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मज़दूरों के अधिकारों पर सबसे बड़े हमले के खिलाफ संयुक्त मोर्चा का उग्र आंदोलन करने की राह पर

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मज़दूरों के अधिकारों पर सबसे बड़े हमले के खिलाफ संयुक्त मोर्चा का उग्र आंदोलन करने की राह पर

कोतमा। 9 दिसंबर को मजदूर चौक कोतमा कालरी सीटू कार्यालय में संयुक्त मोर्चा जमुना कोतमा क्षेत्र की बैठक संपन्न हुई बैठक में उपस्थित पदाधिकारियों ने सभी क्षेत्रों में संघर्ष तेज करने का संकल्प दोहराते हुए 15 दिसंबर जिला मुख्यालय में प्रदर्शन कर 24 दिसंबर को श्रमायुक्त कार्यालय इंदौर में होने वाले प्रदर्शन काफी संख्या में अनूपपुर जिला से शामिल होंगे। सीटू के जिला महासचिव इंद्रपती सिंह ने बताया कि 

 

वर्तमान संशोधित यह लेबर कोड नहीं, ‘शोषण संहिता’ है। मज़दूरों के खून-पसीने पर “विकास” की इमारत खड़ी करने वाली मोदी सरकार ने आखिरकार अपना असली चेहरा दिखा दिया है। दशकों के संघर्षों से हासिल श्रम अधिकारों को एक-एक कर खत्म कर दिया गया और नई श्रम संहिताएँ सीधे-सीधे पूँजीपतियों को सौंप दी गईं। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यही ‘सबका साथ, सबका विकास’ है या फिर ‘मालिकों के साथ, मजदूरों के खिलाफ’ की खुली राजनीतिक प्रतिबद्धता?

 

बिहार चुनाव में मिली बड़ी जीत के तुरंत बाद सरकार ने 21 नवंबर 2025 को इन संहिताओं को लागू कर यह साबित कर दिया कि मजदूरों की मेहनत, सुरक्षा और भविष्य अब सत्ता के लिए कोई मायने नहीं रखते। पचास करोड़ से अधिक मजदूरों का भविष्य बिना किसी सार्वजनिक चर्चा, बिना जवाबदेही और बिना श्रमिक संगठनों की सहमति के रातों-रात बदल देना लोकतंत्र का अपमान है। यह निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अधिक किसी कारखाने के मालिकाना हुक्म जैसा लगता है जहाँ मजदूर को बस आदेश मानने के लिए पैदा माना जाता है।

 

चारों श्रम संहिताओं की बुनियादी सोच यही है कि मजदूर को एक “कमाऊ मशीन” और मालिक को “सर्वसत्ताधारी” बना दिया जाए। नौकरी मिले या नौकरी से निकाला जाए—सब कुछ अब मालिक की मर्जी पर निर्भर होगा। कार्य घंटे, छुट्टियाँ और काम की शर्तें मालिक की मनचाही व्यवस्था के अनुसार तय की जाएँगी। सवाल यह है कि यह कौन-सा विकास मॉडल है जिसमें मजदूर की जिंदगी लगातार सस्ती होती जा रही है और कॉर्पोरेट मालिकों की संपत्ति लगातार बढ़ती जा रही है?

 

सरकार ने मजदूर की परिभाषा ही बदल दी है। अब ₹18,000 रुपये से अधिक कमाने वाले ‘मजदूर’ नहीं माने जाएँगे। इसका मतलब यह है कि यह पूरा वर्ग यूनियन गठन, सामूहिक सौदेबाजी और श्रमिक अधिकारों से स्वतः बाहर हो जाएगा।

क्या यह मजदूरों को जानबूझकर दो वर्गों में बाँटकर उनकी एकता कमजोर करने की रणनीति नहीं है? और क्या यह संयोग भर है कि इस नए ढाँचे का सबसे बड़ा लाभ वही चुनिंदा कॉरपोरेट घराने उठाएँगे जिनके लिए सरकार लगातार नीतियाँ बदलती दिखाई देती है?

 

नई श्रम संहिताएँ ठेका प्रथा को कानूनी सुरक्षा देती हैं, जिससे स्थायी रोजगार का सपना और दूर चला जाएगा। फिक्स्ड-टर्म रोजगार और ट्रेनी सिस्टम ने कंपनियों के लिए लगभग मुफ्त के मजदूर उपलब्ध कराने का रास्ता खोल दिया है। क्या अब मजदूर कंपनी के लिए एक ‘इस्तेमाल कर फेंक देने योग्य’ वस्तु बन चुका है जिसकी मियाद कंपनी ही तय करेगी?

 

यूनियनों को कमज़ोर करने के लिए सत्यापन की जटिल प्रक्रिया लागू की गई है, जिसका नियंत्रण प्रबंधन-संबंधित अधिकारियों के हाथ में होगा। सबसे खतरनाक प्रावधान यह है कि जब तक ट्रिब्यूनल अंतिम फैसला न सुनाए, तब तक मजदूर एक दिन की भी हड़ताल नहीं कर सकेंगे। सामूहिक छुट्टी को भी हड़ताल घोषित किया जा सकता है। यह स्पष्ट संकेत है कि मजदूरों की आवाज़ को पूरी तरह दबाकर उन्हें एक “खामोश भीड़” में बदल देने की तैयारी है।

 

सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी मजदूरों को कमजोर कर दिया गया है। ईपीएफ को शेयर बाजार से जोड़ने का मतलब यह है कि मजदूरों की जमा पूंजी अब बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर होगी। ईएसआई और अन्य सुरक्षा प्रावधानों को पहले से अधिक संकुचित कर दिया गया है।

असंगठित क्षेत्र के मजदूर पहले से ज्यादा असुरक्षित हो गए हैं। गिग वर्करों—ओला, उबर, जोमैटो, ब्लिंकिट आदि पर काम करने वाले लाखों श्रमिकों—को तो पूरी तरह मजदूर की परिभाषा से बाहर कर दिया गया है। उनके लिए न अधिकार हैं, न सुरक्षा, न भविष्य—सिर्फ ऐप का एल्गोरिथ्म और कंपनी की मनमानी।

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के हाथों में केंद्रित है, तब श्रम कानून भी उन्हीं के हित में क्यों लिखे जा रहे हैं? क्या सरकार यह स्वीकार कर चुकी है कि मजदूर की टूटी हुई हड्डियों से निचोड़ा गया मुनाफा ही ‘न्यू इंडिया’ के विकास का असली आधार है?

 

इस समय जरूरत है कि समाज धर्म, जाति और भ्रामक मुद्दों की राजनीति से बाहर निकलकर मजदूर अधिकारों पर हो रहे इस व्यापक और योजनाबद्ध हमले को समझे।

यह केवल मजदूर वर्ग की लड़ाई नहीं है—यह पूरे समाज के अधिकार, सम्मान और जीवन की लड़ाई है। इसके खिलाफ निर्णायक, संगठित और जुझारू प्रतिरोध खड़ा करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

बैठक में प्रमुख रूप से आर एस यादव, इंद्रपती सिंह,संजय पटेल, रमेश कुमार कुशवाहा, रमाशंकर तिवारी मोहन पाव, अनिल शर्मा, प्रमोद खंडई , एयाज अली ,राधेश्याम यादव,आशोक कुमार सोनी, रामकिशोर,बी डी सिंह, रवि त्रिवेदी शामिल हुए।

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