वैश्विक बाजारवादी शक्तियों को पहचानना और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना आज की आवश्यकता -कैलाश चंद्र, क्षेत्र प्रचार प्रमुख
अनूपपुर। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक में 18 अगस्त 2026 को आयोजित विशेष व्याख्यान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र प्रचार प्रमुख श्री कैलाश चंद्र ने “ग्लोबल मार्केट फोर्सेस (वैश्विक बाजारवादी शक्तियाँ)” विषय पर विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को संबोधित किया तथा सचित्र प्रस्तुति दी। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को समझना आवश्यक है कि इनकी कार्यप्रणाली क्या है और इनका प्रभाव राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, संस्कृति एवं आत्मबोध पर कैसे पड़ता है
संचालन डीन प्रो. विकास सिंह, राष्ट्रीय सचिव, स्वदेशी शोध संस्थान ने तथा अध्यक्षता कुलपति (प्र.) प्रो. अवधेश कुमार शुक्ला ने की। शुभारंभ भारतमाता एवं सरस्वती माता के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुआ। स्वागत समरस शिक्षक समूह डॉ. कमलेश पांडे, अनुराग सिंह, आशीष गुप्ता, पंकज पयासी, गुप्तेश्वर प्रजापति, अजीत कुर्रे, रंजन कुमार, रामभाऊ कोठार, ओमप्रकाश पाठक, अभिनेंद्र सिंह, जगदीश चंद्रवंशी, खेलन सिंह ओरके, हीरा सिंह उद्दे, समृद्धि जैन, नैमिष, वैभव, रितिका दास, साक्षी प्रियदर्शनी, शिवांशु, रोहित श्रीवास तथा गायत्री राजपूत ने किया।
उपनिषद् के मंत्र से उद्बोधन का शुभारंभ
श्री कैलाश चंद्र ने बृहदारण्यक उपनिषद् के मंत्र “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय” की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका अभिप्राय व्यावहारिक भी है “असत्” से “सत्” अर्थात् भ्रामक प्रचार से तथ्य की ओर; “तमस्” से “ज्योति” अर्थात् अंधानुकरण से विवेक की ओर; तथा “मृत्यु” से “अमृत” अर्थात् दिखावटी उपभोग से स्थायी मूल्यों की ओर बढ़ना। इन शक्तियों को समझने की दृष्टि इसी मंत्र में निहित है।
विज्ञापन और दिखावटी प्रचार की रणनीति से युवा सतर्क हों
श्री कैलाश चंद्र ने कहा कि वैश्विक बाजार की ताकतें ऐसा दिखावटी प्रचार करती हैं जिसमें सामान्य नागरिक सहज ही झाँसे में आ जाता है। “कुछ मीठा हो जाए” जैसे विज्ञापन-वाक्यों से विदेशी कंपनियाँ भारत में व्यापार बढ़ा रही हैं, और इनके लिए प्रायः वे फिल्म कलाकार चुने जाते हैं जो स्वयं उस उत्पाद का सेवन नहीं करते। इस प्रकार लोकप्रिय चेहरों की विश्वसनीयता से पारंपरिक मिष्ठान्न बाजार पर कब्जा जमाया जाता है और स्थानीय हलवाई प्रभावित होते हैं। उन्होंने कहा कि विज्ञापन देखते समय अवश्य पूछें कि इसके पीछे कौन है।
भारतीय उद्योग जगत पर प्रभाव तथा डी-डॉलराइजेशन की आवश्यकता
श्री कैलाश चंद्र ने आगे कहा कि ये शक्तियाँ फिल्मी गीतों, लोकप्रिय संस्कृति और प्रचार-रणनीति से भारतीय उद्योग जगत को प्रभावित करती हैं। दो हजार वर्ष पूर्व भारत की हिस्सेदारी विश्व की कुल जी.डी.पी. के एक-तिहाई से अधिक थी, जो एंगस मैडिसन के रेखाचित्र के अनुसार उपनिवेशकाल में अत्यंत न्यून रह गई। आज भारत को “डी-डॉलराइजेशन” की दिशा में गंभीर शोध करना चाहिए तथा शोधार्थी रुपये की स्वीकार्यता बढ़ाने के मार्ग सुझाएँ। उन्होंने कहा कि जिस पद्धति में उपभोग जितना अधिक हो, जी.डी.पी. उतनी अधिक मानी जाए, वह भारतीय जीवन-दृष्टि के अनुकूल नहीं है। भारतीय परंपरा संयम एवं आवश्यकता-आधारित उपभोग को श्रेष्ठ मानती है, जबकि यह सूत्र अधिकाधिक उपभोग को ही प्रगति का पर्याय बनाता है, इसमें जो कम खर्च कर अधिक बचत करे, वह “कम उपयोगी” माना जाता है। उन्होंने ऐसे मापदंड बनाने का आग्रह किया जिनमें पर्यावरणीय संतुलन एवं जीवन की गुणवत्ता भी हो।
वैश्विक सूचकांकों की विश्वसनीयता पर आपत्ति
श्री कैलाश चंद्र ने ग्लोबल हैप्पीनेस इंडेक्स तथा ग्लोबल हंगर इंडेक्स जैसे सूचकांकों को त्रुटिपूर्ण, पूर्वाग्रह से ग्रस्त तथा देश की वास्तविक स्थिति के आकलन में असमर्थ बताया। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में भारत ने सुदृढ़ कृषि उपज एवं खाद्यान्न सुरक्षा के बल पर अठारह से अधिक देशों को गेहूँ निर्यात किया, जिसकी अंतरराष्ट्रीय सराहना हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध से वैश्विक आपूर्ति बाधित होने पर ये दोनों देश कुल गेहूँ निर्यात का लगभग एक-चौथाई आपूर्त करते हैं — विश्व के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक भारत ने आपूर्ति और बढ़ाई। उनके अनुसार, जो राष्ट्र संकटकाल में दूसरों का पेट भरे, उसे भूख-सूचकांक में निम्न स्थान देना इन एजेंसियों की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। उन्होंने वैश्विक औषधि (फार्मा) उद्योग पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि इस क्षेत्र के बड़े खिलाड़ी विभिन्न विषाणुओं एवं रोगों पर शोध करते हैं तथा उनकी औषधियाँ भी निर्मित करते हैं, और ऐसी शक्तियाँ अनेक देशों को लक्ष्य बनाकर कार्य कर रही हैं
विश्व आदिवासी दिवस का वास्तविक संदर्भ
श्री कैलाश चंद्र ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस का मूल संदर्भ भारत से नहीं, अपितु अन्य देशों में वहाँ के मूल निवासियों पर हुए अत्याचारों की स्मृति से जुड़ा है। अमेरिका में वास्तविक मूल निवासियों की संख्या अत्यंत कम रह गई है और वहाँ यूरोपीय मूल के लोगों का प्रभुत्व है; यह दिवस उन्हीं के प्रति श्रद्धांजलि का अवसर है। भारत का जनजातीय समाज इससे भिन्न इसी भूमि का मूल अंग तथा समाज-जीवन की मुख्यधारा से सदैव जुड़ा रहा है।
लाल बहादुर शास्त्री का स्मरण एवं संस्कृति के छह आयामों पर प्रभाव
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि खाद्यान्न संकट के समय उनकी अपील पर सम्पूर्ण देश ने स्वेच्छा से एक समय का भोजन त्याग दिया था। अपील से पूर्व उन्होंने स्वयं आचरण किया, इसीलिए जनता ने उसे हृदय से स्वीकार किया। नेतृत्व स्वयं आदर्श प्रस्तुत करे तो समाज त्याग को तत्पर हो जाता है। उन्होंने कहा कि ये शक्तियाँ भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भवन तथा भ्रमण इन छह आयामों पर सुनियोजित प्रभाव डालती हैं। चलचित्र, विज्ञापन और सोशल मीडिया की रणनीतियों तथा भ्रामक प्रचार से ये समाज की रुचि बदलकर उसी आधार पर व्यापार स्थापित करती हैं। भाषा में विदेशी शब्दों का प्रवेश, स्थानीय परिधानों का लोप, परंपरागत आहार का स्थान बाहरी खाद्य-शृंखलाओं द्वारा लिया जाना तथा जलवायु के प्रतिकूल काँच की इमारतें इसी के दृश्य रूप हैं। उन्होंने आग्रह किया कि विद्यार्थी स्वदेशी दृष्टि अपनाकर अपने “स्व” की रक्षा करें।
अंत में उपस्थित अधिकारीगण, प्राध्यापक, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने सामूहिक वन्देमातरम् का गायन किया।



































