नारायण सिंह के कब्जे पर खामोश क्यों है एसईसीएल?
गरीबों पर जेसीबी, रसूखदार पर मेहरबानी… जमुना कॉलरी में अवैध कब्जे पर उठे तीखे सवाल
कोयलांचल समाचार
जमुना-कोतमा | अनूपपुर
जमुना कॉलरी क्षेत्र में एसईसीएल की जमीन पर अवैध कब्जों को लेकर एक बार फिर दोहरे मापदंड के आरोप तेज हो गए हैं। सवाल सीधा है—क्या एसईसीएल का कानून सिर्फ गरीबों के लिए है? रसूखदारों और पैसों के दम पर सरकारी जमीन कब्जाने वालों पर विभाग की चुप्पी अब संदेह और आक्रोश दोनों को जन्म दे रही है। केंद्रीय विद्यालय जमुना कॉलरी के समीप एसईसीएल की भूमि पर भारत माता पब्लिक स्कूल के संचालक नारायण सिंह द्वारा कथित रूप से किए जा रहे अवैध कब्जे और निर्माण को लेकर विभाग ने नोटिस तो जारी किया, लेकिन समयसीमा बीत जाने के बाद भी कार्रवाई ठंडी फाइलों में दबी हुई है। यही वजह है कि अब एसईसीएल प्रबंधन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
नोटिस जारी, कार्रवाई गायब… आखिर किसका संरक्षण?
मामला ग्राम पसान, पटवारी हल्का पसान, जिला अनूपपुर स्थित खसरा नंबर 143 की उस जमीन का है, जो एसईसीएल के अधीन सार्वजनिक संपत्ति बताई जा रही है। आरोप है कि भारत माता पब्लिक स्कूल के संचालक नारायण सिंह ने बिना वैध अनुमति के इस भूमि पर पक्का निर्माण करा लिया। शिकायत मिलने पर एसईसीएल के क्षेत्रीय सुरक्षा विभाग ने स्थल निरीक्षण किया, जिसमें अनधिकृत निर्माण की पुष्टि भी हुई। इसके बाद एस्टेट ऑफिसर ने सार्वजनिक स्थान (अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी किया।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अवैध निर्माण की पुष्टि हो चुकी, नोटिस जारी हो चुका, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या एसईसीएल प्रबंधन किसी दबाव में है, या फिर यह मामला रसूख और पहुंच का है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभाग सब कुछ जानते हुए भी जानबूझकर चुप्पी साधे बैठा है।
गरीब का घर टूटा, रसूखदार का महल बचा
जमुना और भालूमाड़ा क्षेत्र के लोगों को वह तस्वीर आज भी याद है, जब एसईसीएल ने अवैध कब्जे के नाम पर गरीबों की झुग्गियों और छोटे मकानों पर बिना देर किए जेसीबी चलवा दी थी। जीएम बंगला के आसपास और भालूमाड़ा क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने के नाम पर गरीब परिवारों के आशियाने मिनटों में जमींदोज कर दिए गए।
तब न नोटिस का लंबा इंतजार हुआ, न मानवीय पहलू देखा गया, न पुनर्वास की चिंता। लेकिन अब जब मामला एक रसूखदार स्कूल संचालक से जुड़ा है, तो नोटिस के बाद भी कार्रवाई ठंडी पड़ गई। यही दोहरा रवैया अब लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल बन चुका है—क्या गरीब के लिए कानून अलग और पैसे वालों के लिए अलग?
जेके पब्लिक स्कूल से भारत माता पब्लिक स्कूल तक का सफर
स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि जिस संस्थान को आज भारत माता पब्लिक स्कूल के नाम से संचालित किया जा रहा है, वह पहले जेके पब्लिक स्कूल के नाम से जाना जाता था। बताया जाता है कि इस स्कूल के मूल संचालक बालेंद्र नाथ ओझा थे और नारायण सिंह वहीं शिक्षक के रूप में कार्यरत थे।
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि समय के साथ नारायण सिंह ने न केवल संस्थान की बागडोर अपने हाथ में ले ली, बल्कि पूरा स्कूल तंत्र ही अपने नियंत्रण में कर लिया। धीरे-धीरे स्कूल का नाम बदला, संचालन बदला और मालिकाना प्रभाव भी बदल गया। जो व्यक्ति कभी शिक्षक के रूप में कार्य कर रहा था, वह आज स्वयं को संचालक के रूप में स्थापित कर करोड़ों की संपत्ति का स्वामी बताया जा रहा है।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इतनी तेजी से यह आर्थिक और संस्थागत विस्तार कैसे हुआ? और क्या इस पूरे सफर में नियमों, स्वामित्व और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया?
स्कूल संचालन पर भी उठ रहे गंभीर सवाल
जिस परिसर में वर्तमान में भारत माता पब्लिक स्कूल संचालित हो रहा है, वहां नियमों के पालन को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्कूल संचालन में न तो सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है और न ही निर्माण संबंधी आवश्यक प्रशासनिक स्वीकृतियां स्पष्ट हैं।
यदि विद्यालय संचालन और निर्माण दोनों ही नियमों के दायरे में हैं, तो फिर एसईसीएल की भूमि पर यह विस्तार कैसे हुआ? और यदि नियमों के विरुद्ध है, तो विभाग अब तक मौन क्यों है? यह चुप्पी अब केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संरक्षण की आशंका को जन्म दे रही है।
कॉलरी के संसाधनों पर डाका?
स्थानीय सूत्रों का यह भी आरोप है कि अवैध कब्जों के चलते कॉलरी क्षेत्र के पानी और बिजली का खुलेआम दुरुपयोग हो रहा है। व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होने के बावजूद अलग से वैध कनेक्शन नहीं लिए गए। इससे एसईसीएल को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं, कॉलरी क्षेत्र में कई क्वार्टरों के दुरुपयोग की शिकायतें भी लगातार सामने आ रही हैं। कुछ क्वार्टर किसी और के नाम पर आवंटित हैं, लेकिन उपयोग कोई और कर रहा है। अनधिकृत किराएदारी, अनधिकृत ट्रांसफर और एक व्यक्ति के पास एक से अधिक क्वार्टरों की चाबियां होने जैसे आरोप व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं।
एसईसीएल प्रबंधन की चुप्पी अब संदेह के घेरे में
अब सबसे बड़ा सवाल एसईसीएल प्रबंधन पर है। जब विभाग गरीबों पर कार्रवाई करने में तत्पर रहता है, तो फिर नारायण सिंह जैसे प्रभावशाली नाम पर चुप्पी क्यों? क्या विभाग किसी राजनीतिक, आर्थिक या आंतरिक दबाव में है? या फिर यह मामला “नोटिस दो, फाइल दबाओ” की नीति का हिस्सा बन चुका है?
स्थानीय नागरिकों ने एसईसीएल प्रबंधन और जिला प्रशासन से मांग की है कि नारायण सिंह द्वारा किए गए कथित अवैध कब्जे, निर्माण और संसाधनों के दुरुपयोग की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि निर्माण अवैध है, तो तत्काल ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हो। यदि सब कुछ वैध है, तो एसईसीएल सार्वजनिक रूप से दस्तावेज जारी कर स्थिति स्पष्ट करे।
अब देखना यह है कि एसईसीएल प्रबंधन इस मामले में कानून का पालन करता है या फिर एक बार फिर रसूख के आगे सरकारी जमीन और सरकारी नियम घुटने टेक देंगे।
इनका कहना है
“भारत माता पब्लिक स्कूल के संचालक नारायण सिंह द्वारा केंद्रीय विद्यालय के बगल में एसईसीएल की भूमि पर अवैध कब्जा किया जा रहा है। प्रबंधन को इस पर तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि सरकारी भूमि सुरक्षित रह सके और नियमों का पालन सुनिश्चित हो।”
— श्रीकांत शुक्ला, अध्यक्ष, एचएमएस जमुना-कोतमा क्षेत्र
“भारत माता पब्लिक स्कूल के संचालक नारायण सिंह द्वारा केंद्रीय विद्यालय के बगल में किए जा रहे निर्माण को लेकर नोटिस जारी किया गया है। नोटिस तामील कराने के दौरान संबंधित व्यक्ति घर पर मौजूद नहीं था, बताया गया कि वह अपने गृह ग्राम बिहार गया हुआ है। ऐसे में नियमानुसार नोटिस चस्पा कर दिया गया है। उनके लौटने और नोटिस का जवाब प्राप्त होने के बाद नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।”
— मारकंडेय सिंह, सुरक्षा प्रभारी, एसईसीएल जमुना-कोतमा क्षेत्र















































