खबर का असर: बरतराई खदान में पेड़ व परिसंपत्ति मुआवजा सर्वे पर लगी रोक, अब संयुक्त टीम करेगी पारदर्शी पुनः सर्वे
बरतराई खदान क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण और मुआवजा प्रक्रिया को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच प्रकाशित समाचार का असर अब प्रशासनिक स्तर पर साफ दिखाई देने लगा है। बरतराई खदान से प्रभावित ग्रामीणों द्वारा लंबे समय से पेड़, मकान, कुएं, बाड़ी, फसल और अन्य परिसंपत्तियों के सर्वे एवं मुआवजा आकलन में बरती जा रही सुस्ती, अपारदर्शिता और विसंगतियों को लेकर आवाज उठाई जा रही थी। अब इस मामले में प्रशासन ने संज्ञान लेते हुए लंबित मुआवजा आकलन प्रक्रिया पर रोक लगाकर संयुक्त सर्वे की दिशा में पहल शुरू कर दी है

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, समाचार प्रकाशन के बाद कलेक्टर अनूपपुर ने बरतराई खदान क्षेत्र में चल रही मुआवजा सर्वे प्रक्रिया को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभागों से रिपोर्ट तलब की है। प्रारंभिक स्तर पर यह स्पष्ट हुआ कि पेड़ एवं अन्य परिसंपत्तियों के मूल्यांकन से जुड़ी प्रक्रिया में कई स्तरों पर समन्वय की कमी, सर्वे की अपूर्णता और विभागीय असंगति जैसी समस्याएं सामने आ रही थीं। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन ने अब सर्वे प्रक्रिया को पुनर्गठित करने का निर्णय लिया है।
जानकारी के अनुसार, अब राजस्व, वन, खनिज, कृषि तथा संबंधित विभागों की संयुक्त टीम द्वारा प्रभावित क्षेत्र का पुनः सर्वे किया जाना प्रस्तावित है। इस संयुक्त सर्वे का उद्देश्य भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों और ग्रामीणों की परिसंपत्तियों का निष्पक्ष, तथ्यात्मक और पारदर्शी मूल्यांकन सुनिश्चित करना है, ताकि भविष्य में मुआवजा वितरण के दौरान किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि इस बार सर्वे प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और अभिलेखीय आधार पर पूरा करने की तैयारी की जा रही है।
गौरतलब है कि बरतराई खदान क्षेत्र में अधिग्रहण की जद में आने वाले ग्रामीण लंबे समय से यह आरोप लगा रहे थे कि उनके पेड़, फलदार पौधे, सिंचाई साधन, बाउंड्री, मकान और अन्य स्थायी परिसंपत्तियों का या तो सही सर्वे नहीं किया गया, या फिर उनका आकलन वास्तविक स्थिति के अनुरूप नहीं किया गया। कई प्रभावितों ने यह भी आरोप लगाया था कि सर्वे टीमों द्वारा मौके पर समुचित निरीक्षण के बिना औपचारिकता निभाई जा रही थी, जिससे भविष्य में उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता था।
प्रकाशित समाचार के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हुई और अब इस पूरे प्रकरण को पुनः परीक्षण के दायरे में लिया गया है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर अब भी यह चर्चा बनी हुई है कि सर्वे कार्य के दौरान राज्य शासन के अधिकृत अधिकारियों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। इस कारण सर्वे की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर ग्रामीणों में अब भी आशंका बनी हुई है। प्रभावितों का कहना है कि जब तक शासन स्तर के सक्षम अधिकारी मौके पर उपस्थित रहकर प्रक्रिया की निगरानी नहीं करेंगे, तब तक सर्वे की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहेंगे।
ग्रामीणों और प्रभावित परिवारों का यह भी कहना है कि मुआवजा सर्वे केवल कागजी प्रक्रिया बनकर न रह जाए, बल्कि प्रत्येक प्रभावित परिवार की वास्तविक परिसंपत्तियों का स्थल परीक्षण कर निष्पक्ष आकलन किया जाए। विशेषकर पेड़ों, सिंचाई संसाधनों, खेत संरचना, आवासीय निर्माण और आजीविका से जुड़े संसाधनों का मूल्यांकन वास्तविक स्थिति के आधार पर होना चाहिए, ताकि विस्थापन की स्थिति में प्रभावितों को न्यायोचित मुआवजा मिल सके।
फिलहाल, समाचार के बाद प्रशासन द्वारा सर्वे प्रक्रिया को पुनः प्रारंभ करने की पहल को प्रभावितों के लिए एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यदि संयुक्त विभागीय टीम निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ सर्वे पूरा करती है, तो यह न केवल प्रभावित ग्रामीणों के हित में होगा, बल्कि भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास प्रक्रिया में प्रशासनिक विश्वसनीयता भी स्थापित करेगा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रस्तावित संयुक्त सर्वे जमीनी स्तर पर कितनी गंभीरता, पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ पूरा किया जाता है।














































