युवाओं ने ठुकराया राजनीतिक हस्तक्षेप, कहा- हम बिरसा मुंडा और विवेकानंद के वंशज
फेफड़ों का अस्पताल नहीं, स्वच्छ हवा चाहिए’: बढ़ते एक्यूआई (AQI) और सोन नदी के अस्तित्व पर सवाल
मोजर बेयर के कड़वे अनुभवों से सबक: बाईपास, अनुकंपा नियुक्ति और लिखित आश्वासन पर अड़े ग्रामीण
रिपोर्ट – मित्तल महरा
अनूपपुर (7 जनवरी 2026) |
बुधवार को ग्राम पंचायत रक्सा के खेल मैदान में आयोजित मेसर्स न्यूजोन इंडिया प्रा. लि. (टोरेंट पावर) की पर्यावरणीय जनसुनवाई केवल औपचारिकता नहीं रही, बल्कि यह क्षेत्र के लोगों के दर्द, आक्रोश और भविष्य की चिंताओं का एक खुला मंच बन गई। 1600 मेगावाट (800×2) के अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए आयोजित इस सुनवाई में क्षेत्र के युवाओं, किसानों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने एक सुर में कहा कि विकास का स्वागत है, लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं।
व्यवस्था पर सवाल और माफीनामा
जनसुनवाई की शुरुआत गहमागहमी के साथ हुई। कार्यक्रम में अन्नदाता किसानों और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारों के लिए उचित बैठक व्यवस्था न होने पर भारी विरोध हुआ। पत्रकारों की नाराजगी के बाद आयोजकों और प्रशासन ने मंच से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी, जिसके बाद ही सुनवाई की कार्यवाही आगे बढ़ सकी। यह घटना इस बात का संकेत थी कि स्थानीय लोग अब सम्मान और अधिकार के लिए समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
युवा शक्ति का उद्घोष: “हमें किसी दल की बैसाखी नहीं चाहिए”
युवा वक्ता रोशन पुरी ने जनसुनवाई की दिशा तय करते हुए स्पष्ट किया कि यह लड़ाई भाजपा, कांग्रेस या किसी अन्य दल की नहीं है। दैखल गांव के गौरवशाली इतिहास और बिरसा मुंडा व मंगल पांडे की विरासत का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “आदिवासी समाज की सादगी को कंपनी हमारी कमजोरी न समझे। अगर हमारा दोहन हुआ, तो यहाँ का एक-एक युवा सौ-सौ के बराबर खड़ा होगा।”
पर्यावरण और स्वास्थ्य: “सांसें छीनकर कैसा विकास?”
समाजसेवी और पत्रकार आदर्श दुबे ने भावात्मक और तार्किक पक्ष रखा। उन्होंने कहा, “अनूपपुर को महज 100 मेगावाट बिजली चाहिए, लेकिन यहाँ हजारों मेगावाट बनाकर हमें प्रदूषण परोसा जा रहा है। हमें लंग्स (फेफड़ों) के अस्पताल नहीं, बल्कि वो तकनीक चाहिए जिससे बिजली की बचत हो।” उन्होंने ‘लाड़ली बहना’ जैसी योजनाओं में पैसा बहाने के बजाय ऊर्जा संरक्षण पर जोर देने की बात कही।
वहीं, चंडिकांत झा ‘जमुना’ ने आंकड़ों के जरिए डरा देने वाली तस्वीर पेश की। उन्होंने बताया कि अनूपपुर का एक्यूआई (AQI) अभी ही 130 है, जो नए प्लांट के बाद 300 के पार जा सकता है। उन्होंने सोन नदी के अस्तित्व पर मंडराते खतरे को भी रेखांकित किया कि क्या नदी में इतना पानी बचा है जो दो नई यूनिटों की प्यास बुझा सके?
मोजर बेयर का दर्द और ठोस मांगें
जनसुनवाई में मोजर बेयर (मौजूदा पावर प्लांट) द्वारा किए गए वादाखिलाफी का मुद्दा छाया रहा।
अनिल गुप्ता ने प्रशासन को चेताया कि अधिकारी बदलते रहते हैं, इसलिए कंपनी जो भी वादा करे, वह लिखित (On Paper) होना चाहिए। उन्होंने स्थानीय युवाओं और भू-स्वामियों को रोजगार में पहली प्राथमिकता देने और केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर सर्वसुविधायुक्त अस्पताल और स्कूल खोलने की मांग की।
रामदीन राठौड़ ने व्यावहारिक मुद्दों पर कंपनी को घेरा। उन्होंने मांग की कि राखड़ (Fly Ash) परिवहन के लिए पहले बाईपास रोड बने या रेलवे लाइन का उपयोग हो, ताकि शहर धूल न फांके। उन्होंने एक बेहद महत्वपूर्ण मांग ‘अनुकंपा नियुक्ति’ (Mercy Appointment) को लेकर की, कि यदि कार्यस्थल पर किसी कामगार की मृत्यु होती है, तो उसके आश्रित को नौकरी की स्पष्ट गारंटी मिलनी चाहिए।
विस्थापन का 14 साल का वनवास
वक्ताओं ने इस बात पर भी रोष जताया कि रक्सा-कोलमी में भूमि अधिग्रहण को 14 साल बीत चुके हैं, जो राम के वनवास से भी ज्यादा है, लेकिन आज तक कई विस्थापितों को बेरोजगारी भत्ता और उचित न्याय नहीं मिला।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय शहडोल द्वारा आयोजित इस सुनवाई में एडीएम और अन्य अधिकारियों ने सभी आपत्तियों को लिपिबद्ध किया। लेकिन जनता ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वे अब मौखिक आश्वासनों से नहीं मानेंगे। “जमीन देंगे पर जमीर नहीं” और “पहले लिखित गारंटी, फिर प्लांट” ही क्षेत्र की जनता का अंतिम निर्णय है।
पर्यावरण जनसुनवाई की अध्यक्षता एडीमएम महोदय श्री दिलीप कुमार पांडे द्वारा की गई। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी डॉ. अशोक तिवारी की उपस्थिति में कम्पनी के कंसल्टेंट ग्रीन सी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के प्रतिनिधि नंदनी भी शामिल थे


















