अनूपपुर जबलपुर इंदौर भोपाल मनेन्द्रगढ़ चिरमिरी बैकुंठपुर रायपुर

सर्द धूप से नहाया गांव रक्सा–कोलमी। सरकारी स्कूल का आंगन, पेड़ों की छांव और रंगीन दीवारों के बीच सजी कक्का की चौपाल—जहां शिक्षा, संवेदना और संवाद एक साथ सांस लेते दिखे

By Santosh Chaurasiya

Published on:

WhatsApp Group Join Now

 

सीएसआर मद से मिले नए बेंच–डेस्क बच्चों की कतारों में सजे थे और उन पर बैठे नीली वर्दी वाले बच्चे उम्मीदों की चमक लिए सामने देख रहे थे।

कार्यक्रम की शुरुआत बच्चों के परिचय से हुई। मासूम आवाज़ों में नाम, कक्षा और सपने—कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई शिक्षक।

न्यू जोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और टोरंट पावर लिमिटेड के अधिकारियों ने बच्चों से सीधा संवाद किया

पानी की उपयोगिता, पढ़ाई-लिखाई की अहमियत, और सांस्कृतिक गतिविधियों पर बच्चों के विचार सुने गए। तालियों और मुस्कानों के बीच यह एहसास गहरा हुआ कि संसाधन मिलें तो प्रतिभा खुद राह बना लेती है।

सुशील पाण्डेय (वाइस प्रेसिडेंट) ने बचपन की स्मृतियां साझा कीं

“हाफ पैंट, लकड़ी की पट्टी, छूही और लकड़ी की कलम… साधन कम थे, सीखने की चाह बहुत।”

उनकी बातों में आज के बच्चों के लिए संदेश था—मेहनत और अनुशासन से सपने सच होते हैं।

गांव के बुजुर्ग चक्रधर मिश्रा बोले

“पांचवीं तक गांव में पढ़े, फिर कोतमा। खेती का काम भी साथ चलता था। जूते नहीं थे, पर खुशी थी।”

उनकी आंखों में संतोष था कि आज के बच्चों के पास पढ़ने के बेहतर अवसर हैं।

धीरज सिंह (उप महाप्रबंधक) और ओम प्रकाश नैनीवाल (CSR हेड) ने भरोसा दिलाया—

“आवश्यक सुविधाएं आगे भी उपलब्ध कराई जाएंगी। सामुदायिक विकास हमारा निरंतर संकल्प है।”

बच्चों की हंसी, सवाल-जवाब की गूंज, शिक्षकों की सजग निगाहें और रंगीन स्कूल भवन—सब मिलकर एक उत्सव जैसा परिवेश रच रहे थे। नए फर्नीचर पर बैठकर किताबें खोलते बच्चों के चेहरे बता रहे थे कि यह केवल बेंच–डेस्क नहीं, सम्मान और अवसर हैं।

कक्का की चौपाल ने यह साबित किया कि जब गांव, कंपनी और समाज एक मंच पर आते हैं, तो शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं रहती—वह संवाद, संवेदना और सपनों का संगम बन जाती है।

प्रभावित गांवों के बच्चों को अच्छी शिक्षा, पर्याप्त संसाधन और खुशहाल वातावरण मिले—इसी संकल्प के साथ यह पहल आगे बढ़ती रहेगी।

खबरों को शेयर कीजिए। धन्यवाद

Leave a Comment