16 मौतों के बाद जागा प्रशासन: पूरे जिले में ओवरलोड वाहनों पर चला सघन शिकंजा
इंदौर-अहमदाबाद फोरलेन हादसे के बाद धार प्रशासन अलर्ट, मालवाहक गाड़ियों में सवारियां ढोने वालों पर चालानी कार्रवाई तेज
कोयलांचल समाचार
ब्यूरो रिपोर्ट: शैलेंद्र जोशी, धार
इंदौर-अहमदाबाद फोरलेन पर तिरला थाना क्षेत्र में हुए भीषण सड़क हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। ओवरलोड पिकअप वाहन का टायर फटने से हुए इस दर्दनाक हादसे में 16 लोगों की मौत हो गई, जबकि 35 से अधिक लोग घायल हो गए। एक ही झटके में 16 जिंदगियों के खत्म हो जाने से न केवल मृतकों के परिवारों में मातम पसरा है, बल्कि पूरा प्रशासनिक अमला भी सकते में आ गया है। इस हृदयविदारक घटना के बाद जिला प्रशासन नींद से जागा और पूरे जिले में ओवरलोडिंग के खिलाफ सघन चेकिंग अभियान शुरू कर दिया गया।
हादसे के बाद धार जिले में आरटीओ, यातायात पुलिस और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीमों ने जिलेभर में मालवाहक वाहनों की जांच शुरू की। विशेष रूप से उन पिकअप, लोडिंग वाहनों और छोटे मालवाहक साधनों को निशाने पर लिया गया, जिनमें खुलेआम सवारियां भरकर शादी समारोह, मजदूरी और अन्य कार्यों के लिए लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता है।
जांच अभियान के दौरान कई वाहनों को रोककर चालानी कार्रवाई की गई। कुछ वाहन चालकों को सख्त समझाइश देकर छोड़ा गया, जबकि कई पर आर्थिक दंड लगाया गया। देर शाम तक चली इस कार्रवाई में पुलिस ने साफ संकेत दे दिए कि अब मालवाहक वाहनों में सवारियां ढोने की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
प्रशासन का कहना है कि जिले में लंबे समय से मालवाहक वाहनों का उपयोग सवारी ढोने के लिए किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह व्यवस्था एक “सामान्य परिवहन” का रूप ले चुकी है, जहां पिकअप और लोडिंग वाहन ही गरीब मजदूरों, महिलाओं और बच्चों के लिए यातायात का साधन बन गए हैं। शादी-ब्याह से लेकर खेत और मजदूरी तक, इन्हीं वाहनों में लोगों को ठूंस-ठूंसकर भर दिया जाता है। चालक और वाहन मालिक चंद रुपयों के लालच में लोगों की जान जोखिम में डालते हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन वाहनों में केवल वयस्क ही नहीं, बल्कि महिलाएं, बच्चे और नाबालिग बाल श्रमिक तक सफर करते पाए जाते हैं। प्रशासनिक जांच के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए, जहां मजदूरी पर जा रहे बाल श्रमिक भी मालवाहक वाहनों में ठूंसकर ले जाए जा रहे थे। यह केवल यातायात नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि बाल श्रम और मानव सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सामाजिक अपराध भी है।
हालांकि सवाल केवल वाहन चालकों या मालिकों पर ही नहीं उठता। प्रशासनिक अमले ने भी दबी जुबान में स्वीकार किया है कि जब-जब ऐसे वाहनों पर कार्रवाई की जाती है, तब-तब राजनीतिक दबाव सामने आ जाता है। कार्रवाई के दौरान कई चालक किसी न किसी जनप्रतिनिधि या राजनीतिक व्यक्ति से फोन लगवाकर बचने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि सख्ती की मंशा कई बार दबाव की भेंट चढ़ जाती है और कुछ दिनों की कार्रवाई के बाद फिर वही ढर्रा शुरू हो जाता है।
कानूनी स्थिति भी कम विडंबनापूर्ण नहीं है। मालवाहक वाहनों में सवारियां भरकर ले जाने के दौरान यदि दुर्घटना हो जाती है, तो अधिकतर मामलों में चालक पर गैर इरादतन हत्या का प्रकरण दर्ज होता है। यह अपराध गंभीर होते हुए भी साधारण धाराओं में दर्ज होता है, जिसके चलते आरोपी को एक-दो दिन में जमानत मिल जाती है। यही वजह है कि वाहन चालकों और मालिकों में कानून का भय लगभग समाप्त हो चुका है।
तिरला हादसे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?
वह चालक, जो लालच में वाहन को मौत का डिब्बा बना देता है?
वह वाहन मालिक, जो मुनाफे के लिए इंसानी जान को तौलता है?
वह प्रशासन, जो हादसे के बाद जागता है?
या फिर वे राजनीतिक संरक्षक, जिनके फोन नियमों से ऊपर हो जाते हैं?
फिलहाल हादसे के बाद प्रशासन सख्ती की मुद्रा में दिखाई दे रहा है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि यह सख्ती कितने दिन कायम रहेगी। क्या 16 मौतों की कीमत पर शुरू हुआ यह अभियान जिले की सड़कों को सुरक्षित बना पाएगा, या फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाएगा? धार जिले की जनता अब केवल कार्रवाई नहीं, स्थायी व्यवस्था चाहती है















































