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जमुना-कोतमा डाकघर: रिश्तेदारी के भरोसे चल रहा सरकारी तंत्र — ब्रांच पोस्टमास्टर ने खुद कबूला ID पासवर्ड मैंने ही दिया

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जमुना-कोतमा डाकघर: रिश्तेदारी के भरोसे चल रहा सरकारी तंत्र — ब्रांच पोस्टमास्टर ने खुद कबूला ID पासवर्ड मैंने ही दिया

मित्तल महरा की विशेष रिपोर्ट अनूपपुर मध्य प्रदेश

भारतीय डाक विभाग का जमुना-कोतमा उपडाकघर अब सेवा और ईमानदारी का प्रतीक नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था के घिनौने गिरावट का प्रतीक बन चुका है। यहाँ सरकारी कुर्सी अब योग्यता से नहीं, बल्कि “दामाद की पात्रता प्रमाणपत्र” से चल रही है

यह कोई मज़ाक नहीं, बल्कि वीडियो साक्ष्य और स्वयं पोस्टमास्टर जी.पी. खजूर के कबूलनामे के साथ सामने आया है — उन्होंने खुद माना कि उन्होंने अपने दामाद अलफोंस इक्का को डाकघर का ID और पासवर्ड सौंप दिया। यानी अब सरकारी प्रणाली किसी चाय की दुकान की तरह चलाई जा रही है — “जा बेटा, देख ले, आज तू ही संभाल ले काउंटर

यह सिर्फ एक नियम का उल्लंघन नहीं है, बल्कि कानून, संविधान और जनता के विश्वास — तीनों का सामूहिक चीरहरण है

कानून भी चिल्ला रहा है — “ये जुर्म है

केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 की धारा 3(1) साफ कहती है कि ईमानदारी, निष्ठा और गोपनीयता एक सरकारी कर्मचारी की आत्मा होती है
लेकिन जब कोई अपने पद की गोपनीय जानकारी (ID, पासवर्ड, अधिकार) रिश्तेदार को सौंप देता है, वो आत्मा को बेच डालता है

IT अधिनियम 2000 की धारा 43 और 66 कहती है कि अगर कोई अनधिकृत व्यक्ति किसी सरकारी सिस्टम को एक्सेस करता है, तो वो “साइबर अपराधी” है — और पासवर्ड चाहे स्वेच्छा से दिया गया हो या चोरी से लिया गया हो, कानून उसे माफ नहीं करता

3 साल तक की सजा और लाखों का जुर्माना इस “दामाद सिस्टम” पर लग सकता है

Official Secrets Act, 1923 अगर किसी अनधिकृत व्यक्ति को सरकारी सूचनाओं या डेटा की पहुँच दी गई, तो वह राष्ट्रहित के खिलाफ गंभीर अपराध है। और डाकघर कोई किराने की दुकान नहीं, यह लाखों नागरिकों की पहचान, पेंशन, बैंकिंग और गोपनीय जानकारी की संवेदनशील धुरी है

भारतीय डाकघर अधिनियम, 1898 के अनुसार, अगर कोई डाककर्मी अपने कर्तव्य को बाहरी व्यक्ति से करवाता है, तो यह कानूनन अपराध है। सज़ा: 6 महीने से 2 साल तक की जेल + जुर्माना

तो चुप क्यों हैं अधिकारी?

जब खुद पोस्टमास्टर मान रहा है कि “ID पासवर्ड मैंने ही दिया”, तो अब तक कोई FIR क्यों नहीं?
कोई सस्पेंशन नहीं, कोई विभागीय जांच नहीं — ये चुप्पी क्या सिर्फ लापरवाही है या संरक्षण का प्रमाणपत्र?

क्या यह माना जाए कि इस “दामाद व्यवस्था” को ऊपर से नीचे तक मौन सहमति मिली हुई है?अगर ऐसा नहीं है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
अगर ऐसा है, तो फिर यह विभाग नहीं, घोटाले की फैक्ट्री है

अब जनता पूछ रही है — क्या अब सरकारी पद भी रिश्तेदारों को गिफ्ट में मिलेगा?

आज अगर आम नागरिक का आधार, पेंशन, या बैंकिंग डिटेल लीक हो जाए, तो कौन ज़िम्मेदार होगा? वो दामाद, जिसे कोई ट्रेनिंग नहीं? या वो ब्रांच पोस्टमास्टर, जिसने अपनी कुर्सी को घरेलू सौदे की टेबल बना डाला?

जनता ने डाकघर में अपना विश्वास डाला, कागज़ नहीं
और जब उस विश्वास को भी “रिश्तेदारी स्कीम” में डाल दिया जाए, तो यह सिर्फ़ एक खबर नहीं लोकतंत्र के चेहरे पर कालिख है

अब वक्त है: या तो व्यवस्था सुधरे, या जनता सड़कों पर सवाल लेकर उतरे

अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ़ “ब्रांच पोस्टमास्टर की गलती” नहीं मानी जाएगी यह माना जाएगा कि पूरा तंत्र बिक चुका है
और आने वाले समय में जमुना-कोतमा उपडाकघर सिर्फ डाक का केंद्र नहीं रहेगा यह बनेगा सरकारी लापरवाही, कानूनी अनदेखी और संस्थागत भ्रष्टाचार की राष्ट्रीय केस स्टडी

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