आदिवासी अंचल में आज भी कायम है पारंपरिक रीति-रिवाज गर् चूल मेले में अंगारों पर चले मन्नत धारी

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‎ ब्यूरो रिपोर्ट शैलेंद्र जोशी

धार के निकट ‎ग्राम सगवाल में प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी होली पर गल चुल मेला आयोजित किया गया। इस दौरान मन्नत धारियों द्वारा गल घूमकर तथा धधकते अंगारों पर नंगे पैर चलकर अपनी मन्नत पूरी मिले हमारी संस्कृति तथा हमारे पुरातन के प्रमाण है

‎होली पर प्रतिवर्ष इस वर्ष भी गल चूल मेले का आयोजन होता है। मन्नत धारी पुरूष ने गल घूम कर वह महिलाओं ने धधकते हुए अंगारों पर चलते है वहीं पुरुषों द्वारा गल बाबा के समक्ष परिक्रमा लगाई जाती है और गल घुमाया जाता है। यह पर मेला प्राचीन समय से लग रहा है। यहां विराजित गल देवता (खंडेराव बाबा) के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है इस हेतु दूर दूर से ग्रामीण व शहरों से श्रद्धालु यहां पर पहुंचते हैं।गांव में विराजित श्री गल देवता (खांडेराव बाबा) की विशाल खंभ रुपी 41 फीट ऊंची प्रतिमा विराजित है, यहां मन्नत पूरी होने पर मनन्तधारी लाल सफेद वस्त्र पहनकर हाथ में नारियल व चेहरे पर हल्दी लगाकर खंडेराव बाबा के जयकारे के साथ चारों ओर परिक्रमा लगाते हैं। वही महिलाएं धधकते हुए अंगारों पर चल कर अपनी मन्नतें पूरी करती है। गल चूल मेले में आसपास क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते है। इसके चलते गल चूल मेले में बड़ी संख्या में विभिन्न प्रकार की दुकानें भी लगती है। यहां ग्रामीणों ने जमकर मेले में उत्साह तथा आनंद के साथ सहभागिता की

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