रेत परिवहन की टीपी में दो अलग-अलग वाहन नंबर, जैतहरी में उठे सवाल

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रेत परिवहन की टीपी में दो अलग-अलग वाहन नंबर, जैतहरी में उठे सवाल

छत्तीसगढ़ की टीपी पर MP65ZD2127, मध्यप्रदेश के ई-खानिज पास में MP65ZD8127 दर्ज; दस्तावेजों के सत्यापन और कथित परमिट दुरुपयोग की जांच की मांग

जैतहरी/अनूपपुर। अनूपपुर जिले के जैतहरी क्षेत्र में रेत परिवहन से जुड़ा एक मामला खनिज परिवहन व्यवस्था, दस्तावेजों के सत्यापन और संबंधित विभागों की निगरानी को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में वाहन क्रमांक को लेकर अंतर दिखाई देने के बाद यह जानना जरूरी हो गया है कि परिवहन के दौरान प्रस्तुत परमिट की वास्तविक स्थिति क्या थी और क्या सभी दस्तावेज एक ही वाहन से संबंधित हैं।

मामले में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, एक हस्तलिखित उल्लेख में छत्तीसगढ़ से संबंधित ट्रांजिट पास (टीपी) पर वाहन क्रमांक MP65ZD2127 लिखा होने की बात कही गई है। दूसरी ओर, मध्यप्रदेश के खनिज विभाग के ई-खानिज पोर्टल से प्राप्त इंटर-स्टेट ट्रांजिट पास (ISTP) में वाहन क्रमांक MP65ZD8127 दर्ज दिखाई देता है। दोनों वाहन क्रमांकों में एक अंक का अंतर है। ऐसे में दस्तावेजों के बीच संबंध और उनकी वैधता की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना आवश्यक है।

हालांकि, केवल उपलब्ध तस्वीरों में दिखाई देने वाले अंतर के आधार पर किसी परमिट को फर्जी या किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। यह भी संभव है कि दस्तावेजों के संदर्भ, जारी होने की प्रक्रिया अथवा रिकॉर्ड में दर्ज विवरण को लेकर कोई ऐसी जानकारी हो, जो फिलहाल सामने नहीं आई है। इसलिए पूरे मामले में संबंधित विभागों की निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण है।

ई-खानिज पोर्टल के पास में क्या दर्ज है?

उपलब्ध ई-टीपी के स्क्रीनशॉट के अनुसार, इंटर-स्टेट ट्रांजिट पास का नंबर 126561736 है। इसमें परिवहन की तारीख 14 अक्टूबर 2026 और समय दोपहर 12 बजकर 18 मिनट दर्ज दिखाई देता है। दस्तावेज में खनिज का नाम रेत, मात्रा 3.00 घनमीटर, लोडिंग स्थल मलादांड, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ तथा गंतव्य सीताराम गुंजी बिहार, अनूपपुर, मध्यप्रदेश अंकित है।

ई-टीपी में वैधता की अंतिम समय-सीमा भी 14 अक्टूबर 2026 को शाम 3 बजकर 18 मिनट तक दिखाई गई है। इस विवरण के आधार पर यह पता लगाना जरूरी है कि संबंधित वाहन के परिवहन के समय प्रस्तुत दस्तावेज इसी ई-टीपी से जुड़े थे या नहीं। साथ ही, पोर्टल पर दर्ज वाहन क्रमांक, खनिज की मात्रा, लोडिंग स्थल और गंतव्य का वास्तविक परिवहन से मिलान किया जाना चाहिए।

यदि ई-टीपी के आधिकारिक रिकॉर्ड और मौके पर प्रस्तुत दस्तावेजों में अंतर मिलता है, तो संबंधित विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि अंतर का कारण क्या है। जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि दस्तावेज जारी करते समय दर्ज की गई जानकारी और परिवहन के दौरान उपयोग किए गए दस्तावेजों में कोई बदलाव तो नहीं हुआ।

दूसरे दस्तावेज पर मई की मुहर, संबंध की पुष्टि जरूरी

मामले में उपलब्ध एक अन्य दस्तावेज पर 11 मई 2026 की मुहर दिखाई देने की बात सामने आई है। उस पर हस्तलिखित रूप में आईएसटीपी संख्या जैसा उल्लेख भी नजर आता है। हालांकि, इस दस्तावेज का ई-टीपी नंबर 126561736 और 14 अक्टूबर को दर्ज परिवहन से क्या संबंध है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

यह पता लगाना जरूरी है कि मई की तारीख वाला दस्तावेज किस उद्देश्य से जारी किया गया था, उसमें दर्ज वाहन क्रमांक क्या है और क्या उसका संबंध अक्टूबर में हुए परिवहन से है। इसके लिए दस्तावेज की मूल प्रति, जारी करने वाले विभाग का रिकॉर्ड और संबंधित ई-खानिज प्रविष्टियों का मिलान आवश्यक होगा।

बिना मूल दस्तावेजों और विभागीय रिकॉर्ड की जांच किए दोनों दस्तावेजों को एक ही परिवहन से जोड़ना जल्दबाजी होगी। फिर भी, जब दस्तावेजों में तारीख, संख्या अथवा वाहन विवरण को लेकर सवाल सामने आते हैं, तो उनका समाधान आधिकारिक सत्यापन से होना चाहिए।

क्या एक वाहन की टीपी दूसरे वाहन के लिए इस्तेमाल हुई?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या किसी एक वाहन के लिए जारी ट्रांजिट पास का इस्तेमाल दूसरे वाहन के परिवहन में किया गया। यदि ऐसा हुआ है, तो यह खनिज परिवहन नियमों के अनुपालन और परमिट के संभावित दुरुपयोग से जुड़ा गंभीर विषय हो सकता है।

लेकिन इस आशंका की पुष्टि के लिए केवल दो अलग-अलग वाहन क्रमांक पर्याप्त नहीं हैं। संबंधित विभाग को छत्तीसगढ़ में जारी मूल टीपी का रिकॉर्ड प्राप्त कर उसका मध्यप्रदेश के ई-खानिज पोर्टल पर उपलब्ध ई-टीपी से मिलान करना होगा। इसके साथ ही दोनों वाहन क्रमांकों के पंजीयन विवरण, परिवहन की तारीख और समय तथा मौके पर प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच भी जरूरी है।

जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित वाहन वास्तव में किस स्थान से रेत लेकर चला था, परिवहन के समय कौन-सा पास प्रस्तुत किया गया और उसमें दर्ज विवरण मौके पर मौजूद वाहन से मेल खाते थे या नहीं। यदि दस्तावेजों में किसी प्रकार की त्रुटि पाई जाती है, तो उसके कारण और जिम्मेदारी का निर्धारण भी प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए।

जैतहरी पुलिस की कार्रवाई, लेकिन विस्तृत जानकारी का इंतजार

बताई गई जानकारी के अनुसार, 14 अक्टूबर 2026 को जैतहरी पुलिस ने रेत परिवहन से जुड़े मामले में कार्रवाई की। हालांकि, समाचार तैयार किए जाने तक कार्रवाई का विस्तृत आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं हो सका था। ऐसे में यह स्पष्ट होना बाकी है कि पुलिस ने किस वाहन के विरुद्ध कार्रवाई की, वाहन को जब्त किया गया या नहीं और मौके पर कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे।

यह भी जानकारी सामने आना जरूरी है कि क्या पुलिस ने ई-टीपी नंबर 126561736 का विभागीय सत्यापन कराया है। यदि दस्तावेजों में वाहन क्रमांक का अंतर मिला है, तो क्या संबंधित खनिज अधिकारी को इसकी सूचना दी गई और क्या आगे की जांच के लिए कोई पत्राचार किया गया?

रेत परिवहन से जुड़े मामलों में पुलिस की कार्रवाई के साथ खनिज विभाग का तकनीकी सत्यापन भी महत्वपूर्ण होता है। पुलिस मौके पर वाहन और दस्तावेजों की जांच कर सकती है, जबकि परमिट जारी होने, पोर्टल पर दर्ज विवरण और खनिज परिवहन की वैधता से जुड़े पहलुओं पर संबंधित विभाग का रिकॉर्ड अहम भूमिका निभाता है।

इसलिए मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए पुलिस और खनिज विभाग के बीच समन्वय तथा जांच के निष्कर्षों की आधिकारिक जानकारी सामने आना आवश्यक है।

पुलिस और खनिज विभाग से उठ रहे प्रमुख सवाल

मामले में उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर संबंधित अधिकारियों से निम्न बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट किए जाने की अपेक्षा है—

  1. क्या वाहन क्रमांक MP65ZD8127 के साथ प्रस्तुत ई-टीपी नंबर 126561736 का आधिकारिक सत्यापन कराया गया है?
  2. क्या छत्तीसगढ़ से संबंधित मूल टीपी पर दर्ज वाहन क्रमांक MP65ZD2127 की पुष्टि वहां के संबंधित विभाग से की गई है?
  3. 3.00 घनमीटर रेत के लोडिंग स्थल, परिवहन मार्ग और गंतव्य की जांच की गई है या नहीं?
  4. 11 मई 2026 की मुहर वाले दस्तावेज का 14 अक्टूबर 2026 के परिवहन से क्या संबंध है?
  5. क्या मौके पर प्रस्तुत दस्तावेजों और ई-खानिज पोर्टल के रिकॉर्ड का मिलान किया गया है?
  6. क्या संबंधित वाहन के पंजीयन विवरण और परिवहन के समय की जानकारी का सत्यापन कराया गया?
  7. क्या इस मामले में वाहन मालिक, चालक तथा परमिट जारी करने की प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों की जांच की जा रही है?
  8. क्या पुलिस और खनिज विभाग संयुक्त रूप से जांच कर उसके निष्कर्ष सार्वजनिक करेंगे?

इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला सामान्य दस्तावेजी त्रुटि का है या परमिट के संभावित दुरुपयोग से संबंधित है।

थाना प्रभारी से संपर्क का प्रयास, बात नहीं हो सकी

मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए जैतहरी थाना प्रभारी को फोन लगाया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। इस कारण कार्रवाई से संबंधित विस्तृत आधिकारिक जानकारी प्राप्त नहीं हो पाई। पुलिस का पक्ष और जांच की स्थिति सामने आने पर समाचार को उसके अनुसार अद्यतन किया जा सकता है।

मामले में संबंधित खनिज विभाग का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ई-टीपी की वैधता, वाहन क्रमांक की प्रविष्टि और इंटर-स्टेट ट्रांजिट पास की पुष्टि विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर ही की जा सकती है।

दस्तावेजों की जांच हो, तथ्यों के आधार पर तय हो जिम्मेदारी

रेत के वैध परिवहन को सुनिश्चित करना प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। यदि किसी वाहन के साथ गलत दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हों या किसी परमिट का निर्धारित शर्तों के विपरीत उपयोग हुआ हो, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि अंतर किसी तकनीकी, लेखन संबंधी या अन्य वैध कारण से हुआ है, तो उसे भी जांच के माध्यम से स्पष्ट किया जाना चाहिए।

दैनिक सत्य व्यूह की मांग है कि ई-टीपी नंबर 126561736, दोनों वाहन क्रमांकों और 14 अक्टूबर को जैतहरी पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई की निष्पक्ष जांच कराई जाए। छत्तीसगढ़ के संबंधित विभाग से मूल टीपी का सत्यापन कराया जाए तथा मध्यप्रदेश के ई-खानिज पोर्टल के रिकॉर्ड से उसका मिलान किया जाए। जांच में किसी भी प्रकार की अनियमितता सामने आने पर जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए और जांच के निष्कर्ष जनता के सामने रखे जाएं।

फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर परमिट के दुरुपयोग की आशंका को न तो पूरी तरह खारिज किया जा सकता है और न ही उसे प्रमाणित तथ्य माना जा सकता है। पूरे मामले का निष्कर्ष आधिकारिक रिकॉर्ड, मूल दस्तावेजों और संबंधित पक्षों के जवाबों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

अब सवाल यह है कि वाहन क्रमांक में दिखाई दे रहे अंतर का वास्तविक कारण क्या है? इसका जवाब आरोपों या अटकलों से नहीं, बल्कि पुलिस और खनिज विभाग की प्रमाण-आधारित जांच से मिलना चाहिए।

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