धुंधले बिलों से छुपाव, बढ़े हुए बिलों से निकासी और गौशाला घोटाला: अनूपपुर में CEO रवि ग्वाल के कार्यकाल पर भ्रष्टाचार के आरोप”

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धुंधले बिलों से छुपाव, बढ़े हुए बिलों से निकासी और गौशाला घोटाला: अनूपपुर में CEO रवि ग्वाल के कार्यकाल पर भ्रष्टाचार के आरोप”

जमुनाकोतमा अनूपपुर मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले की जनपद पंचायत इन दिनों भ्रष्टाचार और सरकारी राशि की बंदरबांट का मुख्य केंद्र बन गई है। आरोप है कि यहाँ विकास कार्यों के नाम पर जनता के टैक्स के पैसों की सरेआम लूट मची है और इस पूरे खेल को जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) रवि ग्वाल का मूक संरक्षण प्राप्त है। अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों की सांठगांठ से एक ऐसा ‘सिस्टम’ तैयार कर लिया गया है, जहां नियम-कानूनों की कोई अहमियत नहीं रह गई है

कैसे अंजाम दिया जाता है इस भ्रष्टाचार को? (लूट का पूरा सिस्टम)

जनपद पंचायत अनूपपुर में भ्रष्टाचार कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रक्रिया बन चुकी है। इसे मुख्य रूप से इन तीन तरीकों से अंजाम दिया जा रहा है:

1. खरीद नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाना:

सरकारी खजाने से पैसा निकालने के लिए सबसे पहले ‘मध्य प्रदेश पंचायत (सामग्री और माल की खरीद) नियम, 1999’ को दरकिनार किया जाता है। नियमानुसार किसी भी सामग्री की खरीद के लिए टेंडर या कोटेशन मंगाना अनिवार्य है ताकि सही दाम पर गुणवत्तापूर्ण सामान मिल सके। लेकिन यहाँ बिना किसी टेंडर के चहेते सप्लायरों से बाजार भाव से कई गुना अधिक (इन्फ्लेटेड) कीमतों पर सामान खरीदा जाता है और बीच का कमीशन अपनी जेबों में भर लिया जाता है।

2. ‘धुंधले बिलों’ का डिजिटल फरेब:

ऊंचे दामों पर की गई इस फर्जी खरीददारी को छुपाने के लिए पोर्टल पर एक शातिर तरीका अपनाया जा रहा है। ग्राम पंचायतों द्वारा जानबूझकर पोर्टल पर ऐसे धुंधले (Blurred) और अस्पष्ट बिल अपलोड किए जाते हैं, जिन्हें पढ़ना नामुमकिन हो। इसका मकसद यह है कि अगर कोई आम नागरिक या आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता इन बिलों की जांच करना चाहे, तो उसे यह पता ही न चल सके कि कौन सा सामान, किस दुकान से और किस कीमत पर खरीदा गया है।

3. बिना काम किए ‘कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ जारी करना:

भ्रष्टाचार का तीसरा और सबसे खौफनाक चरण है—कागजों पर काम पूरा दिखाना। धरातल पर एक ईंट भी नहीं रखी जाती, लेकिन मिलीभगत से इंजीनियरों और अधिकारियों द्वारा उस कार्य का ‘पूर्णता प्रमाण पत्र’ (Completion Certificate) जारी कर दिया जाता है और पूरी राशि निकाल कर आपस में बांट ली जाती है।

गौशाला चारागाह के नाम पर 4.32 लाख का फर्जीवाड़ा: एक जीता-जागता उदाहरण

इस लूट तंत्र का सबसे बड़ा और ताजा उदाहरण ‘गौशाला चारागाह सिद्धबाबा प्यारी क्र 1’ का निर्माण है। सरकार ने यह योजना इसलिए बनाई थी ताकि गौशालाओं के आसपास गायों को पर्याप्त चारा मिल सके।

कार्य का नाम: गौशाला चारागाह सिद्धबाबा प्यारी क्र 1

वर्क कोड: 1746002039/LD/22012034526485

निकाली गई राशि: 4,32,180 रुपये

इस कार्य में धरातल पर कोई चारागाह नहीं बना है। लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी तरीके से 4 लाख 32 हजार 180 रुपये निकाल लिए गए। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस উন্নয়ন कार्य को पूर्ण बताकर इसका ‘कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ भी जारी कर दिया गया है।

सीएम हेल्पलाइन भी बेअसर, सीईओ कर रहे मामले की लीपापोती?

इस खुले भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूक नागरिकों द्वारा सीएम हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज कराई गई है (शिकायत क्रमांक: 36846721)। लेकिन सिस्टम की जड़ें इतनी गहरी हैं कि एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जनपद पंचायत सीईओ रवि ग्वाल द्वारा केवल जांच का दिखावा किया जा रहा है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि सीईओ ने आज तक उनसे संपर्क कर बयान लेना या सुबूत मांगना तक जरूरी नहीं समझा। इससे साफ प्रतीत होता है कि आला अधिकारी खुद इस भ्रष्टाचार की लीपापोती करने और दोषियों को बचाने में लगे हुए हैं। अब देखना यह है कि क्या जिला कलेक्टर और लोकायुक्त (Lokayukta) इस ‘लूट के सिस्टम’ को तोड़ने के लिए कोई सख्त कदम उठाएंगे या फिर जनता की गाढ़ी कमाई यूं ही भ्रष्टाचारियों की ऐशो-आराम की भेंट चढ़ती रहेगी?

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