मदन तिवारी कटनी रिठी
कटनी जिले के रीठी जनपद में संचालित शासकीय गौशालाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक और अमानवीय होती जा रही है। पौड़ी और घनिया सहित कई गौशालाओं में बीमार मवेशियों के इलाज की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। स्थानीय लोगों और गौशाला में कार्यरत मजदूरों का आरोप है कि महीनों से कोई भी शासकीय पशु चिकित्सक या पशु चिकित्सा अमला यहां निरीक्षण या इलाज के लिए नहीं पहुंचा है।
गौशालाओं में मौजूद मवेशियों की हालत इतनी खराब है कि कई पशुओं के शरीर में कीड़े पड़ गए हैं। इलाज न मिलने के कारण बीमार गायों और बछड़ों को गौशाला के बाहर खुले में छोड़ दिया गया, जहां उनकी हालत और भी बदतर हो गई।
स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पौड़ी गौशाला में हाल ही में एक गाय और एक बछड़े की आंखें कौओं द्वारा नोच ली गईं। खुले में पड़े बीमार पशुओं पर कौओं का हमला होना अब आम बात हो गई है। यह दृश्य न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि समाज के लिए भी शर्मनाक है। गौशालाओं को संरक्षण और सेवा का केंद्र माना जाता है, लेकिन यहां मवेशियों को तड़पता छोड़ दिया गया है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि रीठी जनपद की पौड़ी और घनिया गौशालाएं अब भी पंचायत के माध्यम से संचालित की जा रही हैं, जबकि शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि शासकीय गौशालाओं का संचालन महिला स्व-सहायता समूहों के जरिए किया जाना चाहिए। नियमों की इस खुली अनदेखी पर भी प्रशासन में बैठे जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे हुए हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कागजों में गौशालाओं के संचालन, पशुओं की संख्या और उनके स्वास्थ्य को लेकर सब कुछ दुरुस्त दिखाया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। न दवाएं उपलब्ध हैं, न नियमित जांच और न ही आपात स्थिति में इलाज की कोई व्यवस्था, रिकॉर्ड तो गौशालाओ में रखा ही नहीं जाता.
रीठी जनपद की गौशालाओं में सामने आ रही यह तस्वीर न सिर्फ पशुपालन विभाग, बल्कि जिला प्रशासन की संवेदनहीनता को भी उजागर करती है। सवाल यह है कि जब शासकीय गौशालाओं में मवेशियों की यह दुर्दशा है, तो जिम्मेदार अधिकारी कब जागेंगे? क्या इन मूक पशुओं को समय पर इलाज और संरक्षण मिल पाएगा, या फिर यह अमानवीयता यूं ही जारी रहेगी?


















