सूचना का अधिकार RTI की 20 वीं वर्षगांठ पर जिला कांग्रेस ने की पत्रकार वार्ता
2014 के बाद RTI को कमजोर करने का भाजपा सरकार पे लगाया आरोप एवं आयोग में रिक्तियां को भरने तथा आयोग में पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, महिला प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग
मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी के निर्देशानुसार जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष श्याम कुमार गुड्डू चौहान ने सूचना का अधिकार अधिनियम RTI के लागू होने बाद 20 वर्ष पूरे होने पर पत्रकार वार्ता आयोजित की गई। पत्रकार वार्ता में उपस्थित समस्त पत्रकारगणों को जिला कांग्रेस अध्यक्ष श्याम कुमार गुड्डू चौहान ने संबोधित करते हुए बताया कि डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और श्रीमती सोनिया गांधी के दूरदर्शी नेतृत्व में 12 अक्टूबर 2005 को ऐतिहासिक सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम अस्तित्व में आया। यह यूपीए सरकार के अधिकार-आधारित एजेंडा की पहली कड़ी थी, जिसमें मनरेगा (2005), वन अधिकार अधिनियम (2006), शिक्षा का अधिकार (2009), भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवज़ा का अधिकार अधिनियम (2013) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) शामिल थे।
इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों के पास मौजूद जानकारी तक पहुँच प्रदान कर उन्हें सशक्त बनाना था, ताकि शासन व्यवस्था अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बन सके। आरटीआई समाज के सबसे हाशिए पर बसे लोगों के लिए जीवनरेखा साबित हुई है, इसने नागरिकों को उनके हक़ जैसे राशन, समय पर पेंशन, बकाया मज़दूरी और छात्रवृत्तियाँ दिलाने में मदद की है। इसने सुनिश्चित किया कि सबसे गरीब व्यक्ति को जीवन की बुनियादी ज़रूरतों से वंचित न किया जाए।
2014 के बाद से RTI लगातार कमज़ोर की जा रही है, जिससे हमारे देश की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक ढांचे पर आघात हुआ है।2019 के संशोधनों ने स्वतंत्रता को कमज़ोर किया और कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ाया।2019 के संशोधन ने सूचना आयोगों की स्वायत्तता को कमज़ोर कर दिया। पहले, आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्ष का तय था और उनकी सेवा शर्तें सुरक्षित थीं। संशोधन के बाद केंद्र सरकार को कार्यकाल और सेवा शर्तें तय करने का अधिकार दे दिया गया, जिससे स्वतंत्रता प्रभावित हुई और कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ा।
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम ने आरटीआई की धारा 8 (1) (j) में संशोधन किया, जिससे “व्यक्तिगत जानकारी” की परिभाषा का दायरा बहत बढ़ा दिया गया। पहले, “व्यक्तिगत जानकारी” जनहित में होने पर उजागर की जा सकती थी, लेकिन अब संशोधित प्रावधान कहता है- “कोई भी ऐसी जानकारी जो व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित हो, प्रकट नहीं की जाएगी।” इसका अर्थ है कि “व्यक्तिगत जानकारी” को पूर्णतः अपवाद बना दिया गया है। इससे सार्वजनिक कर्तव्यों या सार्वजनिक धन के उपयोग से संबंधित जानकारी का खुलासा भी रोका जा सकता है, जो आरटीआई के पारदर्शिता सिद्धांत के विरुद्ध है।
केंद्रीय सूचना आयोग आज अपनी अब तक की सबसे कमज़ोर स्थिति में है- 11 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल दो आयुक्त कार्यरत हैं, और सितंबर 2025 के बाद मुख्य आयुक्त का पद भी रिक्त है। इस तरह की स्थिति यूपीए शासन के दौरान कभी नहीं रही।जून 2024 तक देशभर के 29 आयोगों में लगभग 4,05,000 अपीलें और शिकायतें लंबित थीं – जो 2019 की तुलना में लगभग दोगुनी हैं। नवंबर 2024 तक केवल केंद्रीय सूचना आयोग में ही लगभग 23,000 लंबित मामले हैं।
जब आरटीआई के माध्यम से प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों पर हुए करोड़ों रुपये के खर्च, कोविड महामारी के दौरान ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों की वास्तविक संख्या या पीएम केयर्स फंड के उपयोग से जुड़ी जानकारी मांगी गई, तो कोई जवाब नहीं दिया गया। इलेक्टोरल बॉन्ड्स मामले में एसबीआई ने आरटीआई के तहत डेटा देने से इनकार किया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। केवल तब जाकर राजनीतिक दलों को प्राप्त चंदों का डेटा सार्वजनिक हुआ। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की 20 वीं वर्षगांठ पर हम दोहराते हैं कि सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारत के नागरिकों के संवैधानिक और सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम है।
श्याम गुड्डू चौहान ने मीडिया के माध्यम से मांग करते हैं हुए कहा कि 2019 के संशोधनों को निरस्त कर सूचना आयोगों की स्वतंत्रता बहाल की जाए और आयुक्तों के लिए 5 वर्ष का निश्चित कार्यकाल व सुरक्षित सेवा शर्तें सुनिश्चित की जाएँ। डीपीडीपी अधिनियम की उन धाराओं (धारा 44(3) की समीक्षा व संशोधन किया जाए जो आरटीआई के जनहित उद्देश्य को कमज़ोर करती हैं। केंद्र और राज्य आयोगों में सभी रिक्तियाँ पारदर्शी व समयबद्ध प्रक्रिया के माध्यम से तुरंत भरी जाएँ। आयोगों के लिए कार्य निष्पादन मानक तय किए जाएँ और निपटान दर की सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य की जाए। आयोगों में विविधता सुनिश्चित की जाए, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और महिला प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।
आरटीआई आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सुधारों में से एक है। इसकी कमज़ोरी, लोकतंत्र की कमज़ोरी है। आरटीआई की 20 वीं वर्षगांठ पर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस कानून की रक्षा और सशक्तिकरण के अपने संकल्प को दोहराती है, ताकि हर नागरिक निडर होकर सवाल पूछ सके और समयबद्ध व प्रभावी उत्तर प्राप्त कर सके।


















