कक्का की चौपाल — कोतमा बस स्टैंड, अग्रवाल लॉज हादसा स्थल से चलती सांसों की तलाश

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कोतमा बस स्टैंड के पास अग्रवाल लॉज के मलबे पर शाम ढल चुकी है… लेकिन अंधेरा सिर्फ आसमान में नहीं, लोगों के चेहरों पर भी उतर आया है…

धूल अब भी हवा में तैर रही है… टूटी दीवारें, मुड़े हुए सरिए और बिखरे पत्थरों के बीच जेसीबी मशीनें लगातार चल रही हैं जैसे हर वार के साथ किसी की सांस तलाश रही हों…

एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें दिन-रात जुटी हैं… हर पत्थर हटने पर भीड़ की सांस थम जाती है

“शायद कोई जिंदा हो…”

एक तरफ मशीनों की कर्कश आवाज… दूसरी तरफ परिजनों की सिसकियां… और इनके बीच खड़ी एक उम्मीद—जो टूटते-टूटते भी जिंदा है…

पास ही अफसरों की हलचल है… निर्देश दिए जा रहे हैं… लेकिन भीड़ की नजरें सिर्फ मलबे पर टिकी हैं—अंदर कोई सांस बाकी है या नहीं…

इसी अफरा-तफरी, डर और उम्मीद के बीच… भीड़ के एक किनारे खड़ी है कक्का की चौपाल…

कक्का चारों तरफ देखते हैं… आंखों में धूल भी है और दर्द भी…

“अरे भइया… ये सब यूं ही नहीं गिरता… पहले नींव कमजोर होती है… फिर एक दिन पूरा ढांचा बैठ जाता है…”

घसीटा बेचैन है… आवाज में गुस्सा और घबराहट दोनों

“कक्का! 30-40 फीट खुदाई हो रही थी… इतना बड़ा गड्ढा… किसी ने रोका क्यों नहीं? किसी को दिखा नहीं क्या?”

चौरंगी लाल हल्की हंसी के साथ कड़वा सच फेंकता है

“घसीटा… यहां देखने वाले सब देखते हैं… पर कागजों में सब ‘ठीक’ कर दिया जाता है… और फिर एक दिन… सच ऐसे ही ढह जाता है…”

भीड़ से अचानक आवाज आती है

“जल्दी करो… अभी भी लोग अंदर हैं…!”

कुछ लोग मलबे की तरफ दौड़ते हैं… कुछ पीछे हटते हैं… डर और उम्मीद आमने-सामने खड़े हो जाते हैं…

कक्का गहरी सांस लेकर बोलते हैं

“बात सीधी है बेटा… न सुरक्षा थी… न निगरानी… और न ही जिम्मेदारी… तभी तो ये हाल हुआ…”

घसीटा अब और तीखा हो जाता है

“तो कक्का… जिम्मेदार कौन? कौन लेगा इन मौतों का हिसाब?”

कक्का धीमे लेकिन धारदार शब्दों में जवाब देते हैं

“पूरा तंत्र…

नगर पालिका—जो रोक नहीं पाई…

इंजीनियर—जिसने खतरा नहीं देखा…

नगर पालिका का राजस्व विभाग जिसने निर्माण कार्य की सच्चाई को दबा कर रखा…

CMO—जिसने निगरानी नहीं की…

अध्यक्ष—जो जवाबदेह था… पर खामोश रहा…

और जिसने खुदाई करवाई… वो तो सीधा दोषी है ही…”

चौरंगी लाल भीड़ की तरफ देखते हुए तंज कसता है

“और अब देखना… जांच होगी… मुआवजा मिलेगा… फोटो खिंचेंगे… और फाइल बंद…”

तभी पास से जेसीबी रुकती है… हलचल होती है… एक युवक मलबे के बीच खड़ा दिखता है… धूल से सना चेहरा… लेकिन हाथ अब भी काम में लगे…

घसीटा इशारा करता है

“कक्का… देखो उसे… शाम से लगा है… रुका ही नहीं…”

कक्का की नजर उस पर टिक जाती है… आवाज भारी हो जाती है

“जानते हो कौन है वो…? हेमराज… गोविंदा गांव का… तीन घंटे तक मलबा हटाता रहा… उसे नहीं पता था… जिस मलबे को वो हटा रहा है… उसी के नीचे उसका अपना परिवार दबा है…”

भीड़ एकदम शांत हो जाती है…

कक्का आगे कहते हैं

“फिर मलबे से निकली लाश… उसके बाप की थी… और मामा… अब भी कहीं अंदर दबा है…”

घसीटा की आवाज कांप जाती है

“फिर… वो रुक गया होगा?”

कक्का सिर हिलाते हैं

“नहीं बेटा… वो फिर उसी मलबे में उतर गया… दूसरों को बचाने… और अपने को खोजने…”

चौरंगी लाल धीमे स्वर में बोलता है

“यही फर्क है… कुछ लोग कैमरे में दिख रहे हैं… और कुछ लोग दर्द में भी इंसानियत निभा रहे हैं…”

इसी बीच पास खड़े कुछ लोग आपस में फुसफुसाते हैं—

“पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है…”

घसीटा तुरंत कक्का की ओर देखता है

“कक्का! कुछ तो कार्रवाई हुई क्या?”

कक्का गंभीर स्वर में कहते हैं

“हाँ बेटा… पुलिस अधीक्षक श्री मोतिउर्रहमान ने मीडिया को बताया है कि अग्रवाल लॉज के मालिक और जमीन स्वामी के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हुआ है… बीएनएस की धारा 106 के तहत… अब मामला कोतमा थाने में विवेचना में है…”

चौरंगी लाल फिर कटाक्ष करता है

“देखते हैं… ये केस भी सच्चाई तक पहुंचता है… या कागजों में ही दम तोड़ देता है…”

कक्का आगे जोड़ते हैं

“सरकार ने भी मृतकों के परिजनों को 9 लाख और घायलों को 2.50 लाख की सहायता देने की घोषणा की है…”

घसीटा की आंखें फिर मलबे की ओर चली जाती हैं

“कक्का… पैसा तो मिल जाएगा… पर जो चला गया… वो कैसे लौटेगा?”

कक्का की आवाज भर्रा जाती है

“बेटा… मुआवजा दर्द कम कर सकता है… खत्म नहीं…”

तभी जेसीबी दोबारा चलती है… भीड़ फिर चुप हो जाती है… हर आंख उसी जगह टिक जाती है…

अचानक आवाज गूंजती है

“धीरे… यहां कुछ हो सकता है…”

पूरा माहौल थम जाता है… सांसें रुक जाती हैं…

कक्का धीरे से कहते हैं

“डर ये नहीं है कि कौन दबा है… डर ये है… कहीं सच भी मलबे में ही दब न जाए…”

और फिर चौपाल में सन्नाटा छा जाता है…

कुछ पल बाद कक्का भीड़ की ओर देखते हुए आखिरी सवाल छोड़ते हैं

“बताओ भइया… क्या इस मलबे से सिर्फ लोग निकलेंगे… या उन गलतियों का सच भी बाहर आएगा… जिनकी वजह से ये सब हुआ?”

जेसीबी फिर चलती है… धूल फिर उड़ती है…

और कोतमा बस स्टैंड का यह हादसा…

अभी भी खत्म नहीं हुआ…

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धूल अब भी हवा में तैर रही है… टूटी दीवारें, मुड़े हुए सरिए और बिखरे पत्थरों के बीच जेसीबी मशीनें लगातार चल रही हैं जैसे हर वार के साथ किसी की सांस तलाश रही हों…

एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें दिन-रात जुटी हैं… हर पत्थर हटने पर भीड़ की सांस थम जाती है

“शायद कोई जिंदा हो…”

एक तरफ मशीनों की कर्कश आवाज… दूसरी तरफ परिजनों की सिसकियां… और इनके बीच खड़ी एक उम्मीद—जो टूटते-टूटते भी जिंदा है…

पास ही अफसरों की हलचल है… निर्देश दिए जा रहे हैं… लेकिन भीड़ की नजरें सिर्फ मलबे पर टिकी हैं—अंदर कोई सांस बाकी है या नहीं…

इसी अफरा-तफरी, डर और उम्मीद के बीच… भीड़ के एक किनारे खड़ी है कक्का की चौपाल…

कक्का चारों तरफ देखते हैं… आंखों में धूल भी है और दर्द भी…

“अरे भइया… ये सब यूं ही नहीं गिरता… पहले नींव कमजोर होती है… फिर एक दिन पूरा ढांचा बैठ जाता है…”

घसीटा बेचैन है… आवाज में गुस्सा और घबराहट दोनों

“कक्का! 30-40 फीट खुदाई हो रही थी… इतना बड़ा गड्ढा… किसी ने रोका क्यों नहीं? किसी को दिखा नहीं क्या?”

चौरंगी लाल हल्की हंसी के साथ कड़वा सच फेंकता है

“घसीटा… यहां देखने वाले सब देखते हैं… पर कागजों में सब ‘ठीक’ कर दिया जाता है… और फिर एक दिन… सच ऐसे ही ढह जाता है…”

भीड़ से अचानक आवाज आती है

“जल्दी करो… अभी भी लोग अंदर हैं…!”

कुछ लोग मलबे की तरफ दौड़ते हैं… कुछ पीछे हटते हैं… डर और उम्मीद आमने-सामने खड़े हो जाते हैं…

कक्का गहरी सांस लेकर बोलते हैं

“बात सीधी है बेटा… न सुरक्षा थी… न निगरानी… और न ही जिम्मेदारी… तभी तो ये हाल हुआ…”

घसीटा अब और तीखा हो जाता है

“तो कक्का… जिम्मेदार कौन? कौन लेगा इन मौतों का हिसाब?”

कक्का धीमे लेकिन धारदार शब्दों में जवाब देते हैं

“पूरा तंत्र…

नगर पालिका—जो रोक नहीं पाई…

इंजीनियर—जिसने खतरा नहीं देखा…

नगर पालिका का राजस्व विभाग जिसने निर्माण कार्य की सच्चाई को दबा कर रखा…

CMO—जिसने निगरानी नहीं की…

अध्यक्ष—जो जवाबदेह था… पर खामोश रहा…

और जिसने खुदाई करवाई… वो तो सीधा दोषी है ही…”

चौरंगी लाल भीड़ की तरफ देखते हुए तंज कसता है

“और अब देखना… जांच होगी… मुआवजा मिलेगा… फोटो खिंचेंगे… और फाइल बंद…”

तभी पास से जेसीबी रुकती है… हलचल होती है… एक युवक मलबे के बीच खड़ा दिखता है… धूल से सना चेहरा… लेकिन हाथ अब भी काम में लगे…

घसीटा इशारा करता है

“कक्का… देखो उसे… शाम से लगा है… रुका ही नहीं…”

कक्का की नजर उस पर टिक जाती है… आवाज भारी हो जाती है

“जानते हो कौन है वो…? हेमराज… गोविंदा गांव का… तीन घंटे तक मलबा हटाता रहा… उसे नहीं पता था… जिस मलबे को वो हटा रहा है… उसी के नीचे उसका अपना परिवार दबा है…”

भीड़ एकदम शांत हो जाती है…

कक्का आगे कहते हैं

“फिर मलबे से निकली लाश… उसके बाप की थी… और मामा… अब भी कहीं अंदर दबा है…”

घसीटा की आवाज कांप जाती है

“फिर… वो रुक गया होगा?”

कक्का सिर हिलाते हैं

“नहीं बेटा… वो फिर उसी मलबे में उतर गया… दूसरों को बचाने… और अपने को खोजने…”

चौरंगी लाल धीमे स्वर में बोलता है

“यही फर्क है… कुछ लोग कैमरे में दिख रहे हैं… और कुछ लोग दर्द में भी इंसानियत निभा रहे हैं…”

इसी बीच पास खड़े कुछ लोग आपस में फुसफुसाते हैं—

“पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है…”

घसीटा तुरंत कक्का की ओर देखता है

“कक्का! कुछ तो कार्रवाई हुई क्या?”

कक्का गंभीर स्वर में कहते हैं

“हाँ बेटा… पुलिस अधीक्षक श्री मोतिउर्रहमान ने मीडिया को बताया है कि अग्रवाल लॉज के मालिक और जमीन स्वामी के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हुआ है… बीएनएस की धारा 106 के तहत… अब मामला कोतमा थाने में विवेचना में है…”

चौरंगी लाल फिर कटाक्ष करता है

“देखते हैं… ये केस भी सच्चाई तक पहुंचता है… या कागजों में ही दम तोड़ देता है…”

कक्का आगे जोड़ते हैं

“सरकार ने भी मृतकों के परिजनों को 9 लाख और घायलों को 2.50 लाख की सहायता देने की घोषणा की है…”

घसीटा की आंखें फिर मलबे की ओर चली जाती हैं

“कक्का… पैसा तो मिल जाएगा… पर जो चला गया… वो कैसे लौटेगा?”

कक्का की आवाज भर्रा जाती है

“बेटा… मुआवजा दर्द कम कर सकता है… खत्म नहीं…”

तभी जेसीबी दोबारा चलती है… भीड़ फिर चुप हो जाती है… हर आंख उसी जगह टिक जाती है…

अचानक आवाज गूंजती है

“धीरे… यहां कुछ हो सकता है…”

पूरा माहौल थम जाता है… सांसें रुक जाती हैं…

कक्का धीरे से कहते हैं

“डर ये नहीं है कि कौन दबा है… डर ये है… कहीं सच भी मलबे में ही दब न जाए…”

और फिर चौपाल में सन्नाटा छा जाता है…

कुछ पल बाद कक्का भीड़ की ओर देखते हुए आखिरी सवाल छोड़ते हैं

“बताओ भइया… क्या इस मलबे से सिर्फ लोग निकलेंगे… या उन गलतियों का सच भी बाहर आएगा… जिनकी वजह से ये सब हुआ?”

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