गौरिहार जनपद के पहरा चौकी में सेटिंग का खेल और भ्रष्टाचार का मेल

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-उदय अवस्थी

 

 

छतरपुर जिले के गौरिहार जनपद से आए दिन भ्रष्टाचार की खबरें आती हैं। यहां पर लगातार अलग-अलग विभागों में पनप रहे भ्रष्टाचार को हम उजागर करते रहे हैं। अब पहरा चौकी से आ रही शिकायतों ने व्यवस्था की जड़ों को हिला दिया है। सुरक्षा व्यवस्था का सबसे निचला स्तंभ पुलिस चौकी भी कथित तौर पर ‘सेटिंग सेंटर’ में बदलती दिख रही है। सवाल सीधा है कि अब नागरिक किस दरवाजे पर जाए?

 

पहरा चौकी पर लगे आरोप गंभीर हैं और चौकी प्रभारी देवेंद्र यादव की शह पर एक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं—फरियादी और आरोपी, दोनों को अलग-अलग बुलाकर समझौते के नाम पर पैसा ऐंठना, मोबाइल छीनकर दबाव बनाना और फिर मोटी रकम लेकर ‘मामला निपटा’ देना।

 

आरोप यह भी कि प्रेम प्रसंग में घर से भागे युवाओं के मामलों को ‘कैश मशीन’ बना दिया गया है—परिजनों को जेल की धमकी देकर रकम तय होती है। नाबालिग का नाम आते ही भय का वातावरण रचा जाता है, ताकि सौदा जल्दी और भारी हो। और तो और दोनों ही तरफ से पैसा वसूला जाता है। यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि कानून की आत्मा के साथ खिलवाड़ है।

 

दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर अवैध गतिविधियों—गिट्टी-बालू के ट्रैक्टरों की कथित सेटिंग, खुलेआम शराब बिक्री—पर भी उंगलियां उठ रही हैं। आरोप है कि सही रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय ‘सेटलमेंट’ को प्राथमिकता दी जाती है। पीड़ित पक्ष 50 हजार तक की मांग के आरोप लगा रहे हैं। इन सबके बीच चौकी प्रभारी देवेंद्र यादव और कुछ आरक्षकों की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न प्रशासनिक चुप्पी का है।

 

चौकी प्रभारी देवेंद्र यादव पर लग रहे आरोपों के बीच एक और गंभीर चर्चा यह है कि वे प्रदेश में मोहन यादव के पद पर होने का अप्रत्यक्ष लाभ उठाने की कोशिश करते नजर आते हैं। स्थानीय स्तर पर यह धारणा बन रही है कि वे अपनी जातीय समानता को प्रभाव और दबाव के औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। यदि ऐसा है, तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता पर सीधा प्रहार है। कानून का राज व्यक्ति या पहचान से नहीं, बल्कि नियम और जवाबदेही से चलता है। दूसरी तरफ इन आरोपों के बीच भी एसपी महोदय ने शायद उनको मनमानी करने की छूट दे रखी है।

 

इतने आरोप, इतनी शिकायतें—फिर भी शीर्ष स्तर पर सख्त और पारदर्शी कार्रवाई का अभाव क्यों दिखता है? क्या यह केवल स्थानीय ढिलाई है, या कहीं न कहीं संरक्षण की परतें भी हैं? और अगर कोई अधिकारी अपनी जातीय पहचान या राजनीतिक नजदीकी का हवाला देकर दबदबा बनाने की कोशिश करता है, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरनाक संकेत है। शासन किसी का निजी अखाड़ा नहीं, जवाबदेही का मंच है।

 

यह भी सच है कि आरोपों की पुष्टि निष्पक्ष जांच से ही होगी। लेकिन जांच की गति और नीयत—दोनों पर जनता की नजर है। यहाँ जरूरत है समयबद्ध, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की जाए। संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए , ताकि वे बिना डर अपनी बात रख सकें।

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