रिश्वतखोरी में दोषसिद्ध पूर्व चिकित्सक की ग्रेच्युटी पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
कलकत्ता हाईकोर्ट ने ग्रेच्युटी भुगतान के पूर्व आदेश किए निरस्त, ECL के रुख को मिली कानूनी मजबूती
आसनसोल, 26 सितंबर। भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्ध कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले वित्तीय लाभों को लेकर ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) की कानूनी लड़ाई को कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले से मजबूती मिली है। उच्च न्यायालय ने रिश्वतखोरी के मामले में दोषसिद्ध ECL के पूर्व मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. सुनील कुमार सिंह को 10 लाख रुपये की ग्रेच्युटी जारी करने संबंधी नियंत्रक प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी के पूर्व आदेशों को निरस्त कर दिया है।
ECL की ओर से दायर रिट याचिका WPA 8203 of 2019 पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति शम्पा दत्त (पॉल) ने भुगतान उपदान अधिनियम (Payment of Gratuity Act) के प्रावधानों के तहत मामले पर विचार किया। न्यायालय ने माना कि जिस अपराध में कर्मचारी दोषसिद्ध हुआ, वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत रिश्वतखोरी से संबंधित है और चिकित्सकीय फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करने के लिए अवैध पारितोषिक की मांग एवं स्वीकार करना गंभीर नैतिक अधमता की श्रेणी में आता है।
फिटनेस प्रमाणपत्र के बदले रिश्वत मांगने का मामला
मामला फरवरी 2009 का है। ECL के तत्कालीन मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. सुनील कुमार सिंह पर पूर्व-नियोजन चिकित्सा फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करने के लिए रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का आरोप लगा था। मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने कार्रवाई करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया था। इसके बाद आसनसोल स्थित विशेष न्यायाधीश, CBI न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत उन्हें दोषसिद्ध किया गया।
मामले में आपराधिक कार्यवाही के साथ विभागीय एवं अन्य प्रशासनिक कार्यवाहियां भी चलीं। इसी दौरान ग्रेच्युटी के भुगतान को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। संबंधित ग्रेच्युटी प्राधिकारियों द्वारा पूर्व में ECL को 10 लाख रुपये की ग्रेच्युटी जारी करने का निर्देश दिया गया था। ECL ने इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
धारा 4(6)(b)(ii) के तहत ग्रेच्युटी जब्ती का अधिकार
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में भुगतान उपदान अधिनियम की धारा 4(6)(b)(ii) के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वतखोरी के लिए दोषसिद्धि और चिकित्सकीय प्रमाणपत्र जारी करने के लिए अवैध पारितोषिक प्राप्त करना नैतिक अधमता का स्पष्ट मामला है। ऐसे मामले में संबंधित प्राधिकारी को कानून के तहत ग्रेच्युटी जब्त करने के अधिकार का प्रयोग करने का आधार मौजूद है।
न्यायालय के इस निष्कर्ष के बाद पूर्व में ग्रेच्युटी भुगतान के लिए जारी किए गए आदेशों को निरस्त कर दिया गया। इससे ECL द्वारा मामले में अपनाए गए कानूनी रुख को न्यायिक समर्थन मिला है।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध कंपनी की नीति को मिला बल
ECL ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे संस्थागत ईमानदारी, जवाबदेही और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में नैतिक आचरण से जुड़े सिद्धांतों के लिए महत्वपूर्ण बताया। कंपनी के अनुसार, यह निर्णय भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्ध कर्मचारियों से जुड़े सेवानिवृत्ति लाभों के संबंध में कानूनी प्रावधानों के पालन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
कंपनी ने कहा कि भ्रष्टाचार के प्रति उसकी नीति समझौताविहीन है और संस्थागत व्यवस्था में ईमानदारी बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है। ECL के अनुसार, यह मामला लंबे समय से चली आ रही कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसमें कंपनी ने अपने पक्ष और सेवा संबंधी नियमों के आधार पर उच्च न्यायालय का रुख किया था।
ग्रेच्युटी भुगतान पर उठे विवाद का हुआ निपटारा
इस फैसले से उस विवाद का महत्वपूर्ण कानूनी चरण पूरा हुआ है, जिसमें एक ओर दोषसिद्ध पूर्व अधिकारी को सेवानिवृत्ति उपरांत ग्रेच्युटी दिए जाने का प्रश्न था, वहीं दूसरी ओर ECL ने भ्रष्टाचार के मामले में दोषसिद्धि को देखते हुए ग्रेच्युटी रोकने के अपने निर्णय का बचाव किया था।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश में दोषसिद्धि के स्वरूप और भ्रष्टाचार से जुड़े अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए भुगतान उपदान अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों पर विचार किया गया। अदालत के फैसले के बाद ECL की ओर से पूर्व में उठाया गया कानूनी कदम प्रभावी साबित हुआ है।
ECL के लिए यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि इससे भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में सेवा आचरण, अनुशासनात्मक कार्रवाई और सेवानिवृत्ति लाभों के बीच कानूनी संबंध को लेकर कंपनी के रुख को न्यायिक आधार मिला है।







































































