महाघोटाला: बेजुबान गौमाता का निवाला निगल गए ‘इंसानी लोभी’, कागजों पर लहलहाया चारागाह, हकीकत में सिर्फ धूल और छल!

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सरपंच-सचिव की ‘निजी जागीर’ बनी ग्राम पंचायत: बिना बैठक 5वें वित्त की सरेआम बंदरबांट, फर्जीवाड़े में मस्त जांच अधिकारी और ‘धृतराष्ट्र’ बने बैठे CEO साहेब!

 

जमुना कोतमा प्यारी क्रमांक 1 हमारी संस्कृति में जिस गौमाता को ‘नमो देवैः’ कहकर पूजा जाता है, आज उसी के चारे पर भ्रष्टाचार का काला साया मंडरा रहा है। ग्राम पंचायत प्यारी क्रमांक 1 अब पंचायती राज का हिस्सा नहीं, बल्कि सरपंच और सचिव की ‘निजी जागीर’ बन चुकी है। यहाँ विकास के पैसों के साथ-साथ बेजुबानों के हक पर भी ऐसा निर्मम डाका डाला गया है, जिसे सुनकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की रूह कांप जाए। अंधेरगर्दी इस कदर हावी है कि नियमों की खुलेआम चिता जलाई जा रही है और प्रशासन मूकदर्शक बनकर इस महापाप का तमाशबीन बना हुआ है।

गौमाता का निवाला खा गए ‘इंसानी लोभी:

सिद्धबाबा प्यारी में एक ऐसा अक्षम्य ‘पाप’ हुआ है जहाँ प्रशासन ने फाइलों में तो हरी-भरी घास उगा दी, लेकिन हकीकत में बेजुबान गायें आज भी एक-एक तिनके के लिए तरस रही हैं। सरकार ने 4,32,180 रुपये की भारी-भरकम राशि इसलिए मंजूर की थी ताकि गौशाला के आसपास चारागाह (वर्क कोड: 1746002039/LD/22012034526485) विकसित हो सके। मकसद पवित्र था—गौमाता को भूखा न रहना पड़े।

लेकिन पंचायत के भ्रष्ट नुमाइंदों ने उस पवित्र राशि को अपनी विलासिता का साधन बना लिया। धिक्कार है उस अंधी व्यवस्था पर: जहाँ मौके पर घास का एक गुच्छा तक नहीं उगा, वहाँ अफसरों और पंचायत की मिलीभगत से ‘पूर्णता प्रमाण पत्र’ (Completion Certificate) जारी कर दिया गया। यह सिर्फ एक सर्टिफिकेट नहीं, बल्कि उन बेजुबान आंखों के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात है जो भोजन की आस में टकटकी लगाए रहती हैं।

नियमों की कब्रगाह और ‘आज्ञापक प्रावधान’ का चीरहरण:

गौमाता का हक मारने के साथ-साथ यहाँ सरकारी नियमों को भी सरेआम ताक पर रख दिया गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, निर्माण और सामान्य प्रशासन जैसी स्थायी समितियां सिर्फ कागजों का कचरा बनकर रह गई हैं।

‘मध्यप्रदेश ग्राम पंचायत (स्थायी समिति के सदस्यों की पदावधि और कामकाज के संचालन की प्रक्रिया) नियम, 1994’ के नियम 7 में अत्यंत स्पष्ट ‘आज्ञापक प्रावधान’ (Mandatory Provision) है कि प्रत्येक स्थायी समिति अपनी बैठक माह में कम से कम एक बार अनिवार्य रूप से आयोजित करेगी। इसका मूल उद्देश्य पंचायत के वित्तीय निर्णयों में निर्वाचित पंचों की सामूहिक भागीदारी सुनिश्चित करना था।

लेकिन प्यारी क्रमांक 1 में सरपंच खुद को ही ‘सरकार’ मान बैठे हैं। बिना ग्राम पंचायत के बैठक या सामान्य सभा की बैठक बुलाए ही 5वें वित्त आयोग की सरकारी राशि का अंधाधुंध आहरण किया जा रहा है। सरकार ने किसी भी सरपंच को यह एकाधिकार (Monopoly) नहीं दिया है कि वह अपनी मर्जी से तय करे कि कौन सा काम होगा। जब पंचायत की बिना बैठक के 5वें वित्त का पैसा निकाला जा एकरहा है, तो यह सीधा और निर्लज्ज ‘भ्रष्टाचार’ है, जहाँ कुछ लोग सिर्फ अपनी जेबें भर रहे हैं।

जांच अधिकारी यूजीन टोप्पो की बाजीगरी: बंद कमरों में गढ़ी जा रहीं मनगढ़ंत कहानियां:

सबसे शर्मनाक बात यह है कि इस सरेआम लूट की जानकारी होने के बावजूद, प्रशासन अंधा और तंत्र गूंगा बना हुआ है। जब इस लूट की शिकायत की जाती है, तो जांच अधिकारी यूजीन टोप्पो सीएम हेल्पलाइन (CM Helpline) जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था का खुला मखौल उड़ाते हैं।

टोप्पो न तो शिकायतकर्ता को बुलाते हैं, न समस्या पूछते हैं, और न ही मौके पर जाते हैं। वे अपने वातानुकूलित ऑफिस में बैठकर सरपंच और सचिव के अवैध कारनामों पर पर्दा डालने के लिए मनगढ़ंत कहानियां बनाते हैं और पोर्टल पर फर्जी प्रतिवेदन (Fake Report) अपलोड कर देते हैं। हद तो तब हो गई जब टोप्पो ने भ्रष्टाचार की इस गंभीर शिकायत को जबरन ‘मांग आधारित’ (Demand Based) बताकर जबरदस्ती फाइल बंद करने की कुत्सित साजिश रच डाली।

जनपद CEO साहेब मौन क्यों? अकर्मण्यता या भ्रष्टाचार को खुला संरक्षण?

इस पूरे महाघोटाले और सिंडिकेट में सबसे बड़ा सवाल जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) की कार्यप्रणाली पर उठता है। पंचायत में बिना प्रस्ताव और बैठक के खजाने से पैसा निकल रहा है, बंजर जमीन पर चारागाह का पूर्णता प्रमाण पत्र जारी हो रहा है, जांच अधिकारी खुलेआम फर्जी रिपोर्ट लगाकर शिकायतें बंद कर रहे हैं, और CEO साहेब कुंभकर्णी नींद में सो रहे हैं!

क्या प्रशासन की नाक के नीचे बिना उच्चाधिकारियों की मिलीभगत के इतना बड़ा फर्जीवाड़ा संभव है? अगर CEO को इस अवैध आहरण की जानकारी नहीं है, तो यह उनकी घोर प्रशासनिक नाकामी है। और अगर सब कुछ जानते हुए भी वे चुप हैं, तो स्पष्ट है कि । यह जनता के खून-पसीने की कमाई है, कोई ‘खैरात’ नहीं जिसे भ्रष्टाचारी डकार लें। यदि अधिकारी इस महापाप की जांच नहीं कर सकते, तो उन्हें उन कुर्सियों पर बैठने का कोई हक नहीं है; उन्हें तत्काल त्याग पत्र दे देना चाहिए।

गौमाता की ‘आह’ और जनता की चेतावनी:

शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि गौमाता के शरीर में 33 कोटि देवताओं का वास होता है। जब कोई इंसान उनके चारे को अपना ‘निवाला’ बना लेता है, तो वह सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक बददुआएं बटोरता है। 4.32 लाख रुपये तो निकाल लिए गए, लेकिन पंचायत के ये ‘ लोभी उस पाप का बोझ कैसे उठाएंगे जो एक भूखी गाय की आंखों से निकल रहा है?

यह खबर सिर्फ एक सूचना नहीं, बल्कि प्रशासन के गाल पर तमाचा और एक खुली चेतावनी है। कागजों में खानापूर्ति कर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाले CEO को अब जवाब देना ही होगा। जब तक इस पूरे मामले की फोरेंसिक जांच नहीं होती, यह साफ नहीं होता कि पंचायत की बैठकें कब हुईं, उनका एजेंडा क्या था और कौन उपस्थित था; और जब तक दोषियों (सरपंच, सचिव और जांच अधिकारी टोप्पो) पर एफआईआर (FIR) दर्ज कर पैसों की वसूली नहीं होती, यह संघर्ष जारी रहेगा। बेजुबानों का हक मारने वालों को यह समाज और वक्त कभी माफ नहीं करेगा!

 

 

राजू चौधरी प्यारी क्रमांक 1 का पंच ने कहा की

मै भी स्थाई समिति का सदस्य हु लेकिन पूरे 4 साल एक भी बैठक नहीं हुई

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