
भालूमाड़ा/कोतमा। मध्यप्रदेश के छोटे से कस्बे भालूमाड़ा की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर आज अरुणिमा मिश्रा समाज सेवा के क्षेत्र में एक सशक्त और प्रेरणादायी नाम बन चुकी हैं। आश्रयनिष्ठा वेलफेयर सोसायटी की संस्थापिका के रूप में उन्होंने न केवल जरूरतमंदों की सेवा की, बल्कि यह भी साबित किया कि सच्चा जज्बा किसी भी परिस्थिति को अवसर में बदल सकता है।
अरुणिमा मिश्रा बताती हैं कि समाज सेवा का भाव उन्हें विरासत में मिला। बचपन में अपने पिता को पक्षियों, कुत्तों-बिल्लियों और जरूरतमंद लोगों की सेवा करते देख उनके मन में भी यही संस्कार विकसित हुए। “घर में कोई भी आ जाए, बिना भोजन किए नहीं जाता था और आधी रात में भी कोई मदद मांगता तो पिता तुरंत तैयार रहते थे,” वे बताती हैं।
भालूमाड़ा के हलोब्लॉक में जन्मी और वहीं शिक्षित अरुणिमा का जीवन सामान्य था, लेकिन कुछ अलग करने का जुनून उन्हें वर्ष 2006 में छत्तीसगढ़ ले गया। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते शुरुआत में समाज सेवा के लिए समय नहीं मिल पाया, लेकिन वर्ष 2015 से उन्होंने अपने जीवन की नई दिशा तय की और सेवा कार्यों में सक्रिय हो गईं।
शुरुआत छोटे-छोटे कार्यों से हुई—किसी भूखे को खाना खिलाना, मरीज को अस्पताल पहुंचाना—लेकिन यही छोटे कदम आगे चलकर बड़े अभियान में बदल गए। आज वे कुष्ठ रोगियों की एक पूरी बस्ती को गोद लेकर उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति कर रही हैं, वहीं वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों की सेवा में भी निरंतर जुटी रहती हैं।
कोरोना महामारी के दौरान उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। खुद दो बार कोविड पॉजिटिव होने के बावजूद उन्होंने जरूरतमंदों के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर, अस्पताल बेड और रेमडेसिविर जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराईं। लॉकडाउन के दौरान उनकी टीम ने लगातार दो महीने तक जरूरतमंदों को भोजन और राशन पहुंचाया।
इसके अलावा उन्होंने दर्जनों रक्तदान शिविर आयोजित कर थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए रक्त उपलब्ध कराया तथा महिलाओं के सशक्तिकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी उनकी सक्रियता रही, जिसके लिए उन्हें दिल्ली में जल मंत्री राजभूषण चौधरी के हाथों “एकल राष्ट्रीय जलप्रहरी सम्मान” से सम्मानित किया गया।
अरुणिमा मिश्रा को अब तक अहिल्याबाई होलकर सम्मान, छत्तीसगढ़ महतारी सम्मान, कोरोना वॉरियर्स सम्मान, “एक पेड़ मां के नाम” अभियान सहित लगभग 1500 से अधिक सम्मानों से नवाजा जा चुका है।
अपने प्रेरणादायी संदेश में वे कहती हैं, “अगर मैं एक छोटे से कस्बे से निकलकर समाज के लिए कुछ कर सकती हूं, तो हमारी बेटियां और बहनें क्यों नहीं। अपने लिए तो हर कोई जीता है, लेकिन दूसरों की सेवा से जो सुकून मिलता है, वही असली खुशी है।”
वे युवाओं से अपील करती हैं कि मदद की शुरुआत छोटे स्तर से करें और कभी पीछे न हटें। उनका मानना है कि जब हम दूसरों के लिए अच्छा करते हैं, तो ईश्वर स्वयं हमारे लिए रास्ते आसान कर देता है।
अरुणिमा मिश्रा की यह यात्रा न केवल समाज सेवा की मिसाल है, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा भी है जो कुछ करने का जज्बा रखते हैं, लेकिन कदम बढ़ाने से हिचकिचाते हैं।

















