प्रेमचंद का साहित्य सत्ता संरचना की परतें खोलने वाला साहित्य : प्रो. संतोष कुमार भदौरिया
आईजीएनटीयू में प्रेमचंद की 146वीं जयंती पर राष्ट्रीय ऑनलाइन व्याख्यान, ‘प्रेमचंद की भारत संकल्पना’ विषय पर हुआ विमर्श
अमरकंटक। हिन्दी कथा साहित्य के अमर शिल्पी मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती के अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (आईजीएनटीयू), अमरकंटक के हिन्दी विभाग द्वारा राष्ट्रीय स्तर का ऑनलाइन व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम का विषय “प्रेमचंद की भारत संकल्पना” रखा गया, जिसमें देशभर के शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं साहित्य प्रेमियों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज के वरिष्ठ आचार्य प्रो. संतोष कुमार भदौरिया ने प्रेमचंद के साहित्य की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि “प्रेमचंद का साहित्य पावर स्ट्रक्चर को डिकोड करने वाला साहित्य है। यही उनके साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है।” उन्होंने कहा कि प्रेमचंद केवल कहानीकार नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज की सत्ता संरचनाओं, सामाजिक असमानताओं और शोषण की गहरी समझ रखने वाले चिंतक भी थे।
प्रो. भदौरिया ने कहा कि प्रेमचंद ऐसे दौर में लिख रहे थे जब भारत अंग्रेजी उपनिवेशवाद के अधीन था। उस समय देश राजनीतिक गुलामी के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विषमताओं से जूझ रहा था। प्रेमचंद ने अपने साहित्य में स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय, सांप्रदायिक सौहार्द और नैतिक समाज के निर्माण की परिकल्पना को प्रमुखता दी। उनके साहित्य में किसानों, मजदूरों, महिलाओं, दलितों, वंचितों और समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा और संघर्ष को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्ति मिली है।
उन्होंने कहा कि भारत में औद्योगीकरण और पूंजीवाद के आरंभिक दौर में ही प्रेमचंद ने पूंजीवादी व्यवस्था, सामंती सोच और औद्योगीकरण से उत्पन्न सामाजिक विसंगतियों को पहचान लिया था। यही कारण है कि उनका साहित्य आज उदारीकरण और वैश्विक पूंजीवाद के दौर में भी उतना ही प्रासंगिक दिखाई देता है। प्रेमचंद की रचनाएं आज भी सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों की रक्षा का संदेश देती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति प्रो. अवधेश कुमार शुक्ल ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने प्रेमचंद की प्रमुख रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका साहित्य भारतीय समाज के नैतिक और सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य को समाज परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बनाया और उनके विचार आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
कार्यक्रम के प्रारंभ में मानविकी एवं भाषा विज्ञान संकाय की अधिष्ठाता प्रो. रेनू सिंह ने विषय प्रवर्तन करते हुए समकालीन संदर्भों में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की अनेक सामाजिक चुनौतियों का समाधान प्रेमचंद की वैचारिक दृष्टि में निहित है।
हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. जितेंद्र कुमार सिंह ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया तथा कार्यक्रम के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. वीरेंद्र प्रताप ने किया, जबकि वरिष्ठ सहायक आचार्य डॉ. प्रवीण कुमार ने आभार व्यक्त किया।
राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस ऑनलाइन व्याख्यान में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, संकायों के अधिष्ठाता, शिक्षक, शोधार्थी तथा देशभर के अनेक विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से जुड़े विद्वानों ने सहभागिता की। कार्यक्रम में प्रेमचंद के साहित्य की सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रासंगिकता पर गंभीर चर्चा हुई तथा यह निष्कर्ष सामने आया कि बदलते समय में भी प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज को दिशा देने वाली एक महत्वपूर्ण वैचारिक धरोहर बना हुआ है।













