आजकल नेता सवाल के जवाब में ‘घंटा’ बोल देते हैं, और समर्थक पीछे से ज्ञापन थमा देते हैं।
तो इस हफ्ते चौपाल में यही तौलेंगे—सवाल का जवाब, ज्ञापन की राजनीति, और पत्रकार बनाम सत्ता की रस्साकसी।”
अनूपपुर रेलवे स्टेशन चौराहा
जनवरी का पहला सप्ताह। ठंड ऐसी कि साँस से धुआँ निकल रहा है।
चौराहे के बीच अलाव जल रहा है, लकड़ियाँ चटक रही हैं।
दुकानदार, यात्री, कुली—कुल्हड़ की चाय और मोबाइल पर खबरें।
बस स्टैंड की टूटी सड़क, उखड़ी बेंच, अधूरी पटरियाँ—सत्ता की उदासीनता की गवाही।
ट्रेन की सीटी, प्लेटफॉर्म की हल्की धूल और ठंडी हवा में सियासी चर्चा और अफवाहें तैर रही हैं।
इसी बीच कक्का खड़े हैं, घसीटा बैठा है, और चौरंगी लाल रिपोर्टर अनूपपुर बस स्टैंड के हालात देखकर आते हैं।
मंत्री जी का जवाब—‘घंटा’
घसीटा (चाय की चुस्की के साथ) “कक्का, इंदौर में जहरीले पानी से हुई मौतों पर पत्रकार ने सवाल किया। तो मंत्री जी क्या बोले?”
चौरंगी लाल (तेज़ स्वर में) “‘मंत्री जी, इतनी मौतों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?’
मंत्री जी ने घड़ी देखी, हाथ हिलाया और बोले—‘घंटा!’
और गाड़ी में बैठकर आगे बढ़ गए।”
घसीटा (चौंकते हुए)“मतलब जवाब नहीं, घंटा बोलकर चल दिए?”
कक्का (लकड़ी पलटते हुए) “भइया, यही फैशन है—सवाल का जवाब नहीं, घंटा ही जवाब बन गया।”
कोतमा का ज्ञापन
चौरंगी लाल (गंभीर स्वर में) “मंत्री जी के समर्थक पत्रकार के खिलाफ ज्ञापन सौंप रहे हैं।
सवाल ज़्यादा पूछता है, पोस्ट ज़्यादा डालता है।
संवाद नहीं, कार्रवाई चाहिए।”
घसीटा (भड़कते हुए)“सवाल पूछना अपराध कैसे हो गया?”
कक्का (हँसते हुए) “नेता बोले कम, समर्थक बोले ज़्यादा।
घसीटा–चौरंगी लाल की तीखी नोकझोंक का एक अंश तो समझिए
घसीटा “चौरंगी, तुम लोग रात में कुछ ज़्यादा नशा चढ़ जाने पर सोशल मीडिया पर मंत्री जी को टैग करके अनर्गल पोस्ट डाल देते हो।”
चौरंगी लाल (सख़्ती से) “सवाल पूछना हमारा काम है। गलत पोस्ट हो तो सुधार दो, ज्ञापन और ‘घंटा’ से डराना मत। लोकतंत्र में डर का कोई स्थान नहीं।”
घसीटा “पर अफवाह कभी-कभी जनता को गुमराह करती है।”
चौरंगी लाल “अफवाह को सत्य के सामने खड़ा करो। सवाल दबाना या ज्ञापन थमा देना धमकी है, जवाब नहीं।”
कक्का (बीच में टोकते हुए) “दोनों सही कह रहे हैं, फर्क इतना है—मंत्री के पास सत्ता है, पत्रकार के पास सवाल। सवाल दबाने का कोई बहाना नहीं।”
“माघ की ठंड में अलाव सबको चाहिए,
पर लोकतंत्र में सवाल घंटा नहीं, आग की तरह होना चाहिए।
सवाल पूछने पर ‘घंटा’ और समर्थक ज्ञापन सौंपे
तो वो राजनीति में फिसड्डी ही रहेंगे।
पत्रकार की गलती पर सुधार चाहिए, धमकी नहीं। सवाल दबाना सबसे बड़ा अपराध है।”
अलाव बुझ गया, चाय ठंडी हो गई, ट्रेन चली गई
लेकिन सवाल जिंदा रहे।
कक्का “लोकतंत्र में सत्य की आवाज़ हमेशा जीतती है। घंटा, या ज्ञापन से मीडिया को डरवाना नहीं चाहिए ।”
डिक्लेयमर यह चौपाल और इसके सभी पात्र पूरी तरह कल्पनाशील हैं।
चौपाल में उठाए गए सवाल और जवाब काल्पनिक है।
लेखक कैलाश पाण्डेय के इस कॉलम में हकीकत और कल्पना का खेल चलता है।


















