संलग्नीकरण पर प्रतिबंध के बावजूद जनजाति कार्य विभाग में ‘अटैचमेंट’ का खेल नियमों को ताक पर रख कर किया गया था कार्य
अनूपपुर /
मध्य प्रदेश शासन द्वारा शासकीय विभागों में संलग्नीकरण (अटैचमेंट) को पूरी तरह से प्रतिबंधित किए जाने के दावों के बीच, जनजाति कार्य विभाग अनूपपुर से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जमुना में पदस्थ रहे सहायक ग्रेड-III (असिस्टेंट ग्रेड-III) रवि पाल सिंह को लेकर यह विवाद गरमाया हुआ है ताजा घटनाक्रम में जनजाति कार्य विभाग मंत्रालय भोपाल के स्थानांतरण नीति 2026 के तहत जारी आदेश क्रमांक E1346555/1/0185/2026 के अनुसार उन्हें कमिश्नर, ट्राइबल डिपार्टमेंट, मध्य प्रदेश के अधीन स्थानांतरित किया गया है लेकिन इस स्थानांतरण ने उनके पुराने सेवाकाल के एक बड़े नीतिगत उल्लंघन को दोबारा हवा दे दी है
प्रतिबंध के बावजूद कैसे हुआ संलग्नीकरण?
शिकायतकर्ताओं और प्रशासनिक जानकारों के अनुसार, जब रवि पाल सिंह शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जमुना कॉलोनी में मूल रूप से पदस्थ थे, तब उन्हें नियमों को दरकिनार करते हुए कई महीनों तक कार्यालय कलेक्टर, जनजाति कार्य विभाग अनूपपुर में संलग्नीकरण (अटैचमेंट) पर रखा है
चौंकाने वाली बात यह है कि सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) और मध्य प्रदेश शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी शासकीय कर्मचारी का संलग्नीकरण नहीं किया जाएगा और ऐसा करना वित्तीय अनियमितता व प्रशासनिक अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है इसके बावजूद उन्हें महीनों तक कलेक्ट्रेट कार्यालय जनजाति कार्य विभाग अनूपपुर में अटैच रखा गया है
किस ‘नियम’ या प्रशासनिक लूपहोल का लिया गया सहारा
आमतौर पर विभागों में पूरी तरह प्रतिबंध होने के बाद भी कुछ “अघोषित” या “आपातकालीन” लूपहोल्स (चोर दरवाजों) का सहारा लेकर ऐसे संलग्नीकरण किए जाते हैं, जो जांच के दायरे में आते हैं
वरिष्ठ अधिकारियों का संरक्षण
विभागीय सूत्रों का कहना है कि नियमों को शिथिल करने के लिए ऊपर से मिलने वाले राजनैतिक या प्रशासनिक दबाव के चलते भी ऐसे आदेश जारी कर दिए जाते हैं, जिन्हें चुनौती नहीं मिल पाती
स्थानांतरण नीति 2026 और नए आदेश से खड़े हुए सवाल
वर्ष 2026 की नई स्थानांतरण नीति के तहत अब रवि पाल सिंह का तबादला सीधे कमिश्नर ट्राइबल डिपार्टमेंट मध्य प्रदेश के अधीन कर दिया गया हैऐसे में जागरूक नागरिकों और कर्मचारी संगठनों द्वारा यह सवाल उठाया जा रहा है कि
जो कर्मचारी कई महीनों तक नियम विरुद्ध तरीके से कलेक्ट्रेट में संलग्नीकरण का लाभ लेता रहा, उस पर कार्रवाई करने के बजाय उसे सीधे कमिश्नर कार्यालय जैसी महत्वपूर्ण जगह पर कैसे भेज दिया गया
क्या उनके पुराने संलग्नीकरण की उच्च स्तरीय जांच की जाएगी कि आखिर किस सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर से मध्य प्रदेश शासन के ‘शून्य संलग्नीकरण’ के वादे को ठेंगा दिखाया गया था
मध्य प्रदेश शासन की मंशा जहां एक ओर पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने की है, वहीं जनजाति कार्य विभाग अनूपपुर के ऐसे मामले जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रहे हैं अब देखना यह होगा कि इस मामले के उजागर होने के बाद मंत्रालय और कमिश्नर ट्राइबल डिपार्टमेंट इस संलग्नीकरण के पीछे के असली ‘नियम’ और अधिकारियों की भूमिका पर क्या रुख अपनाते हैं।




































