अमरकंटक के उत्तर धरहरकला स्थित स्वयंभू सिद्ध बटुक गणेश के प्रति बढ़ रही श्रद्धा

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अमरकंटक के उत्तर धरहरकला स्थित स्वयंभू सिद्ध बटुक गणेश के प्रति बढ़ रही श्रद्धा

कल्चुरीकालीन प्रतिमा की अनूठी विशेषताएं बनी आकर्षण का केंद्र , दूर-दूर से पहुंच रहे श्रद्धालु

संवाददाता / श्रवण कुमार उपाध्याय

अमरकंटक – मां नर्मदा की उद्गम स्थली / पवित्र नगरी अमरकंटक से लगभग 33 किलोमीटर उत्तर तथा राजेंद्रग्राम से करीब 7 किलोमीटर दक्षिण स्थित धरहरकला गांव का प्राचीन एवं स्वयंभू श्री सिद्ध बटुक गणेश मंदिर आज श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है । धार्मिक मान्यताओं , ऐतिहासिक महत्व और प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध यह स्थल न केवल भक्तों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है , बल्कि अपनी दुर्लभ प्रतिमा और पुरातात्विक विशेषताओं के कारण शोधकर्ताओं एवं इतिहास प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का विषय बना हुआ है ।
धरहरकला में विराजमान भगवान गणेश की प्रतिमा सामान्यतः देशभर में देखने को मिलने वाली चतुर्भुज गणेश प्रतिमाओं से भिन्न है ।

स्थानीय परंपराओं और जानकारों के अनुसार यह प्रतिमा भगवान गणेश के बाल स्वरूप अर्थात बटुक गणेश के रूप में प्रतिष्ठित है । यही कारण है कि इस मंदिर की पहचान सिद्ध बटुक गणेश धाम के रूप में बनी हुई है । प्रतिमा द्विभुज स्वरूप में है तथा एक हाथ में पात्र अथवा भिक्षापात्र धारण किए हुए दिखाई देती है । प्रतिमा की सूंड , जनेऊ , वाहन तथा विशिष्ट मुद्रा इसे अत्यंत दिव्य और दुर्लभ स्वरूप प्रदान करती है ।

अनूपपुर निवासी वरिष्ठ भाजपा नेता मनोज कुमार द्विवेदी इतिहास अध्येता एवं राजेंद्रग्राम निवासी वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष सिंह दीक्षित बताते हैं कि अनेक वर्षों से इस मंदिर में नियमित रूप से आते रहे हैं । उनके अनुसार यह प्रतिमा सामान्य गणेश प्रतिमाओं से अलग दिखाई देती है क्योंकि यह बालस्वरूप की है । उन्होंने बताया कि बटुक स्वरूप होने के कारण प्रतिमा के हाथ में दिखाई देने वाला पात्र विशेष महत्व रखता है । भारतीय परंपरा में उपनयन संस्कार के पश्चात शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरुकुल जाने वाले बटुक के हाथ में पात्र अथवा भिक्षापात्र रहता था , जो विद्या , विनय , संयम और ब्रह्मचर्य का प्रतीक माना जाता है । इसी कारण इस प्रतिमा को बटुक गणेश स्वरूप से जोड़ा जाता है । उन्होंने यह भी बताया कि दशकों पूर्व प्रतिमा पर जनेऊ स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता था , किंतु अब वह प्रतिमा पर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है ।

पुरातत्व विभाग के अनुसार यह प्रतिमा कल्चुरीकालीन मानी जाती है । मंदिर परिसर एवं इसके आसपास उस काल के अनेक महत्वपूर्ण अवशेष आज भी विद्यमान हैं । यहां भगवान शिव , विष्णु एवं अन्य देव प्रतिमाओं के अवशेष , प्राचीन स्थापत्य शिल्प तथा गौरी कुंड जैसी संरचनाएं क्षेत्र की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत की साक्षी हैं । धरहरकला का प्राचीन शिव मंदिर और स्वयंभू गणेश मंदिर राज्य पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल माने जाते हैं ।

श्रद्धालुओं के बीच यह मान्यता भी प्रचलित है कि भगवान गणेश की प्रतिमा का आकार समय के साथ बढ़ रहा है । हालांकि इस संबंध में कोई वैज्ञानिक अथवा पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध नहीं है , लेकिन स्थानीय लोगों के बीच यह जनश्रुति वर्षों से सुनने को मिलती रही है । जनमानस में यह विश्वास भी प्रचलित है कि अतीत में प्रतिमा को अन्यत्र स्थापित करने के प्रयास हुए थे , किंतु वे सफल नहीं हो सके और प्रतिमा अपने मूल स्थान पर ही विराजमान रही ।

अमरकंटक और जलेश्वर धाम की यात्रा करने वाले अनेक श्रद्धालु प्रथम पूज्य भगवान गणेश के दर्शन कर अपनी यात्रा का शुभारंभ करना पुण्यदायक मानते हैं । यही कारण है कि वर्षभर यहां भक्तों की निरंतर आवाजाही बनी रहती है । मनोकामना पूर्ति के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर में प्रतिवर्ष धार्मिक मेले का आयोजन भी किया जाता है , जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं ।
मंदिर परिसर के समीप स्थित प्राचीन भग्न शिवालय , जिसे कुछ लोग सूर्य मंदिर के नाम से भी जानते हैं तथा आसपास का प्राकृतिक झरना इस क्षेत्र की रमणीयता को और बढ़ा देते हैं । घने वनों , शांत वातावरण और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण यह स्थल धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है ।

स्थानीय नागरिकों और वरिष्ठ भाजपा नेता मनोज द्विवेदी अनूपपुर का कहना है कि वर्ष 1981 से इस जगह आना लगा हुआ है । धरहरकला स्थित सिद्ध बटुक गणेश धाम केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक , सांस्कृतिक और पुरातात्विक धरोहर भी है । इसलिए इसके मूल स्वरूप , प्राकृतिक परिवेश और प्राचीन अवशेषों का संरक्षण समय की आवश्यकता है । लोगों ने मंदिर क्षेत्र में अनावश्यक पक्के निर्माण और अतिक्रमण पर रोक लगाने की मांग करते हुए इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्भुत आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक विरासत का दर्शन कर सकें ।

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