श्री कल्याण सेवा आश्रम में उदासीन अखाड़ा के संतों द्वारा भव्य अरदास एवं विशेष पूजन सम्पन्न

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संवाददाता – श्रवण कुमार उपाध्याय

 

अमरकंटक – मां नर्मदा जी की उद्गम स्थली पवित्र नगरी पावन तपोभूमि अमरकंटक स्थित श्री कल्याण सेवा आश्रम में आध्यात्मिक आस्था और भक्ति का अनुपम संगम देखने को मिला । अमरकंटक नर्मदा परिक्रमा करते हुए उदासीन अखाड़ा से पधारे पूज्य संतों के सान्निध्य में कल्याण सेवा आश्रम के शिवालय में अरदास (विशेष पूजन) का दिव्य आयोजन किया गया । इस अवसर पर संपूर्ण आश्रम परिसर श्रद्धा , भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत हो उठा ।

 

आश्रम के प्रबंध न्यासी पूज्य स्वामी हिमाद्री मुनि जी महाराज ने जानकारी देते हुए बताया कि उदासीन अखाड़ा के महंत के नेतृत्व में भगवान आचार्य श्री चंद्र देव जी महाराज एवं पूज्य गोला साहब जी का पूजन और अरदास किया गया । यहां पधारे 70 संतों का पावन समूह मां नर्मदा जी की परिक्रमा पर निकला हुआ है । इसी क्रम में उत्तर तट स्थित श्री कल्याण सेवा आश्रम में वीतराग तपस्वी बाबा कल्याण दास जी महाराज के पावन आशीर्वाद से संतों द्वारा अरदास एवं विशेष पूजन का आयोजन किया गया ।

इस आध्यात्मिक आयोजन में आश्रम परिवार की ओर से श्रद्धापूर्वक भेंट समर्पित कर विशेष पूजन का पुण्य लाभ प्राप्त किया गया । उदासीन संप्रदाय में अरदास का विशेष महत्व माना जाता है जो साधना , समर्पण और ईश्वर के प्रति अखंड निष्ठा का प्रतीक है ।

कार्यक्रम में आश्रम के प्रमुख संतों स्वामी हर स्वरूप जी महाराज , स्वामी शांतानंद जी महाराज , स्वामी जगदीशानंद जी महाराज , स्वामी धर्रमानंद जी महाराज , स्वामी रामेश्वरा नंदजी महाराज , स्वामी नर्मदानंद जी महाराज , स्वामी सुंदरानंद जी महाराज सहित विनोद कार्की , राजेंद्र बिष्ट , पंडित गन्ना , पंडित मुकेश पाठक , पंडित संदीप जोशी एवं सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित रहे । सभी ने भक्ति भाव से पूजन में सहभागिता निभाते हुए मां नर्मदा के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित की ।

 

उल्लेखनीय है कि उदासीन संप्रदाय का प्रवर्तन प्राचीन काल में सनकादीक मुनियों से माना जाता है किंतु मध्यकाल में यह परंपरा क्षीण होने लगी थी । तत्पश्चात श्री गुरु अविनाशी मुनि जी ने इसे पुनर्जीवित किया तथा भगवान आचार्य श्री श्रीचंद्र देव जी महाराज ने इस परंपरा को अखंडता प्रदान कर इसे व्यापक स्वरूप दिया । श्री गुरु अविनाशी मुनि जी उदासीन संप्रदाय के 164वें आचार्य के रूप में विख्यात रहे हैं ।

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