लोगों के भय को अपने ऊपर ले लेना

फिर वह दिन आया, जब कृष्ण को इस संसार से जाना पड़ा, जिसे उन्होंने सबसे अधिक प्रेम किया था। कंस के अत्याचार का अंत करने के लिए मथुरा से बुलावा आया और कृष्ण चले गए। वृंदावन वहीं रह गया। यमुना बहती रही, कदंब खड़े रहे, ग्वाल बाल उनकी राह देखते रहे और राधा के हिस्से में रह गया एक ऐसा विरह, जिसका कोई अंत नहीं था। कृष्ण के लिए यह केवल मथुरा की ओर जाने वाली यात्रा नहीं थी, यह अपने बचपन, अपने घर और अपने प्रेम से विदाई थी। धर्म की रक्षा के लिए उन्हें उस प्रेम को पीछे छोड़ना पड़ा, जिसे शायद उनका मन कभी छोड़ना नहीं चाहता था। यही कृष्ण के जीवन का वह क्षण था, जहां भगवान ने अपने भीतर के मनुष्य को पीछे छोड़कर कर्तव्य को आगे कर दिया

कंस का अंत हुआ, माता पिता मुक्त हुए, अत्याचार का एक अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन कृष्ण के संघर्ष का नहीं। जरासंध के आक्रमणों से मथुरा की प्रजा को बचाने के लिए उन्होंने समुद्र के किनारे द्वारका बसाई। संसार ने उन्हें ‘रणछोड़’ कहा, पर कृष्ण ने शायद यह समझ लिया था कि हर लड़ाई तलवार से नहीं जीती जाती। कभी-कभी हजारों निर्दोष लोगों की जान बचाने के लिए अपनी वीरता की छवि तक छोड़ देनी पड़ती है। उन्होंने अपने नाम पर लगे शब्द की चिंता नहीं की, क्योंकि उनके लिए धर्म अपनी प्रतिष्ठा से बड़ा था

द्वारका में कृष्ण का जीवन बदल गया। वृंदावन का ग्वाला अब द्वारकाधीश था। बांसुरी के साथ राजधर्म जुड़ गया और बाललीलाओं के साथ कूटनीति। महाभारत के समय जब युद्ध की आहट सुनाई दी तो कृष्ण ने पहले शांति का मार्ग चुना। वे हस्तिनापुर गए, समझाने का प्रयास किया और न्याय की बात रखी। लेकिन जब अधर्म ने शांति को ठुकरा दिया तो कुरुक्षेत्र सामने आया। वहां कृष्ण ने अपने हाथ में शस्त्र नहीं लिया। उन्होंने अर्जुन के रथ की लगाम थामी। जिस व्यक्ति के हाथ में संसार की सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है, वही दूसरे के रथ का सारथी बनकर खड़ा था

अर्जुन टूट चुके थे। सामने अपने ही लोग थे। कृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध के लिए प्रेरित नहीं किया, बल्कि जीवन का अर्थ समझाया। कर्म क्या है, धर्म क्या है, आत्मा क्या है और कर्तव्य से भागना क्यों स्वयं से भागना है इन प्रश्नों के उत्तर गीता में मिले। भगवान श्रीकृष्ण चाहते तो स्वयं सब कुछ कर सकते थे, लेकिन उन्होंने मनुष्य को उसके कर्म का अधिकार समझाया। अपनी शक्ति को पीछे रखकर मानव को उसके धर्म के सामने खड़ा कर देना ही शायद उनका सबसे बड़ा त्याग था

युद्ध समाप्त हुआ। धर्म की विजय हुई, लेकिन उस विजय के पीछे कितनी चीखें दब गईं, इसका हिसाब किसी शंख ने नहीं दिया। कुरुक्षेत्र की धरती पर असंख्य परिवार उजड़ चुके थे। माताओं की गोद खाली थी, पत्नियों की मांग सूनी थी और बच्चों के सिर से पिता का साया उठ चुका था। गांधारी ने अपने सौ पुत्र खो दिए। उसका दुःख इतना बड़ा था कि उसके शब्दों में कृष्ण के लिए श्राप निकल आया। भगवान श्रीकृष्ण ने प्रतिवाद नहीं किया। शायद वे जानते थे कि जिस मां की पूरी दुनिया उजड़ चुकी हो, उसके सामने भगवान भी मौन हो जाते हैं

लेकिन समय को शायद श्रीकृष्ण से अभी और कुछ लेना था। कृष्ण धीरे-धीरे उस एकांत की ओर बढ़े, जहां उनके जीवन की अंतिम कथा लिखी जानी थी।
प्रभास के वन में एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते श्रीकृष्ण को शिकारी जरा ने हिरण समझकर बाण चला दिया। बाण लगा और जरा को अपनी भूल का पता चला। वह भय से कांप उठा, लेकिन कृष्ण ने उसे दोष नहीं दिया। उन्होंने उसे क्षमा कर दिया। यह दृश्य कृष्ण के पूरे जीवन का सार अपने भीतर समेटे हुए है। जिसने अत्याचारियों के विरुद्ध धर्म की रक्षा की, उसने एक अनजाने अपराधी के सामने प्रतिशोध नहीं चुना। मृत्यु के द्वार पर खड़े होकर भी उनके भीतर करुणा जीवित रही

कृष्ण का शरीर संसार से विदा हुआ, लेकिन उनकी जीवन लीला वहीं समाप्त नहीं हुई। मथुरा की जन्माष्टमी में आज भी वह कारागार प्रकाश से भर उठती है। गोकुल में यशोदा का कान्हा दिखाई देता है, वृंदावन में राधा का विरह सुनाई देता है, ब्रज की होली में उनकी हंसी लौटती है, गोवर्धन में संरक्षण का भाव दिखाई देता है, द्वारका में राजधर्म की स्मृति मिलती है और कुरुक्षेत्र में गीता बनकर कृष्ण आज भी मनुष्य को उसके कर्तव्य की ओर बुलाते हैं।
कृष्ण अवतारी थे, लेकिन उनके जीवन में त्याग मनुष्य से कम नहीं था। मां की गोद से अलग हुए, वृंदावन का प्रेम पीछे छोड़ा, मथुरा से दूर हुए, अपनी प्रतिष्ठा की चिंता नहीं की, युद्ध में शस्त्र नहीं उठाया और अंत में अपने ही वंश को बिखरते देखा। इतने बिछोह के बाद भी उनके भीतर शिकायत नहीं आई। उन्होंने प्रेम को विरह में बदलते देखा, विजय को शोक में बदलते देखा और अपने संसार को समय के हाथों टूटते देखा, फिर भी धर्म और करुणा का साथ नहीं छोड़ा

शायद कृष्ण की सबसे बड़ी करुणा यही है कि वे हमें दुःख से बचने का वादा नहीं करते। वे हमें दुःख के बीच खड़े रहने की शक्ति देते हैं। वे बताते हैं कि हर इच्छा पूरी होना जीवन नहीं है और हर बिछोह अंत नहीं होता। कभी मां से दूर जाना पड़ता है, कभी प्रेम पीछे छोड़ना पड़ता है, कभी अपनी प्रतिष्ठा का त्याग करना पड़ता है और कभी अपने ही लोगों को समय के हाथों जाते हुए देखना पड़ता है। फिर भी मनुष्य यदि अपने धर्म, कर्म और करुणा को बचाए रखे, तो उसका जीवन व्यर्थ नहीं जाता

कृष्ण की यात्रा इसलिए अद्भुत है कि वह केवल जन्म से मृत्यु तक की यात्रा नहीं, बल्कि प्रेम से विरह, शक्ति से त्याग, संघर्ष से धर्म और अंततः मृत्यु से क्षमा तक की यात्रा है। उन्होंने संसार को बहुत कुछ दिया, लेकिन अपने हिस्से में बहुत कुछ खोया। शायद इसी कारण कृष्ण केवल पूजे नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं।
वे उस मां की आंखों के आंसू में हैं, जो अपने बच्चे के लिए अपना सुख छोड़ देती है। वे उस प्रेम में हैं, जो मिलन के बिना भी जीवित रहता है। वे उस व्यक्ति के साहस में हैं, जो निजी हित छोड़कर कर्तव्य निभाता है। वे उस हृदय में हैं, जो अपनों को खोने के बाद भी कठोर नहीं होता और उस आत्मा में हैं, जो अंतिम क्षण में भी क्षमा करना जानती है।
भगवान श्री कृष्ण की लीला का सबसे मार्मिक सत्य शायद यही है जिसने संसार को संभालने का दायित्व उठाया, उसे अपने जीवन में बार बार अकेला होना पड़ा। जन्म से अंत तक उनके रास्ते में बहुत कुछ छूटता गया, लेकिन हर बार मानवता को कुछ मिलता गया प्रेम, त्याग, विरह, करुणा, धर्म, कर्तव्य और क्षमा

शायद इसी को कृष्ण लीला कहते हैंअपने भीतर के दर्द को संसार के लिए प्रकाश बना देना।
जय श्रीकृष्ण।

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