150 वर्षों से आस्था का केंद्र है पसान का मां दुरपता-बूढ़ी दाई मेढ़ली मंदिर
प्राचीन मंदिर में सातों बहनों के चौरा और मां दुरपता के झूले के दर्शन के लिए पहुंचते हैं श्रद्धालु, मेले-बाजार से दूर है मंदिर की परंपरा
रिपोर्टर राकेश मिश्रा

पसान। आस्था और श्रद्धा की अनूठी पहचान समेटे पसान गांव का मां दुरपता-बूढ़ी दाई मेढ़ली मंदिर क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक स्थलों में शामिल है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, लगभग 150 वर्ष पुराने इस मंदिर की स्थापना पूर्वजों ने की थी। पीढ़ियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना यह मंदिर अपनी धार्मिक परंपराओं और विशिष्ट स्वरूप के लिए जाना जाता है।
मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धाभाव से मां के दरबार में प्रार्थना करने वाले भक्तों पर माता रानी की कृपा बनी रहती है। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी आस्था आज भी लोगों को अपनी परंपराओं और पूर्वजों की विरासत से जोड़ती है।
प्रवेश द्वार पर हनुमान जी के दर्शन से शुरू होती है मंदिर यात्रा
मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही सबसे पहले संकटमोचन हनुमान जी की छोटी प्रतिमा के दर्शन होते हैं। इसके बाद श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती के दर्शन करते हैं। मंदिर परिसर में मां दुरपता और मां बूढ़ी दाई मेढ़ली के दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यहां सातों बहन माताओं का चौरा श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
मां दुरपता का झूला भी मंदिर के प्रमुख आकर्षणों में शामिल है। मंदिर की धार्मिक संरचना, स्थानीय मान्यताएं और पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पद्धति इसे क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं।
मेले-बाजार का आयोजन नहीं, सादगी में बसती है आस्था
इस मंदिर की एक खास विशेषता यह है कि यहां मेला और बाजार नहीं लगता। आमतौर पर धार्मिक स्थलों पर मेलों और बाजारों के माध्यम से रौनक देखने को मिलती है, लेकिन पसान के इस प्राचीन मंदिर में आस्था का स्वरूप सादगी और पारंपरिक श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। यहां मंदिर की पहचान किसी बड़े आयोजन के बजाय माता रानी के प्रति भक्तों के विश्वास और पूर्वजों से मिली धार्मिक विरासत से बनी हुई है।
धार्मिक विरासत को संजोए हुए है मंदिर
मां दुरपता-बूढ़ी दाई मेढ़ली मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि पसान गांव की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का प्रतीक भी है। लगभग डेढ़ शताब्दी पुरानी मानी जाने वाली यह धरोहर स्थानीय लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है। श्रद्धालुओं की मान्यताओं, सातों बहन माताओं के चौरा और मां दुरपता के झूले के कारण मंदिर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।






































































