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कोतमा में नेशनल लोक अदालत का मानवीय फैसला,बिखरते परिवार को मिला नया जीवन

By Santosh Chaurasiya

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कोतमा (अनूपपुर)।

नेशनल लोक अदालत कोतमा में शनिवार को एक भावनात्मक और प्रेरणादायक निर्णय सामने आया, जब प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री गंगा चरण दुबे ने अपने विवेकपूर्ण और संवेदनशील हस्तक्षेप से दो वर्षों से बिछड़े पति-पत्नी को पुनः एक कर दिया। यह फैसला न केवल कानून की जीत है, बल्कि सामाजिक समरसता और परिवार संरक्षण का सशक्त उदाहरण भी बना।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, सूरज (परिवर्तित नाम) एवं मालिनी (परिवर्तित नाम) का विवाह वर्ष 2022 में ग्राम सकोल में संपन्न हुआ था। इस दंपति से एक पुत्र शिवम (परिवर्तित नाम) का जन्म हुआ। पारिवारिक मतभेदों के चलते ढाई वर्ष पूर्व पति-पत्नी के बीच विवाद गहराता गया। आवेदक सूरज द्वारा स्टांप पेपर पर अलगाव संबंधी लेखन किया गया, वहीं सामाजिक पंचायत और रिश्तेदारों के प्रयास भी असफल रहे। इसके बाद सूरज ने विवाह विच्छेद की कार्यवाही आरंभ की।

दूसरी ओर, पत्नी मालिनी द्वारा पति के विरुद्ध घरेलू हिंसा अधिनियम, धारा 498-ए, 125(3) सहित अन्य लगभग छह प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किए गए। सभी मामलों को राष्ट्रीय लोक अदालत में समझौते हेतु संदर्भित किया गया।लोक अदालत में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षकारों, उनके अधिवक्ताओं तथा न्यायालय के मध्य विस्तार से चर्चा हुई। आवेदक की ओर से बताया गया कि पत्नी द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म—व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम—पर निजी छायाचित्र साझा किए जाते थे तथा अत्यधिक समय मोबाइल पर व्यतीत किया जाता था। साथ ही पत्नी की मां द्वारा पारिवारिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप का आरोप भी लगाया गया। वहीं पत्नी ने आगे पढ़ाई करने की इच्छा जताई, जिसे लेकर पति-पत्नी के बीच मतभेद सामने आए।प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री गंगा चरण दुबे ने दोनों पक्षों को समझाइश देते हुए सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों पर बल दिया। न्यायालय की मध्यस्थता में पत्नी के सोशल मीडिया अकाउंट्स को विलोपित कराया गया तथा यह सहमति बनी कि भविष्य में सोशल मीडिया के उपयोग की जानकारी पति को दी जाएगी। साथ ही यह भी तय हुआ कि पत्नी की मां पारिवारिक जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेंगी।न्यायालय ने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि “शिक्षा से ही समाज का विकास संभव है।” इस क्रम में यह आदेशित किया गया कि अनावेदक सूरज अपनी पत्नी मालिनी को अंतिम वर्ष की परीक्षा दिलाएगा और उससे संबंधित समस्त खर्च वहन करेगा।जब मालिनी के पुनः ससुराल जाने पर उसके द्वारा मायके पक्ष से जान को खतरा होने की आशंका जताई गई, तब न्यायालय ने परिवार की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए पुलिस प्रशासन को निर्देश दिए। आदेशानुसार, दिनांक 15 दिसंबर 2025 को पुलिस बल की उपस्थिति में थाना परिसर से मालिनी को सुरक्षित रूप से विदा कराया जाएगा।इस मानवीय फैसले का सबसे भावुक क्षण तब आया, जब न्यायालय के आदेश के पश्चात सूरज ने अपनी पत्नी को गले लगाया और मालिनी भी मुस्कुराते हुए अपने पति से लिपट गई। इस दृश्य ने उपस्थित सभी लोगों की आंखें नम कर दीं। दोनों पक्षों के बीच सभी लंबित मामलों का सौहार्दपूर्ण निपटारा कर दिया गया।नेशनल लोक अदालत का यह निर्णय न केवल एक परिवार को टूटने से बचाने में सफल रहा, बल्कि यह संदेश भी दिया कि संवाद, समझदारी और न्यायिक संवेदनशीलता से जटिल से जटिल पारिवारिक विवादों का समाधान संभव है।

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